जातिवार जनगणना में विवाद के बिंदू तो हैं ही!

Edited By Updated: 27 Aug, 2026 03:39 AM

there are definitely points of controversy in caste wise census

माना जाता है कि 2011 की जनगणना में जाति की सूचना जोडऩे का फैसला जिस राजनीतिक दबाव में लिया गया, उसे बनाने में शरद यादव की भूमिका सबसे बड़ी थी। मंडल की राजनीति से देश में चॢचत हुए शरद यादव को इस मुहिम की हवा कमजोर होते जाने का अंदाजा था और उसके...

माना जाता है कि 2011 की जनगणना में जाति की सूचना जोडऩे का फैसला जिस राजनीतिक दबाव में लिया गया, उसे बनाने में शरद यादव की भूमिका सबसे बड़ी थी। मंडल की राजनीति से देश में चॢचत हुए शरद यादव को इस मुहिम की हवा कमजोर होते जाने का अंदाजा था और उसके कारणों को दूर करना उनके वश में न था। एक बड़ा कारण तो मंडल का राजनीतिक लाभ गिनती के परिवारों में सिमट जाना था। लेकिन उनको भरोसा था कि एक बार जब जातिवार गिनती के आंकड़े सामने आएंगे तो फिर से जाति का विमर्श राजनीति के केंद्र में आ जाएगा। यह गिनती हुई भी लेकिन ऐसा नतीजा नहीं निकला। उसकी वजह जातिवार आंकड़े कभी जारी ही न हो पाना है। पहले यह लगता रहा कि कांग्रेस की अगुवाई वाली यू.पी.ए. सरकार की इच्छा न थी और वह शुरू से टाल-मटोल कर भी रही थी। उसने मुख्य जनगणना के सवालों में जाति वाली सूचना मांगी भी नहीं थी। 

यह सर्वे बाद में हुआ। लेकिन बाद में यह जाहिर हुआ कि आंकड़े बहुत ही खराब स्वरूप में आए हैं और अगर उनको जारी किया गया तो झगड़े बढ़ेंगे और जातियों का आपसी संबंध कलह में बदल सकता है। योजना बनाने, संसाधनों के बंटवारे और सत्ता में हिस्सेदारी के बंटवारे के जिस उद्देश्य से इसे कराने का आग्रह किया गया था वह कोई भी लक्ष्य पूरा होता नहीं दिख रहा था। फिर न आंकड़े जारी हुए न कारण बताया गया। मनमोहन सरकार अपनी आदत के अनुसार आलोचना सुनकर भी चुप रही और विपक्ष, जिसमें भाजपा भी शामिल थी, इस चूक या गलती का ठीकरा सरकार के सिर फोड़कर अपनी राजनीति चमकाता रहा। इसमें मंडल वाला खेमा तो निरंतर कमजोर पड़ता गया और 2 राज्यों तथा परिवारों की राजनीति तक सिमट गया। लेकिन अब अचानक पाला पलटा क्योंकि विपक्ष के नेता राहुल गांधी जातिवार जनगणना के पक्ष में हो गए। उन्होंने कांग्रेसी सरकारों द्वारा लगाई गई देरी को गलत कहना भी शुरू किया। अब तो उन्होंने पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के साथ इस मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी भी लिखी है। 

यह शुरुआत तब हुई, जब बिहार सरकार ने अपने यहां जातिवार जनगणना का फैसला किया और कांग्रेस उस सरकार में शामिल थी। सहमति तो बिहार भाजपा ने भी दी थी लेकिन केंद्र सरकार ने इसे रोकने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाने से लेकर हर उपाय किए। लेकिन जब राहुल गांधी और उनके पीछे पूरी मंडलवादी धारा ने जातिवार जनगणना को एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना दिया, तो भाजपा को भी पक्ष में दिखने की मजबूरी हो गई। राहुल को अब यह अपना एक नया हथियार लगने लगा।  लेकिन भाजपा जातिवार जनगणना तो क्या, सामान्य जनगणना कराने से भी हिचकती रही है। इसके क्या कारण हो सकते हैं, इसका अनुमान भर लगाया जा सकता है लेकिन उसकी चर्चा यहां करने का मतलब नहीं है। मतदाता सूची के पुनरीक्षण और नागरिकता के सवालों पर उसका रवैया भी समझ में नहीं आता। संयोग से 2020 के आसपास फैले कोविड ने उसे एक बहाना भी दे दिया। 

 कई मामलों में इसके पीछे संघ को माना जाता रहा है। वैसे संघ आरक्षण के पक्ष में बयान देता रहा है और चुनावी मजबूरियों के चलते पिछड़ों को स्थान देना शुरू किया। नरेंद्र मोदी का पिछड़ा होना सिर्फ वोट की राजनीति के लिए सुविधा बढ़ाने वाला साबित हुआ है, नजरिया बदलने वाला नहीं। पर जब राहुल की अगुवाई में लगभग पूरे विपक्ष और भाजपा के अंदर के पिछड़े तबके ने दबाव बनाया तो उसने देर से शुरू हुई जनगणना के साथ जातिवार गणना का प्रस्ताव भी स्वीकार कर लिया था। मगर एक बार जनगणना का शुरुआती हिसाब हो जाने के बाद जाति की गिनती जब शुरू होने वाली थी तो खबर आई कि जनगणना के फार्म में सीधे वही सूचना दर्ज कर ली जाएगी जो सामने वाला व्यक्ति अपनी जाति को लेकर कहेगा। इसमें न तो उससे कोई प्रमाण देने को कहा जाएगा और न ही सरकार अपने वर्गीकरण के हिसाब से उसकी जाति दर्ज करने की कोशिश करेगी। 

दलितों के मामले में ऐसा नहीं है। वहां उनकी जाति अनुसूचित जातियों की सूची के हिसाब से दर्ज हो रही है। ऐसी गड़बड़ खास तौर से ओ.बी.सी. वर्ग के साथ हो रही है, जिनकी संख्या का हिसाब ही राजनीति, अर्थनीति और समाज नीति के हिसाब से सबसे महत्वपूर्ण है। यह समाज की सबसे बड़ी जमात है भी और राजनीतिक बदलाव को इसी जमात के लोग नेतृत्व दे रहे हैं। और यह स्थिति तब है जबकि केंद्र सरकार और हर राज्य सरकार ने अपने यहां की ओ.बी.सी. जमात की जातियों की आधिकारिक सूची तय कर रखी है। मंडल वाले आरक्षण के लिए यह बुनियादी जरूरत है। और लग रहा है कि बात 2011 वाले अनुभव पर ही जाकर रुकेगी और जातियों का हिसाब साफ नहीं हो पाएगा। 

2011 में जब लोगों को अपनी मर्जी से जाति बताने और उसी सूचना को दर्ज करने का काम हुआ तो देश में 46.7 लाख जातियां निकल आईं और इनमें कौन अगड़ा है कौन पिछड़ा, इसका कोई हिसाब सामने नहीं आया। जब अंग्रेजी राज में जातिवार जनगणना होती थी, तब हर बार अनेक पिछड़ी जातियों की तरह से खुद को क्षत्रिय या ब्राह्मण होने का दावा पेश होता था और इसे निपटाना ज्यादा मुश्किल नहीं होता था। और अनेक लोगों का मानना है कि जातियों का मौजूदा स्वरूप इन्हीं जनगणनाओं के ऐसे विवादों से तय हुआ है, उससे पहले उनका स्वरूप ऐसा न था। लेकिन अब तो ऊंची जाति वाले भी खुद को पिछड़ा और दलित बताने की होड़ में हैं, जिससे आरक्षण का लाभ मिल जाए। 

सरकारी नौकरी पाने के लिए बेईमानी होना आम है। ऐसे में वह निर्णय तो करना होगा। दिलचस्प है कि 1931 में जब आखिरी जातिवार जनगणना हुई थी, तब 4147 जातियां गिनी गई थीं। 1980 के दशक में समाजशास्त्री कुमार सुरेश सिंह के नेतृत्व में भारतीय समाज के व्यापक सर्वेक्षण में भी करीब 3800 जातियां गिनी गई थीं। पर सरकार चाहेगी तब यह हिसाब है, अगर वही टालना चाहती है तो जातिवार जनगणना का क्या होगा, कहा नहीं जा सकता।-अरविंद मोहन
 

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