असली देशद्रोही तो मिलावटखोर हैं

Edited By Updated: 01 Sep, 2026 03:50 AM

the real traitors are the adulterators

रक्षाबंधन अभी गुजरा है। अपने देश की विविधता भी यही है कि यहां लगभग हर रोज कोई न कोई त्यौहार है, पर्व है। अपने और आसपास के लोगों से मिलने-जुलने का अवसर है। भारत के लोगों की यह उत्सवधर्मिता ही है कि किसी से लड़ने-झगड़ने के मुकाबले वे आनंद और उत्सव...

रक्षाबंधन अभी गुजरा है। अपने देश की विविधता भी यही है कि यहां लगभग हर रोज कोई न कोई त्यौहार है, पर्व है। अपने और आसपास के लोगों से मिलने-जुलने का अवसर है। भारत के लोगों की यह उत्सवधर्मिता ही है कि किसी से लड़ने-झगड़ने के मुकाबले वे आनंद और उत्सव मनाते हैं। हर प्रदेश के भी अनेक त्यौहार हैं, जिन्हें मनाने के अपने-अपने तौर-तरीके, खान-पान हैं। लेकिन लगभग एक दशक से देख रही हूं कि जब भी कोई त्यौहार आता है, मिलावट की बातें की जाने लगती हैं। न जाने क्यों उत्सवों और बड़े त्यौहारों से पहले सब सोए रहते हैं। या कि मिलावट सिर्फ त्यौहारों पर ही होती है। बात तो यह है कि यदि मिलावट और नकली कारोबार के लिए कोई गोल्ड मैडल देना हो, तो हमें प्रथम स्थान मिल सकता है।

इस बार तो सावन के महीने में नकली खोया और पनीर के वीडियो भी बड़ी संख्या में दिखे। रसगुल्लों के बारे में भी खबर पढ़ी कि उन्हें सफेद करने के लिए कपड़े धोने में इस्तेमाल होने वाले विषैले रसायन का इस्तेमाल किया जा रहा था। नकली दूध बनाने के लिए तो डिटर्जैंट का इस्तेमाल जैसे आम ही हो चला है। असली घी के बारे में कहा जाता है कि एक किलो घी घर में बनाने के लिए 1600 से 1800 रुपए का मक्खन आता है। ऐसे में बाजार में मिलने वाला शुद्ध घी कम दामों में कैसे मिल जाता है। बहुत से लोग बताते हैं कि कानपुर के चमड़ा उद्योग से भारी मात्रा में लेकर चर्बी का इस्तेमाल घी बनाने में होता है। इसे ही बहुत मिलावटखोर असली घी की तरह पेश कर देते हैं। सरसों के तेल में भी मिलावट पकड़ी जाती है। यही नहीं, फलों, सब्जियों तक में जहरीले रसायनों की मिलावट है। एक बार किसी ने वीडियो डाला था कि मटर को हरा बनाने के लिए उसमें कपड़े रंगने का हरा रंग मिलाया जा रहा था।

महाराष्ट्र में एक तुकाराम मुंडे जब नकली और घटिया खाद्य पदार्थों को पकडऩे के लिए होटलों पर छापे मारते हैं, तो वह राष्ट्रीय हीरो बन जाते हैं, जो एक अच्छी बात भी है लेकिन दूसरे ऐसा क्यों नहीं करते? इससे यह भी पता चलता है कि मिलावट का कारोबार कितना बड़ा है। कोई कठोर कानून बन भी जाए, तो तब तक इससे निजात पाना सम्भव नहीं, जब तक कि उन लोगों को शर्म न आए, जो ऐसा कर रहे हैं। खाने-पीने की चीजों की तो बात क्या, नकली दवाओं की भी भरमार है। ग्लूकोज तक नकली। एक लड़के ने फेसबुक पर लिखा था कि नकली ग्लूकोज के कारण इन्फैक्शन हुआ और उसका हाथ काटना पड़ा। कुछ साल पहले दिल्ली के एक बड़े कैंसर अस्पताल में कीमोथैरेपी की नकली दवाओं को सप्लाई करने वालों को पकड़ा गया था।

हाल ही में एक डाक्टर ही कैंसर के नकली इंजैक्शन एक लाख रुपए में बेच रहा था। इस संदर्भ में बचपन में गांव की आंखों देखी घटना याद आती है। उन दिनों एक दर्द निवारक दवा बहुत लोकप्रिय थी। उसके विज्ञापन जगह-जगह दीवारों पर लिखे रहते थे। गांव में पड़ोस के घर में एक आदमी आता। इसी दवा के छपे हुए रैपर और चूरा देकर जाता। खाली समय में उस घर की स्त्रियां इसकी पुडिय़ां बनाती थीं। आसपास सभी को पता था कि नकली दवा बनाई जा रही है लेकिन शायद ही कभी कोई पकड़ा गया। 

मिलावटखोरी के इस माफिया का लाभ उठाकर अन्य निहित स्वार्थ भी सक्रिय हो जाते हैं। जैसे कि खाद्य पदार्थों की मिलावट के बारे में एक बड़े पत्रकार ने बताया था कि कई बार नकली उन्हें भी कह दिया जाता है, जहां कोई विषैली चीज नहीं मिली होती। उदाहरण के तौर पर बड़े हलवाई कहते हैं कि देश में दूध का उत्पादन जितना है, उसके मुकाबले दूध के उत्पादों की मांग बहुत ज्यादा है। ऐसे में खोए में कई बार मैदा मिलाना पड़ता है। इसे ही नकली मान लिया जाता है।  फिर त्यौहार मिठाइयों की बिक्री का बड़ा अवसर होते हैं। ऐसे में बहुत से विदेशी खाद्य पदार्थ मैदान में आ जाते हैं। अर्से से ऐसी कोशिश हो रही है, जब ‘कुछ मीठा हो जाए’ के नाम पर चॉकलेट खाने की बात की जाती है। लेकिन जब नकली चीजें पकड़ी जाती हैं, तो बहुत नकारात्मकता छा जाती है, जैसे इस बार रक्षाबंधन के अवसर पर हुआ और मैंने बिल्कुल मिठाई नहीं खरीदी।इन बातों पर कुछ दिन शोर-शराबा होता है।

मीडिया में खबरें आती हैं, फिर खामोशी छा जाती है। जिन्हें पकड़ा गया, उन्हें क्या सजा हुई, यह कभी पता नहीं चलता। इन बातों पर कोई ठोस सरकारी कार्रवाई भी शायद ही कभी नजर आती है। लोगों को मामूली बातों पर देशद्रोही कह दिया जाता है। असली देशद्रोही तो वे हैं, जो नकली खाद्य पदार्थ, दवाएं और न जाने क्या-क्या बेच कर भारी मुनाफा कमा रहे हैं। लोगों की जान ले रहे हैं और देश को बदनाम भी कर रहे हैं। ऐसे में आदमी करे तो क्या करे? क्या खाए, कहां जाए? किससे शिकायत करे? क्योंकि अक्सर जिन लोगों पर इन शिकायतों को पकडऩे की जिम्मेदारी होती है, वे ही मिलावटखोरों से मिल जाते हैं।-क्षमा शर्मा 

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