शंख बजा नहीं, महाभारत चालू

Edited By Updated: 16 Jan, 2026 04:50 AM

the conch shell hasn t been blown but the mahabharata has already begun

जी हां, 5 विधानसभा चुनावों को लेकर अभी कोई आधिकारिक घोषणा होने में देर है लेकिन चुनाव के अखाड़े के पहलवान पहले से गुत्थमगुत्था होने लगे हैं। ऐसा हो तो रहा है सभी जगह लेकिन बंगाल की लड़ाई तो सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई है। शुरुआत में यह...

जी हां, 5 विधानसभा चुनावों को लेकर अभी कोई आधिकारिक घोषणा होने में देर है लेकिन चुनाव के अखाड़े के पहलवान पहले से गुत्थमगुत्था होने लगे हैं। ऐसा हो तो रहा है सभी जगह लेकिन बंगाल की लड़ाई तो सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई है। शुरुआत में यह हाल है तो आगे चुनाव पूरा होने तक मामला कहां पहुंचेगा, कहना मुश्किल है। चुनाव मई से पहले हो जाएंगे। असम, पश्चिम बंगाल और पुड्डुचेरी के लिए चुनाव मार्च/अप्रैल में होंगे तो तमिलनाडु और केरल विधानसभाओं के लिए अप्रैल/मई में। 

निश्चित रूप से चुनाव का ज्यादा शोर मचाने की वजह खास शैली से चुनाव लडऩे वाली भाजपा का मैदान में होना और प्रमुख खिलाड़ी रहना है। और बंगाल में भी ई.डी. जब कोयला घोटाले की जांच का नाम लेकर सीधे तृणमूल की सलाहकार कंपनी के दफ्तर से फाइलें उठाने लगी तो पुलिस बल समेत आकर खुद ममता बनर्जी ने वे फाइलें छीन लीं। अब कौन गलत कौन सही की लड़ाई सड़क पर और सुप्रीम कोर्ट में चलने लगी है। चुनाव के पहले उसका निपटारा भी संभव नहीं लगता। अभी की स्थिति में भाजपा एक राज्य में शासन में है और दूसरे में काफी पिछड़ कर मुख्य विपक्ष है। पर एक राज्य, पुड्डुचेरी में उसने जिस तरह  सरकार बना ली, वह उसकी राजनीतिक लड़ाई लडऩे का तरीका है। अगर चुनावों को लेकर अभी से गरमाहट आ गई है तो यह भी भाजपा के चुनाव लडऩे का तरीका है जो नगर पालिका चुनाव तक को नरेंद्र मोदी और अमित शाह की प्रतिष्ठा से जोड़ देता है। मुश्किल यह है कि 3 अन्य राज्यों में वह कमजोर है तो बंगाल में ममता बनर्जी भी लड़ाई को जुझारू तरीके से ही लडऩे को तैयार हैं। 

2 लोकसभा और 2 विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस को मुख्य टक्कर देने के बाद भाजपा को लग रहा है कि 15 साल के ममता राज से लोगों की जो नाराजगी बढ़ी है, उसका लाभ लेकर वह इस बार बंगाल का किला फतह कर सकती है। पर उसकी मुश्किल यह है कि उसके पक्ष में 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से जो उभार आने लगा था, वह उतार पर आता दिखने लगा है। उसका वोट प्रतिशत गिरा है। साथ ही उसके सांसद और विधायक भी कम चुने गए हैं। दल बदल में भी अब मौकापरस्त या किसी दबाव में उसकी तरफ आने वालों की रफ्तार कम हुई है। इसके साथ ही वहां के लगभग एक-चौथाई मुसलमान मतदाता भी अब पूरी तरह तृणमूल के साथ आ गए हैं। बंगाल में समाज सुधार आंदोलनों के चलते जाति की गोलबंदी कम है और समाज पर प्रभावी भद्रलोक में भाजपा की घुसपैठ नहीं है। भाजपा की मुश्किल कांग्रेस और वाम दलों के एकदम पस्त होने से भी बड़ी है, जिनका वोट उसकी तरफ आने से ज्यादा तृणमूल की तरफ गया है।

असम में भी भाजपा की परेशानी 10 साल शासन करने और नागरिकता या घुसपैठ जैसे किसी मुद्दे पर ज्यादा कुछ न कर पाने से जुड़ी है। कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को असम का चार्ज देकर लड़ाई को और दिलचस्प बना दिया है। कांग्रेस ने जब से मौलाना बदरुद्दीन वाली मुसलमानों की पार्टी से रिश्ता तोड़ा है, उसे मुसलमानों का भरपूर वोट तो मिला ही, भाजपा के लिए उस पर हमला करना और चुनाव को हिंदू-मुसलमान बनाना मुश्किल हुआ है।  इस बार भाजपा को ज्यादा परेशानी अहोम सरबानंद सोनोवाल को हटाकर हेमंत बिस्व सरमा को मुख्यमंत्री बनाने से भी जुड़ी है। सरमा प्रशासनिक रूप से कुशल हैं पर असमी समाज में शासक रहे अहोम समाज को सत्ता जाने का मलाल है। असम में बहुत किस्म की अस्मिताएं/पहचान काम करती हैं लेकिन नागरिकता, सी.ए.ए., पॉपुलेशन रजिस्टर, जनगणना और गहन मतदाता सर्वेक्षण जैसे किसी भी सवाल पर स्पष्ट फैसला न लेना और कोई नतीजा न देना भाजपा को परेशान करेगा। 
तमिलनाडु के चुनाव में भाजपा ही नहीं, पूरा विपक्ष अभी पहले से कमजोर लग रहा है।

अन्नाद्रमुक में टूट और भाजपा का उससे छिटकना ही नहीं हुआ है, भाजपा वन्नीयारों वाली पार्टी पी.एम.के. का दोफाड़ होने के बाद अंबुमणि धड़े के साथ हाथ मिलाने और अभिनेता विजयकांत की गवांडीयरों वाली पार्टी को साथ लेने के लिए प्रयास कर रही है। अन्नाद्रमुक से निकले थेवर नेता पन्नीरसेल्वम और दिनाकरण भी अभी ठिकाना नहीं पा सके हैं। कभी विजयकांत को साथ लेकर कांग्रेस तीसरा मोर्चा बनाना चाहती है, कभी द्रमुक सरकार में मंत्री पद।  उधर द्रमुक, कांग्रेस और वाम दलों का गठबंधन हर तरह से मजबूत और एकजुट दिख रहा है। लोकसभा चुनाव के नतीजे बता रहे हैं कि विपक्षी गठजोड़ बन भी जाए तो एम.के. स्टालिन को हराने लायक दम जुटाना मुमकिन नहीं।

केरल को लेकर भाजपा जरूर इस बार उत्साहित है, हालांकि वहां भी लोकसभा चुनाव में वह शून्य पर ही आ गई थी। लेकिन उसे ठीक-ठाक वोट मिले हैं और अभी त्रिवेंद्रम की स्थानीय सरकार पर उसके कब्जे से उसका उत्साह बढ़ा है। पर बहुत साफ जातिगत और सांप्रदायिक गोलबंदी वाले केरल समाज में भाजपा कुल मिलाकर हिन्दू नायरों और कुछ असंबद्ध युवकों को ही आकर्षित कर पाई है। और यह वोट जितना बढ़ेगा, 10 साल से शासन कर रही वाम मोर्चा सरकार की परेशानियां बढ़ेंगी क्योंकि भाजपा के लिए ईसाई और मुसलमान वोट पाना संभव नहीं है। यह स्थिति कांग्रेस के लिए अच्छी बन जाती है, जिसके पास ज्यादा कुछ नहीं, राहुल और प्रियंका गांधी के यहां से चुनाव लडऩे के चलते आया उत्साह भर है। 20 लाख से कम आबादी वाले पुड्डुचेरी की आबादी का संतुलन बहुत नाजुक है और जिस तरह पिछली बार भाजपा ने वहां मनोनयन वाले 3 विधायकों और राज्यपाल के सहारे सरकार बना ली, उससे नाराजगी है। इसलिए सभी 5 विधानसभा चुनावी राज्यों में भाजपा अपने लिए जश्न मनाने की स्थिति कैसे बना पाती है, यह देखना होगा।-अरविंद मोहन   
    

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