Edited By ,Updated: 15 Jan, 2026 05:39 AM

सुप्रीम कोर्ट फिलहाल आवारा कुत्तों के मुद्दे पर कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। जहां एक तरफ याचिकाएं आवारा कुत्तों के खतरे से निपटने के लिए अधिकारियों द्वारा सख्त कार्रवाई की मांग कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ याचिकाएं जानवरों के अधिकारों के पक्ष में...
सुप्रीम कोर्ट फिलहाल आवारा कुत्तों के मुद्दे पर कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। जहां एक तरफ याचिकाएं आवारा कुत्तों के खतरे से निपटने के लिए अधिकारियों द्वारा सख्त कार्रवाई की मांग कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ याचिकाएं जानवरों के अधिकारों के पक्ष में हैं।
यह एक साल में चौथी बार है, जब सर्वोच्च न्यायालय इस मामले पर विचार कर रहा है। पिछले साल कोर्ट की एक डिवीजन बैंच ने दिल्ली सरकार को नगर निगम क्षेत्रों से सभी आवारा कुत्तों को हटाने और उन्हें इंसानी बस्तियों से दूर डॉग शैल्टर में भेजने का आदेश देकर हलचल मचा दी थी। काफी हंगामे के बाद, सुप्रीम कोर्ट की एक दूसरी बैंच ने इस आदेश पर रोक लगा दी और कहा कि कोर्ट के पिछले आदेश को लागू करना संभव नहीं है। इसके बाद, एक और बैंच ने फैसले को पलट दिया और शैक्षणिक संस्थानों, खेल परिसरों, अस्पतालों और बाजारों जैसे सार्वजनिक स्थानों से सभी आवारा कुत्तों को हटाने का आदेश दिया। ताजा सुनवाई, जो कोर्ट ने खुद शुरू की थी, कई दिनों से चल रही है तथा कुछ और दिनों तक जारी रहने की संभावना है। नि:संदेह यह एक गंभीर मुद्दा है और अधिकारी एक व्यवहार्य और प्रभावी समाधान खोजने में विफल रहे हैं।
नैशनल सैंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (एन.सी.जी.सी.) ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट में कहा था कि 2024 में कुत्तों के काटने के कुल मामले 37,17,336 थे, जबकि ‘संदिग्ध मानव रैबीज से होने वाली मौतों’ की कुल संख्या 54 थी। इनमें पालतू कुत्तों के काटने के मामले भी शामिल हैं, लेकिन ऐसे मामले बहुत कम हैं। यह एक सच्चाई है कि बहुत से लोग, खासकर बुजुर्ग, कुत्तों के झुंड द्वारा हमला किए जाने के डर से टहलने के लिए बाहर जाने से हिचकिचाते हैं। ऐसे हमलों की संख्या, खासकर बच्चों पर, पूरे देश में बढ़ रही है।
एक याचिका पर जवाब देते हुए, पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने सरकार को आवारा कुत्तों के काटने के मामलों में पीड़ितों को 10,000 रुपए की दर से मुआवजा देने का निर्देश दिया था। इसी तरह पालतू कुत्तों के मालिकों को भी पीड़ितों को उसी दर से मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था। हालांकि यह एक थकाऊ प्रक्रिया है और अब तक बहुत कम लोगों ने दावा किया है। दूसरी ओर, कुत्ता प्रेमियों को आवारा कुत्तों को खाने की चीजें बांटते देखना आम बात है। कुछ लोग ऐसा हर दिन करते हैं और कुत्तों के झुंड उनके आने का इंतजार करते हैं। सोसाइटी फॉर प्रिवैंशन ऑफ क्राइम्स अगेंस्ट एनिमल्स, जिसका गठन पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने किया था, जानवरों के खिलाफ अपराधों के मामलों को सक्रिय रूप से उठा रही है। कुछ लोग आवारा कुत्तों की संख्या में तेजी से बढ़ौतरी और कुत्ते के काटने के मामलों के लिए उन्हें और संगठन को भी दोषी ठहराते हैं।
एनिमल बर्थ कंट्रोल (ए.बी.सी.) रूल्स, 2023, जिसमें ‘आवारा कुत्तों’ की बजाय ‘कम्युनिटी एनिमल्स’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है, इन जानवरों को खाना खिलाने का प्रावधान करता है। ‘यह रैजिडैंट वैल्फेयर एसोसिएशन या अपार्टमैंट ओनर्स एसोसिएशन या लोकल बॉडी के प्रतिनिधि की जिम्मेदारी होगी कि वे दया भाव से कम्युनिटी एनिमल्स को खाना खिलाने के लिए जरूरी इंतजाम करें’। नियमों में बताया गया है कि खाना खिलाने की जगहें सीढिय़ों, बिल्डिंग के एंट्री गेट और बच्चों के खेलने की जगह जैसी ज्यादा भीड़भाड़ वाली जगहों से दूर होनी चाहिएं और कम्युनिटी कुत्तों को तय समय पर खाना खिलाया जाना चाहिए। नियम मानते हैं कि ये कुत्ते बिना मालिक वाले घुसपैठिए नहीं, बल्कि इलाके के जीव हैं, जो अपने स्थानीय माहौल में रहते हैं और वहीं के हैं। जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एन.वी. अंजारिया, जो अभी इस मामले की सुनवाई कर रहे हैं, ने कहा है कि नगर निगम अधिकारी अब जवाबदेही से बच नहीं सकते, क्योंकि एनिमल बर्थ कंट्रोल (ए.बी.सी.) रूल्स, 2023 के तहत कानूनी जिम्मेदारियों का पालन करने में उनकी नाकामी ने संकट को और बढ़ा दिया है।
बैंच ने संकेत दिया है कि वह राज्यों पर ‘भारी मुआवजा’ लगाएगी और कुत्ते के काटने से चोट लगने या मौत के मामलों में आवारा कुत्तों को खाना खिलाने वाले व्यक्तियों की भी जवाबदेही तय करेगी। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि ऐसे हमलों के अक्सर ‘पूरी जिंदगी’ तक असर रहते हैं और सवाल किया कि आवारा कुत्तों को खाना खिलाने वालों को जानवरों को अपने घरों या परिसर में रखकर जिम्मेदारी क्यों नहीं लेनी चाहिए?
इसमें कोई शक नहीं कि आवारा कुत्तों का मुद्दा एक जटिल समस्या है, लेकिन इससे पूरी संवेदनशीलता के साथ निपटा जाना चाहिए। जाहिर है, सरकारों ने इस समस्या पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया। आवारा कुत्तों की आबादी को नियंत्रित करने के लिए नसबंदी के जरिए आधे अधूरे प्रयास किए गए हैं लेकिन जमीन पर इसका कोई साफ असर नहीं दिख रहा। सुप्रीम कोर्ट को जवाबदेही तय करनी चाहिए और आवारा कुत्तों की नसबंदी करके समस्या से निपटने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा उठाए गए कदमों की बारीकी से निगरानी की व्यवस्था करनी चाहिए। इसे उन दूसरे देशों द्वारा उठाए गए कदमों का भी अध्ययन करना चाहिए, जिन्होंने इस मुद्दे को सफलतापूर्वक संभाला है।-विपिन पब्बी