टैलीविजन समाचार चैनलों ने देश को बहुत नुकसान पहुंचाया है

Edited By Updated: 29 Jan, 2026 05:34 AM

television news channels have caused a lot of harm to the country

यह कोई रहस्य नहीं है कि देश में टैलीविजन देखने वालों की संख्या, खासकर न्यूज कैटेगरी की, तेजी से घट रही है। एक अनुमान के अनुसार, डायरैक्ट-टू-होम ऑप्रेटरों का सब्सक्राइबर बेस 2019 में 7.2 करोड़ से घटकर 2024 में 6.10 करोड़ हो गया है और इस साल के आखिर...

यह कोई रहस्य नहीं है कि देश में टैलीविजन देखने वालों की संख्या, खासकर न्यूज कैटेगरी की, तेजी से घट रही है। एक अनुमान के अनुसार, डायरैक्ट-टू-होम ऑप्रेटरों का सब्सक्राइबर बेस 2019 में 7.2 करोड़ से घटकर 2024 में 6.10 करोड़ हो गया है और इस साल के आखिर तक इसके 5.1 करोड़ तक गिरने की उम्मीद है। हालांकि टैलीविजन न्यूज चैनलों का हिस्सा हमेशा कम रहा है, जिसमें एंटरटेनमैंट,स्पोर्ट्स और म्यूजिक चैनल लिस्ट में सबसे ऊपर हैं, यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब भी देश में मीडिया की स्थिति की बात होती है, तो बहस सिर्फ टैलीविजन न्यूज चैनलों के कामकाज तक ही सीमित रह जाती है। इसका एक कारण यह हो सकता है कि विजुअल मीडिया की याद रखने योग्य वैल्यू सबसे ज्यादा होती है। कोई आश्चर्य नहीं कि आजकल पूरे मीडिया को ‘गोदी मीडिया’ कहा जाता है, भले ही पिं्रट मीडिया ने बड़े पैमाने पर स्टैंडर्ड बनाए रखे हैं, या दूसरे शब्दों में कहें तो, यह न्यूज टैलीविजन चैनलों पर होने वाली गाली-गलौज या चीखने-चिल्लाने जैसी चीजों में नहीं बदला है।

हां, मीडिया पर्यवेक्षकों का एक वर्ग उपरोक्त विचारों से असहमत हो सकता है। वे सही ही अपनी बात मनवाने के लिए सभी तरह की सरकारों की ‘गाजर और छड़ी’ की नीतियों की ओर इशारा कर सकते हैं। हालांकि, मेरा दृष्टिकोण सिर्फ उन भयानक चिल्लाने और चीखने वाली ‘बहसों’ तक सीमित है, जो टी.वी. स्टूडियो में पैनलिस्टों के बीच होती हैं, जिन्हें पक्षपाती एंकर उकसाते हैं और वे एक-दूसरे को अपमानित और नीचा दिखाते हैं। इन टैलीविजन न्यूज चैनलों पर कोई समझदारी भरी बहस मिलना दुर्लभ है। जाहिर है, यह सब टी.आर.पी. पर नजर रखते हुए किया जाता है, जो इन चैनलों की कमाई पर असर डालती है। इन चैनलों के मालिक और मैनेजर मानते हैं कि लोग टी.वी. स्क्रीन पर ‘ड्रामा’ और एक्शन चाहते हैं और इसलिए सच्ची खबरें इसका शिकार हो जाती हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि इनमें से लगभग सभी ने अपनी विश्वसनीयता खो दी है। एक प्रमुख न्यूज एंकर के इस दावे कि नोटबंदी के बाद 2000 रुपए के सभी नोटों में एक चिप लगाई गई है से लेकर हाल ही में भारतीय सेनाओं के लाहौर और कराची पहुंचने की गलतियों तक, इन चैनलों को मजाक का पात्र बना दिया है।

लेकिन इससे भी ज्यादा गंभीर बात यह है कि इनमें से कुछ चैनलों द्वारा सांप्रदायिकता और नफरत का जहर खुलेआम फैलाया जा रहा है। उनकी प्रैजैंटेशन में पक्षपात साफ दिखता है। सच में, उन्होंने देश को बहुत नुकसान पहुंचाया है। यह बात न्यूज ब्रॉडकॉस्टिंगस एंड डिजिटल स्टैंडडर््स अथॉरिटी (एन.बी.डी.एस.ए.) के रिकॉर्ड में दिखती है, जिसे पहले न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन के नाम से जाना जाता था, जो प्राइवेट टैलीविजन न्यूज, करंट अफेयर्स और डिजिटल ब्रॉडकास्टर्स का प्रतिनिधित्व करता है। यह संगठन, जिसे पूरी तरह से इसके सदस्यों द्वारा फंड किया जाता है, भारत में न्यूज, करंट अफेयर्स और डिजिटल ब्रॉडकास्टर्स की सामूहिक आवाज है। हालांकि इसका मकसद अपने सदस्यों को ‘ऐसे व्यक्तियों या संस्थाओं से बचाना है जो गलत और/या अनैतिक काम करते हैं अथवा जो टैलीविजन न्यूज ब्रॉडकास्टर्स, डिजिटल न्यूज मीडिया और अन्य संबंधित संस्थाओं को बदनाम करते हैं’, यह अपने सदस्य चैनलों के खिलाफ मिली शिकायतों पर भी फैसला सुनाता है।

एक अध्ययन में पाया गया है कि पिछले 3 सालों में संगठन द्वारा दिए गए लगभग 60 प्रतिशत आदेश ऐसे कार्यक्रमों के खिलाफ थे, जिन्होंने सांप्रदायिक सद्भाव पर इसके एथिक्स कोड का उल्लंघन किया था। यह कोई हैरानी की बात नहीं है, यह देखते हुए कि इनमें से कुछ चैनल समाज में सांप्रदायिक जहर फैलाने में मदद कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि उनमें एक-दूसरे से ज्यादा जोर से बोलने और नफरत फैलाने वाले बनने की होड़ लगी हुई है। ज्यादा टी.आर.पी. और नतीजतन ज्यादा रैवेन्यू पाने की इस बेताब दौड़ ने समाज और देश को बहुत बड़ा और शायद ऐसा नुकसान पहुंचाया है, जिसकी भरपाई नहीं हो सकती। हालांकि, न्यूज रूम और एंकरों से ज्यादा, इसका दोष उन मालिकों पर जाना चाहिए, जिन्होंने अपनी जिम्मेदारी छोड़ दी है।

मीडिया की कम विश्वसनीयता के इस दौर में, जिसका मुख्य कारण टैलीविजन न्यूज चैनल हैं, डिजिटल स्पेस का खुलना एक अच्छा संकेत है और सच में कुछ डिजिटल प्लेटफॉर्म बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। कुछ ऐसे डिजिटल प्लेटफॉर्म अब जानकारी भरी बहस के साथ-साथ न्यूज एनालिसिस और राय वाले लेख भी देते हैं। ये भविष्य में बेहतर पत्रकारिता की उम्मीद जगाते हैं। हालांकि, उन्हें और नागरिकों को भी अपनी आजादी की जोरदार तरीके से रक्षा करने की जरूरत है, जबकि सरकार इसे सीमित करने के तरीकों पर विचार कर रही है।-विपिन पब्बी

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