दुनिया किसी ‘नई विश्व व्यवस्था’ की ओर नहीं बढ़ रही

Edited By Updated: 29 Jan, 2026 05:46 AM

the world is not moving towards a  new world order

हर कुछ दशकों में, जब वैश्विक अस्थिरता बढ़ती है, तब एक परिचित शब्द सुनाई देने लगता है-विश्व व्यवस्था (वल्र्ड ऑर्डर)। हालिया दिनों में अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के कुछ तल्ख बयानों और हैरानी भरे कदमों के बाद यह शब्दावली फिर चर्चा में है। अब इसे...

हर कुछ दशकों में, जब वैश्विक अस्थिरता बढ़ती है, तब एक परिचित शब्द सुनाई देने लगता है-विश्व व्यवस्था (वल्र्ड ऑर्डर)। हालिया दिनों में अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के कुछ तल्ख बयानों और हैरानी भरे कदमों के बाद यह शब्दावली फिर चर्चा में है। अब इसे ‘नई विश्व व्यवस्था’ के रूप में पेश किया जा रहा है। लेकिन इतिहास साक्षी है कि ऐसी कोई स्थायी वैश्विक व्यवस्था कभी नहीं रही। असल दुनिया में हमेशा एक बात का वजन होता है और वह शक्तिशाली का कमजोर पर प्रभुत्व है। गत 20 जनवरी को ट्रम्प ने अपने सोशल मीडिया मंच पर ए.आई. निर्मित एक विवादित तस्वीर सांझी की। उसमें उन्होंने कनाडा, ग्रीनलैंड और वेनेजुएला को अमरीकी क्षेत्र के रूप में दिखाया। वह तस्वीर अमरीकी राष्ट्रपति के कार्यालय की थी, जिसमें शीर्ष यूरोपीय नेताओं की भी मौजूदगी थी। कुछ दिन पहले, 8 जनवरी को ट्रम्प ने ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ को साक्षात्कार देते हुए कहा था, ‘‘मुझे किसी अंतर्राष्ट्रीय कानून की जरूरत नहीं, मेरी शक्ति की सीमा सिर्फ मेरी नैतिकता है।’’

यह संकेत इतिहास के संदर्भ में विडंबनाओं से भरा है, क्योंकि अमरीका खुद साम्राज्यवादी नियंत्रण के खिलाफ विद्रोह से पैदा हुआ वह देश है, जो पहले ही अमरीकी महाद्वीप पर बाहरी अधिकार की भयावह क्रूरता को झेल चुका था। 1492 में इतालवी क्रिस्टोफर कोलम्बस ने स्पेन के ईसाई राजा के लिए अमरीका की ‘खोज’ की। लंबी समुद्री यात्रा करके अमरीका पहुंचे कोलम्बस का वहां जिन मूल निवासियों ने स्वागत किया, उन्हें और उनकी ‘पेगन’ संस्कृति-सभ्यता को मजहब के नाम पर मिटाकर अमरीकी संग्रहालय में शोभा बढ़ाने की वस्तु तक गौण कर दिया है। सदियों बाद संभवत: पहली बार यूरोप खुद अपने द्वारा स्थापित साम्राज्यवादी हनक को महसूस कर रहा है। ट्रम्प की ‘साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं’ की आलोचना उसी यूरोपीय महाद्वीप से आ रही है, जिसका इतिहास ही आक्रमण, औपनिवेश और नस्लीय भेदभाव से भरा है। फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने स्विट्जरलैंड स्थित दावोस में ‘विश्व आॢथक मंच’ से ट्रम्प को घेरते हुए कहा था, ‘‘यह नए साम्राज्यवाद का समय नहीं है।’’ यह वही फ्रांस है, जो आज भी कैरीबियाई क्षेत्र से ङ्क्षहद महासागर तक कई क्षेत्रों का अपना प्रशासन चलाता है। अल्जीरिया में फ्रांसीसी शासन के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम (1954-62) में लगभग 15 लाख लोग मारे गए थे।

जर्मनी के वित्त मंत्री ने चेतावनी दी कि वह ट्रम्प के दबाव के आगे नहीं झुकेंगे। वहीं फ्रांसीसी वित्त मंत्री के अनुसार, 250 साल पुराने सहयोगी अब शुल्क को हथियार बना रहे हैं। वहीं कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने विश्व व्यवस्था को ‘एक सुखद भ्रम का अंत’ बताया है। सच तो यह है कि तथाकथित ‘विश्व व्यवस्था’ कभी सार्वभौमिक नैतिक समझौता नहीं रहा, बल्कि यह नियम बनाने वालों के हित में बना अग्रिम उपक्रम था। इसलिए पश्चिमी दुनिया के मुंह से नैतिकता की बात करना छलावा जैसा है। पुर्तगाली वास्को डी गामा और स्पेनवासी जेसुइट मिशनरी फ्रांसिस जेवियर आदि के 16वीं शताब्दी में भारत पहुंचने का घोषित लक्ष्य स्थानीय पूजा-पद्धति को मिटाकर ईसाइयत का विस्तार करना था। इसमें हिंदुओं, मुसलमानों और स्थानीय ईसाइयों पर जो उत्पीडऩ हुआ, उसका नृशंस इतिहास है। कई प्रामाणित लेखकों के साथ संविधान निर्माता डा. भीमराव रामजी आंबेडकर के साहित्य में भी इन सभी निर्मम घटनाओं का स्पष्ट उल्लेख है। वैटिकन और कैथोलिक चर्च दुनिया के कुछ हिस्सों (कनाडा सहित) में अपने ‘अपराधों’ पर खेद जता चुका है, जो कोई पश्चाताप न होकर केवल छवि सुधार का हिस्सा है।

यदि यूरोप का अतीत कलंकित है, तो अमरीका का इतिहास रणनीतिक भूलों से भरा है। उसने ही साम्राज्यवादी चीन के विश्व उदय का रास्ता खोला था। वर्ष 1999 में व्यापार समझौता और 2001 में ‘विश्व व्यापार संगठन’ में प्रवेश दिलाकर अमरीका ने चीन को उत्पादन का वैश्विक केंद्र बना दिया। तब चीन की जी.डी.पी. 1.2 ट्रिलियन डॉलर थी, जबकि अमरीका की 10.3 ट्रिलियन डॉलर। आज वही चीन 19.5 ट्रिलियन डॉलर के साथ अमरीका के करीब पहुंच गया है, जिसका तिब्बत पर कब्जा है, कई देशों (भारत सहित) से चीन का सीमा (समुद्री क्षेत्र सहित) विवाद है और अपनी दूषित कर्ज-नीति से श्रीलंका जैसे कुछ देशों को तबाह कर चुका है। 

अमरीका दशकों से ताकत दिखाता रहा है। वियतनाम, ईराक, अफगानिस्तान और वेनेजुएला इसके प्रमाण हैं। 1980 के दशक में अमरीका ने अफगानिस्तान में तत्कालीन सोवियत संघ के खिलाफ जिन मुजाहिदीनों को पैदा किया, बाद में उन्हीं से तालिबान के रूप में उसे लडऩा पड़ा और फिर 2 दशक बाद उन्हीं तालिबानियों से समझौता करके अपने हथियारों को छोड़कर वापस चलता बना। लेकिन अमरीका में लोकतंत्र है, चुनाव होते हैं और अदालतें हैं-इसलिए वहां सुधार की संभावना अधिक है। परंतु चीन में ऐसा नहीं है। वहां सत्ता केंद्रीकृत है, विरोध-असहमति की जगह नहीं। इसी कारण चीन का उदय अधिक चिंताजनक है।

शक्ति-संतुलन के इस कठोर खेल में भारत के लिए संदेश बिल्कुल स्पष्ट है-सहयोग करें लेकिन समर्पण नहीं। कूटनीतिक चाशनी में डूबे शब्दों पर तुरंत विश्वास न करें। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति भावनाओं से नहीं, हितों और ताकत से चलती है। इसलिए दुनिया किसी ‘नई विश्व व्यवस्था’ की ओर नहीं बढ़ रही, वह दरअसल उसी पुरानी, कठोर सच्चाई की ओर लौट रही है, जहां कमजोर की नैतिकता उपदेश लगती है, जबकि शक्तिशाली की नैतिकता नियम बन जाती है।-बलबीर पुंज

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