Edited By ,Updated: 08 Jul, 2021 05:11 AM

आया रे खिलौने वाला खेल खिलौने लेकर आया रे, आया रे!
हमने बचपन में फेरी वालों की कहानियां व किस्से सुने थे। यह वह इंसान होता था जो हमारे घर, मोहल्ले तथा गांव-शहर की गली में ठेले पर दुकान सजाकर हमारे घर तक सामान पहुंचाता था।
आया रे खिलौने वाला खेल खिलौने लेकर आया रे, आया रे!
हमने बचपन में फेरी वालों की कहानियां व किस्से सुने थे। यह वह इंसान होता था जो हमारे घर, मोहल्ले तथा गांव-शहर की गली में ठेले पर दुकान सजाकर हमारे घर तक सामान पहुंचाता था। दैनिक आवश्यकता की छोटी-बड़ी चीजें जैसे फल, फूल, सब्जी, चाट, पानीपूरी अथवा घर के उपयोग की सामग्री बेचता था। एक समय था जब फेरी वाले अपनी किस्म-किस्म की आवाजों से हमारा ध्यान अपनी तरफ खींचते थे। अब बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल, बहुराष्ट्रीय कंपनियां बाजार में आ गई हैं। जिन्होंने इन फेरी वालों के पेट पर लात मारने का काम किया है।
यह फेरी वाले थोड़े-बहुत फायदे-नुक्सान के साथ हमारे साथ प्यार व आत्मीयता का संबंध भी स्थापित करते थे। फेरी वाला रोजमर्रा के इस्तेमाल की साधारण चीजें बेचता था। इनमें सब्जी, फल, साधारण किस्म के कपड़े, मिठाई, आइसक्रीम, भुने चने, साबुन, खिलौने तथा चाट आदि होते थे। वह अपने सामान को ढंकता नहीं बल्कि ग्राहकों को आकॢषत करने के लिए खुला रखता था।
वह अपनी फेरी पर सामान इस तरह सजाता है कि ग्राहकों को एक ही नजर में सारी चीजें दिखाई दे जाएं। वह घर-घर जाकर तथा मोहल्ले-मोहल्ले में जाकर चीजें बेचता था।
वह तेज आवाज से अपनी वस्तुओं का नाम लेकर आवाज लगाता था। कभी-कभी हाथ की घंटी बजाकर अपनी उपस्थिति दर्शाता था। यह फेरी वाले बड़े चालाक होते थे। उन्हें यह अच्छे से पता होता था कि वह किसी बालक, बूढ़े तथा भोले-भाले आदमी को अपने सामान के लिए कैसे आकॢषत करें। पहले अनोखे ढंग से घंटी बजाता था तथा फिर अपने अलग ढंग से मीठे बोल बोलकर सामान के नाम बताता था। पर दुर्भाग्य की बात यह है कि आज के तकनीकी युग ने इन लोगों की रोजी-रोटी तो छीनी ही है बल्कि जो आत्मीयता तथा अपनेपन का भाव इन व्यक्तियों के साथ जुड़ता था, वह भी अब समाप्त हो गया है।
क्या वाहिशें होंगी उस गरीब की जिनकी सांसें भी गुब्बारे में भरकर बिकती हैं। सुबह उठते ही जो आवाज पहले कान में पड़ती थी वह किसी फेरी वाले की ही होती थी। झाड़ू वाला, रद्दी वाला, पॉलिश वाला, सब्जी वाला, हर माल वाला, प्रैशर कुकर वाला, पानी-पतासे वाला, सब फेरी वाले एक के बाद एक आते थे और चले जाते थे लेकिन अब स्थिति बिल्कुल बदल चुकी है। अब फेरी वालों की यह ऊंची आवाज हमारे कानों में नहीं पड़ती। अब बड़े-बड़े स्टोर के स्पीकरों की भड़काऊ आवाज सुनकर दिल बैठ जाता है।
शॉपिंग मॉल में पहले से ही रिकॉर्ड की गई सूचनाएं हमेशा एक ही रोना रोती रहती हैं। एक ही सूचना को बार-बार दोहराया जाता है। हमें ऐसा लगता है कि फेरी वालों को खोकर हमने स यता, संस्कृति तथा परिवेश को खो दिया है। फेरी वालों के बिना जीवन नीरस हो गया है जिनकी यादों में अभी भी फेरी वाले बसे हुए हैं, उन्हें शॉपिंग मॉल में जाना, कुछ सामान चुनना, कुछ सामान ढोना और खुद बिल काऊंटर पर पहुंचना अजीब लगता है।
तुम चलती ए.सी. कारों में, मैं पगडंडी का चालक हूं।
तुम मॉल की महंगी सब्जी हो, मैं भाजी, लौकी, पालक हूं।
ऑनलाइन कारोबार की बचत से सबसे ज्यादा जो नुक्सान हुआ है, वह फेरी वालों को ही हुआ है क्योंकि वह अधिक सामान नहीं खरीद सकते जिस कारण थोक विक्रेता उन्हें थोड़े कम मुनाफे पर सामान देते हैं। वहीं दूसरी ओर ऑनलाइन विक्रेताओं की बात करें तो वे काफी अच्छी बचत पर उत्पाद को बेच देते हैं।
आज किसी के पास अधिक वक्त न होने के कारण लोग ऑनलाइन खरीदारी करने की इच्छा दिखाते हैं। फेरी वालों के पास में रियायत या छूट के ज्यादा विकल्प नहीं होते या नए उत्पाद भी देखने को नहीं मिलते। जिसकी वजह से ग्राहक ऑनलाइन खरीदारी की तरफ ज्यादा से ज्यादा खींचे जा रहे हैं। जिसका असर सीधे सीधे फेरी वालों पर पड़ता है।
फेरी वालों का जीवन बेहद कठिनाइयों से भरा था। फिर भी अपनी जीविका कमाने के लिए विपरीत हालातों जैसे तेज ठंड, गर्मी और बरसात के दिनों में भी फेरी लगाते थे। बेहद छोटे व्यापारी होने के कारण इन्हें लाभ की प्राप्ति भी बहुत कम होती थी। फिर भी यह अपनी मेहनत की कमाई से खुश थे तथा अपने परिवार का गुजारा करते थे। थोड़ी-सी कमाई से ही इन्हें अपने घर के खर्चे तथा बच्चों को पढ़ाई, उनकी शादी करवानी होती थी लेकिन अब न तो वह फेरी वाले रहे तथा न ही उनकी बातें। अब तो शॉपिंग मॉल में अंग्रेजी भाषा से एक ही आवाज निकलती रहती है कि ‘कृपया ध्यान दीजिए... हमारे पास आलू पर छूट है.... इतने आलू खरीदिए और इतने पैसे बचाइए.... यह छूट केवल 12:00 बजे तक है।’ मॉल में एक ग्राहक का दूसरे ग्राहक से कोई संबंध नहीं होता। फेरी वालों के यहां सामान के साथ मानवता, प्रेम, अपनापन, दुख बांटने का बहाना मिलता था।
सच पूछो तो इस दुनिया में सब फेरी वाले हैं। कोई किसी के फेरे लगा रहा है तो कोई किसी और के। कोई अपने स्वार्थों के लिए फेरी लगा रहा है तो कोई रोजी-रोटी के लिए सुबह से शाम तक फेरी लगाता है । मंत्री मु यमंत्री तथा प्रधानमंत्री के फेरे लगाता है। उपनिदेशक निदेशक के फेरे लगाता है और अपना उल्लू सीधा कर लेता है। संसार एक रंगमंच है और हम सब कठपुतलियां हैं। झाड़ू वाले से एक दिन मैंने पूछ लिया कि भैया क्या कमा लेते हो ।
बोला, ‘‘साहब पेट तक नहीं भरता, कभी-कभी भूखा रहना पड़ता है । मैंने एक सब्जी वाले से पूछा कि तु हें बुखार है फिर भी तुम सब्जी बेच रहे हो, उसने फिर से मुंह खोला, वह बोल नहीं पा रहा था, फिर भी बोला, मुझे तो सिर्फ बुखार है, मेरा बेटा हुआ डेंगू का शिकार है, अब मैं आगे क्या बोलूं, अपने दुख का भेद क्या खोलूं।
सगे संबंधी भी साथ छोड़ गए हैं, हिम्मत रूपी कमर तोड़ गए हैं,
अब फेरी ही हमारा सहारा है, बस हमारे साथ अब कर्म हमारा है।
यही हालात गुब्बारे बेचने वाले, नमकीन बेचने वाले, सभी दुकानदारों के हैं। हर फेरी वाले का बड़ा फेरी वाला शोषण कर रहा है और बड़े का उससे बड़ा फेरी वाला शोषण कर रहा है लेकिन अब सब छोटे फेरी वाले लापता हो गए हैं। कहां गए वह फेरी वाले, मुझे तलाश है उन फेरी वालों की।-प्रि.डॉ.मोहन लाल शर्मा