किसान और जवान-दोनों देश की जान

Edited By Updated: 13 Apr, 2021 04:17 AM

the life of both farmers and young people

नए विवादास्पद कृषि कानूनों के खिलाफ जद्दोजहद कर रहे किसान संगठनों का पक्ष लेते हुए मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने एक बड़ा बयान देते हुए कहा कि, ‘‘जिस देश का किसान तथा जवान असंतुष्ट हो, वह देश कभी भी आगे नहीं बढ़ सकता, इसलिए

नए विवादास्पद कृषि कानूनों के खिलाफ जद्दोजहद कर रहे किसान संगठनों का पक्ष लेते हुए मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने एक बड़ा बयान देते हुए कहा कि, ‘‘जिस देश का किसान तथा जवान असंतुष्ट हो, वह देश कभी भी आगे नहीं बढ़ सकता, इसलिए अपनी सेना और किसानों को संतुष्ट करो।’’ 

मलिक ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा गृहमंत्री अमित शाह को अपील की कि प्रदर्शनकारी किसानों को दिल्ली से खाली हाथ वापस न भेजा जाए। अगर केन्द्र सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) को कानूनी मान्यता प्रदान करती है तो किसान मान जाएंगे? वे तो तीनों कृषि कानूनों को रद्द करवाने के साथ जुड़े एम.एस.पी. को लागू कराने के साथ अड़े हुए हैं। वहीं हरियाणा के गृह व स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज ने केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को एक पत्र भेजकर हरियाणा-दिल्ली सीमा पर बैठे आंदोलनकारी किसानों से एक बार फिर बातचीत शुरू करने का आग्रह किया है। 

पत्र में उन्होंने कहा कि आज पूरे देश में फिर से कोरोना का कहर नजर आने लगा है और हरियाणा में भी हालात बिगडऩे लगे हैं। लेकिन मेरी ङ्क्षचता हरियाणा बार्डर पर बैठे हजारों आन्दोलनकारी किसानों को लेकर है क्योंकि मुझे उनको भी कोरोना से बचाना है। 

उन्होंने कहा कि पिछले लम्बे समय से वार्ता बंद होने से अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। वार्ता को दोबारा शुरू किया जाए ताकि बातचीत करके इस मसले को सुलझाया जा सके जिससे किसानों का धरना खत्म हो सके। इन दोनों पहलुओं पर चर्चा करना इसलिए भी जरूरी हो जाता है क्योंकि इस किस्म की प्रतिक्रिया संवैधानिक पदों पर विराजमान वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं की ओर से आई है और दूसरा देश के विभाजन के बाद तत्कालीन सरकारों ने किसानों तथा जवानों के हितों की हमेशा अनदेखी की है। 

किसान और जवान की सुनो  : स्वतंत्रता के तुरंत बाद सरकार ने भुखमरी से बचने की खातिर पी.एल.-480 जैसे समझौतों के अन्तर्गत विदेशों से जल्दी-जल्दी अच्छा-बुरा अनाज देशवासियों के लिए उपलब्ध करवाया। फिर 1960 के दशक के दौरान वैज्ञानिकों और किसानों की कड़ी मेहनत के बल पर देश में ‘हरित क्रांति’ आई। दूसरी ओर देश के रक्षक सशस्त्र बल तथा अन्य सैन्य सामग्री की कमी के बावजूद चीन के हमले से निपटने के लिए शहादतें दे रहे थे। रोटी, कपड़ा और मकान के संकल्प को पूरा करने की खातिर नेहरू खानदान की सरकारों से लेकर वर्तमान मोदी सरकार तक आमतौर पर असफल रही और बेरोजगारी बढ़ती जा रही है। 

यह भी एक कारण है कि अब किसान संगठनों के अलावा इस ऐतिहासिक आंदोलन में देश और समाज के हर वर्ग जैसे कि श्रमिक, व्यापारी, बेरोजगार नौजवान, वकील, पूर्व सैनिक, डॉक्टर, कलाकार, खिलाड़ी, पूर्व पुलिस अधिकारी, सिविल नौकरशाह, विशेष तौर पर महिला वर्ग जातपात और धार्मिक बंधनों से ऊपर उठकर हिस्सा ले रहे हैं। इनके अनथक प्रयासों की बदौलत यह आंदोलन अब एक जन आंदोलन बन चुका है जोकि भाईचारा और राष्ट्रवाद का प्रतीक है। 

राष्ट्रीय स्तर वाली हस्तियों और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं तथा विदेशी संसदों में भी इसकी गूंज सुनाई दे रही है। हैरानी वाली बात यह है कि 2020 में एक ओर तो देश-विदेश में कोरोना महामारी ने जोर पकड़ा हुआ था तथा दूसरी ओर चीन द्वारा वास्तविक नियंत्रण रेखा (एल.ए.सी.) में बदलाव लाने की खातिर पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पी.एल.ए.) की ओर से घुसपैठ को धकेलते हुए हमारी सेना के 20 बहादुर जवान शहादत का जाम पी गए। इसी जून के महीने में मोदी सरकार कृषि कानूनों को अंतिम रूप दे रही थी। अब एक ओर बहादुर जवान देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए शहादतें दे रहे हैं तो दूसरी ओर देश के अन्नदाता दिल्ली सीमा पर मोर्चा सम्भालते हुए अपनी जानें न्यौछावर कर रहे हैं जिसका गलत प्रभाव

समस्त सेना पर पड़ रहा है। जिस बारे में इस लेख में चर्चा की जाएगी। अफसोस की बात है कि एक ओर देश के रक्षक ऊंचे पर्वतीय कठिन इलाकों पर तैनात होकर अपना योगदान डाल रहे हैं, दूसरी ओर वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने गत वर्ष में 1 जनवरी से लागू होने जा रहे बढ़े हुए डी.ए. पर 18 महीनों के लिए रोक लगा दी। फिर पैंशन बजट में करीब 18 हजार करोड़ रुपए की कटौती कर दी। क्या यह सैन्य वर्ग से खिलवाड़ नहीं? 

एडमिरल तथा जनरलों की भी सुनो : किसान आंदोलन ने जहां देश-विदेशों से भारी समर्थन हासिल किया है, वहीं यह मामला देश की रक्षा से भी जुड़ा होने के कारण प्रख्यात चिंतक जनरलों की भावनाओं को भी प्रकट कर रहा है। इसकी मिसाल पूर्व इंडियन नेवी प्रमुख एडमिरल एल. रामदास की ओर से तीनों सेनाओं के सर्वोच्च कमांडर श्री रामनाथ कोविंद तथा प्रधानमंत्री मोदी को 29 जनवरी को लिखे पत्र से मिलती है। अपने 4 पन्नों वाले जज्बातों से भरे पत्र में वर्ष 1952 के गणतंत्र दिवस मौके का एक ऐतिहासिक चित्र भी साथ लगाया गया जिसमें किसान के ट्रैक्टर वाली झांकी कनॉट प्लेस से गुजरती दिखाई गई है। 

एडमिरल ने इस बात पर रोष प्रकट किया कि कैसे किसानों की 90 प्रतिशत शांति और सद्भावना वाली ट्रैक्टर रैली को प्रमुख मीडिया ने आंखों से ओझल किया और लाल किले पर कुछ शरारती तत्वों की हरकतों को प्राथमिकता दी गई। सच्चाई के मार्ग पर चलते किसानों पर झूठी एफ.आर.आई. दर्ज की गई। एडमिरल ने अपने पहले संदेशों का विवरण देते हुए लिखा कि करीब हर किसान के घर में एक सैनिक भी है जो देश की सीमाओं की रक्षा करने के बाद वापस किसान वर्ग में समा जाता है। इसलिए किसानों के साथ खिलवाड़ करने का असर जवानों पर भी पड़ता है जोकि राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है। अंत में उन्होंने राष्ट्रपति को तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने की भी अपील की। 

यहां यह भी बताना उचित होगा कि इंडियन एक्स-सॢवसमैन मूवमैंट (आई.ई. एम.एम.) के चेयरमैन मेजर जनरल सतबीर सिंह की ओर से प्रधानमंत्री को 3 जनवरी 2021 को 5 पन्नों वाला पत्र लिखा जिसके साथ 25 पन्नों की अंकिता दर्ज है। इस पत्र में लिखा गया है कि कैसे सैनिकों के साथ सौतेले बच्चों जैसा व्यवहार किया जा रहा है और आजादी के बाद सैनिकों का वेतन तथा पैंशन कम दी गई है। 

बाज वाली नजर : फौज देश की किसी व्यक्तिगत नेता की जागीर नहीं इसलिए न तो उसका राजनीतिकरण उचित है और न ही उसको बांटना उचित है। त्यौहारों के मौके पर सीमाओं पर पहुंच कर जवानों के मुंह में लड्डू डालने का हर्ज तो कोई नहीं, जरूरत तो इस बात की है कि सेना का दर्जा, पूर्व सैनिकों, विधवाओं तथा उनके परिवारों का सम्मान बहाल कर उनकी समस्याओं को प्राथमिकता के आधार पर हल किया जाए।-ब्रिगे. कुलदीप सिंह काहलों (रिटा.)
 

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