Edited By ,Updated: 25 Aug, 2026 05:13 AM

भारत में माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हुए 12 वर्षों के शासन सुधारों का जश्न मनाते हुए, कृषि क्षेत्र में एक बड़ी सफलता देखने को मिल रही है। सरकार की किसान-केंद्रित नीति ने आय बढ़ाने, कृषि की लागत कम करने, जोखिम सुरक्षा को...
भारत में माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हुए 12 वर्षों के शासन सुधारों का जश्न मनाते हुए, कृषि क्षेत्र में एक बड़ी सफलता देखने को मिल रही है। सरकार की किसान-केंद्रित नीति ने आय बढ़ाने, कृषि की लागत कम करने, जोखिम सुरक्षा को मजबूत करने और खेत से बाजार तक आधुनिक बुनियादी ढांचे और सेवाओं को पहुंचाने पर ध्यान केंद्रित किया है। प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, फसल बीमा, संस्थागत ऋण, सिंचाई, डिजिटल बाजारए कृषि अवसंरचना, मृदा स्वास्थ्य, मशीनीकरण और प्रौद्योगिकी-आधारित परामर्श सेवाओं ने मिलकर किसानों के लिए परिचालन वातावरण को बेहतर बनाया है।
इसके परिणाम स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं। भारत का कुल खाद्यान्न उत्पादन 2025-26 में 376.56 मिलियन टन होने का अनुमान है, जो देश के इतिहास में अब तक का सबसे अधिक है। कृषि निर्यात, जो वित्त वर्ष 2014-15 में 32.08 बिलियन अमरीकी डॉलर था, वित्त वर्ष 2025-26 में रिकॉर्ड 52.55 बिलियन अमरीकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। हाल ही में जी.एस.टी. के युक्तिकरण ने भी इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, जिससे 1800 सी.सी. से कम क्षमता वाले ट्रैक्टरों, कई जैव कीटनाशकों, सूक्ष्म पोषक तत्वों और अन्य कृषि संबंधी इनपुट पर दरें कम हुई हैं। कृषि परामर्श के क्षेत्र में, राष्ट्रीय कीट निगरानी प्रणाली और भारत-विस्तार जैसी पहलें कीटों के बारे में जानकारी और निर्णय लेने की क्षमता को बेहतर बनाने में सहायक सिद्ध हो रही हैं। ये पहलें एक एकीकृत पारिस्थितिकी तंत्र की नींव रख रही हैं, जहां उत्पादन, कीट निगरानी और बाजार तक पहुंच तेजी से परस्पर जुड़ी हुई हैं।
इसीलिए फसल संरक्षण को सुधारों के अगले चरण का एक केंद्रीय हिस्सा बनाना चाहिए। रिकॉर्ड स्तर पर उत्पादन और निर्यात करने वाले देश को फसलों की सुरक्षा और वैश्विक बाजारों में अपनी प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त बनाए रखने के लिए एक आधुनिक प्रणाली की आवश्यकता है। फसल संरक्षण उत्पादकता, किसानों की आय, खाद्य सुरक्षा और निर्यात की तैयारी के परस्पर संबंध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कीटों का प्रकोप उपज को कम कर सकता है। गलत उत्पाद या अनुचित प्रयोग से अवशेषों के अनुपालन में बाधा आ सकती है। मिलावटी सामग्री किसान की फसल को नुकसान पहुंचा सकती है और मूल्य श्रृंखला में विश्वास को कमजोर कर सकती है। ये दबाव लगातार बढ़ रहे हैं। जलवायु परिवर्तनशीलता कीटों के व्यवहार और उनके प्रकोप के समय को बदल रही है।
साइंस पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, गेहूं, चावल और मक्का की फसलों में कीटों से होने वाली उपज हानि प्रत्येक डिग्री सैल्सियस तापमान वृद्धि के साथ 10.25 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। संसद के समक्ष प्रस्तुत आधिकारिक अनुमानों के अनुसार, फसल और मौसम के आधार पर, भारत में वार्षिक फसल हानि का लगभग 10.35 प्रतिशत हिस्सा कीटों, रोगों और खरपतवारों के कारण होता है। इसके अलावा, क्रॉपलाइफ इंडिया और येस बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, कीटों के कारण प्रतिवर्ष लगभग 2 लाख करोड़ रुपए की फसल का नुकसान होता है।
कीटों के कारण बाजार तक पहुंच में भी चुनौतियां उत्पन्न हो रही हैं। यूरोपीय संघ की टैक्स प्रणाली, अमरीका की आयात अस्वीकृति प्रणाली और ई.डी.ए. की निर्यात सलाह से पता चलता है कि उच्च मूल्य वाले बाजारों में अवशेष अनुपालन एक लगातार चिंता का विषय बन गया है। लेबनान को चावल निर्यात पर ई.डी.ए. की सलाह से स्पष्ट होता है कि कैसे एक बाजार में अवशेष संबंधी चिंताएं अन्य बाजारों की आवश्यकताओं को तेजी से प्रभावित कर सकती हैं। असम की चाय भी इसी तरह की चुनौती का सामना कर रही है, रिपोर्टों में चेतावनी दी गई है कि यूरोपीय संघ द्वारा अवशेषों पर लगाई गई सख्त पाबंदियां यूरोप और ब्रिटेन को निर्यात होने वाली लगभग 4 करोड़ किलोग्राम उच्च गुणवत्ता वाली असम चाय को प्रभावित कर सकती हैं। भारत की प्रतिक्रिया उत्पादन स्तर से ही शुरू होनी चाहिए। अनुपालन तभी संभव है जब किसानों को पता हो कि कौन सा उत्पाद किस फसल के लिए स्वीकृत है, इसे कैसे प्रयोग करना चाहिए, कब प्रयोग करना चाहिए और फसल की कटाई से पहले कितना समय लगना चाहिए।
एकीकृत कीट प्रबंधन को व्यवहार में अधिक महत्वपूर्ण बनाना होगा। निगरानी, सही निदान, आर्थिक सीमाएं, प्रतिरोधी किस्में, खेत की स्वच्छता और फसल सुरक्षा उत्पादों का जिम्मेदार उपयोग, इन सभी की इसमें भूमिका है। बेहतर कीट प्रबंधन अंतत: सही उपयोग पर आधारित है, न कि अधिक उपयोग पर। फसल संरक्षण प्रौद्योगिकियों के व्यापक समूह तक पहुंच किसानों को अपनी फसलों और कीटों के दबाव के लिए सबसे प्रभावी समाधान चुनने में सक्षम बनाती है।
यूरोपीय संघ, अमरीका और चीन सहित प्रमुख कृषि प्रधान अर्थव्यवस्थाएं नवाचार को प्रोत्साहित करने के लिए समयबद्ध नियामक डाटा संरक्षण प्रदान करती हैं। भारत भी नए अणुओं के लिए एक सुनियोजित ढांचा तैयार कर सकता है जो स्वतंत्र डाटा निर्माण और अंतत: जैनेरिक दवाओं के बाजार में आने के माध्यम से प्रतिस्पर्धा को बनाए रखते हुए उन्नत प्रौद्योगिकियों तक शीघ्र पहुंच को बढ़ावा दे। ऐसा मॉडल आज किसानों को लाभ पहुंचाएगा और समय के साथ घरेलू विनिर्माण और निर्यात के अवसरों का विस्तार करेगा। कृषि सुधारों के उत्सव को कृषि सुधारों की परिणति के रूप में नहीं, बल्कि अगले चरण के आगमन के रूप में देखा जाना चाहिए। भारत ने अपने उत्पादन आधार को मजबूत किया है, निर्यात-उन्मुख प्रणालियां विकसित की हैं और डिजिटल कृषि को अपनाया है। फसल संरक्षण नियमों को अब इस परिवर्तन के साथ तालमेल बिठाना होगा।-अंकुर अग्रवाल