328 पवित्र स्वरूपों के मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए

Edited By Updated: 09 Jan, 2026 06:02 AM

there should be no politics on the issue of the 328 sacred idols

श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के 328 पवित्र स्वरूपों के गायब होने का मुद्दा सिर्फ एक प्रशासकीय विवाद नहीं, बल्कि यह पंजाब की राजनीति, सिख समुदाय की एकता, एस.जी.पी.सी.  की साख और सरकार की नीयत के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। सिख धर्म में श्री गुरु ग्रंथ...

श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के 328 पवित्र स्वरूपों के गायब होने का मुद्दा सिर्फ एक प्रशासकीय विवाद नहीं, बल्कि यह पंजाब की राजनीति, सिख समुदाय की एकता, एस.जी.पी.सी.  की साख और सरकार की नीयत के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। सिख धर्म में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी को सिर्फ एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि एक जीवित गुरु माना जाता है। इस वजह से पवित्र स्वरूपों का गायब होना सिख समुदाय के लिए गंभीर ङ्क्षचता का विषय है। इस मुद्दे ने सिख समुदाय में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि अगर पवित्र स्वरूपों की देखभाल करने वाली संस्थाएं ही लापरवाह रहेंगी, तो पंथक रीति-रिवाजों और धार्मिक भावनाओं की रक्षा कैसे की जा सकेगी। यह मुद्दा आज नहीं उठा। अगर पीछे देखें, तो माना जाता है कि यह मामला 2013 से 2015 के बीच शुरू हुआ था और तब सामने आया, जब पंजाब मानवाधिकार संगठन ने 26 जून, 2020 को जत्थेदार श्री अकाल तख्त और पंजाब सरकार को एक चिट्ठी लिखी। इसके बाद एस.जी.पी.सी. के प्रिटिंग विभाग के एक कर्मचारी ने 29 जून, 2020 को शिरोमणि कमेटी को चिट्ठी लिखी।

कुछ समय बाद, 4 नवम्बर, 2020 को दरबार साहिब के पूर्व हजूरी रागी बलदेव सिंह वडाला के नेतृत्व में सद्भावना दल ने कानूनी कार्रवाई करने के लिए पक्का धरना शुरू किया और बाद में गुरवतन सिंह नाम के एक व्यक्ति ने 21 नवम्बर को एस.जी.पी.सी. और पंजाब सरकार को एक रिप्रैजैंटेशन दिया। 11 मार्च को गुरवतन सिंह ने एस.जी.पी.सी. और पंजाब सरकार को एक कानूनी नोटिस भेजा। दोनों संबंधित पक्षों द्वारा कार्रवाई न किए जाने के कारण, गुरवतन सिंह ने 12 अप्रैल को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में एक रिट याचिका दायर की। 28 अगस्त को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने इस आधार पर रिट का निपटारा कर दिया कि पंजाब गृह विभाग ने डी.जी.पी. पंजाब को उचित कार्रवाई करने के लिए लिखा था। लेकिन, इसके बाद भी कोई कार्रवाई न होने पर याचिकाकत्र्ता ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में अदालत की अवमानना की याचिका दायर की, जिस पर माननीय हाईकोर्ट ने 2 अक्तूबर को पंजाब के डी.जी.पी. के खिलाफ नोटिस जारी किया और अगली सुनवाई 16 दिसम्बर तय की।

2 अक्तूबर को जारी नोटिस की जवाबदेही का सामना करने से बचने के लिए, पंजाब पुलिस ने हाईकोर्ट द्वारा तय की गई 16 दिसम्बर की तारीख से कुछ दिन पहले 7 दिसम्बर को एस.जी.पी.सी. के 16 पूर्व कर्मचारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया और 2 लोगों को गिरफ्तार किया। लेकिन सालों तक मामले को आंतरिक जांच के जरिए निपटाने की कोशिश और जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक न करना, एस.जी.पी.सी. की पारदॢशता पर सवाल उठाता है। कई पार्टियों का मानना है कि अगर इस मामले को तुरंत पारदर्शी तरीके से सुलझा लिया गया होता, तो मौजूदा हालात से बचा जा सकता था। एस.जी.पी.सी. की प्रशासनिक क्षमता और जवाबदेही तथा पंजाब सरकार की प्रशासनिक कार्यकुशलता, दोनों पर कोई सवालिया निशान नहीं लगता।

यह मुद्दा मुख्यमंत्री भगवंत मान की सरकार के लिए धर्म और कानून के बीच बैलेंस बनाए रखने की एक बड़ी चुनौती बन गया है। हालांकि सरकार का कहना है कि कानून सबके लिए एक जैसा है और धार्मिक संस्थाएं भी इससे ऊपर नहीं हैं, फिर भी सरकार पर इस मामले को धर्म में दखल के तौर पर न देखने का दबाव है। सरकार के लिए चुनौती यह है कि किसी भी कार्रवाई के दौरान पंथक भावनाओं को ठेस न पहुंचे। पवित्र निशानियों के गायब होने का मुद्दा सिख संस्थाओं और सरकार के लिए जिम्मेदारी का सबक है और सवाल यह उठ रहा है कि क्या एस.जी.पी.सी. और पंजाब सरकार जैसी संस्थाएं अपनी जवाबदेही पक्का करेंगी या नहीं। दोनों ही पक्ष इस मुद्दे पर लोगों का भरोसा जीतने में कामयाब होते नहीं दिख रहे। एस.जी.पी.सी. न तो समय पर काम पूरा कर पाई और न ही अपने लिए गए फैसलों पर कायम रह पाई। दूसरी तरफ, सरकार आम जनता को यह भरोसा दिलाने में भी नाकाम रही है कि वह कानूनी और धार्मिक समझदारी के लिए काम कर रही है। इस मुद्दे पर सरकार का लंबे समय तक चुप रहना और हाईकोर्ट के नोटिस के बाद ही कार्रवाई करना और स्पीकर तथा शिक्षा मंत्री द्वारा एफ.आई.आर. की कॉपी प्रदर्शनकारियों को सौंपना भी सरकार की निष्पक्ष सोच पर सवाल खड़े करता है। जांचों, अंदरूनी रिपोर्टों और हाईकोर्ट के आदेशों, एस.आई.टी. बनाने और गिरफ्तारियों के बावजूद अभी तक 328 पवित्र स्वरूपों का पता नहीं चला है और अब शिरोमणि कमेटी भी कह रही है कि एस.जी.पी.सी. के पास 328 पवित्र स्वरूपों का हिसाब नहीं है। एस.जी.पी.सी. ने भी एस.आई.टी. को दस्तावेज देने से साफ मना कर दिया है।

इसके अलावा, इस मुद्दे को लेकर एक पत्रकार द्वारा अपने चैनल पर जारी ऑडियो, बंटी रोमाना का सरकार पर अपने शपथ पत्र से पलटने का आरोप और पंजाब के स्पीकर के अकाल तख्त के जत्थेदार के बारे में बयान ने इस मुद्दे को धार्मिक से ज्यादा राजनीतिक बना दिया है, जिसकी वजह से यह मुद्दा अभी भी अनसुलझा और गंभीर बना हुआ है। इसलिए एस.जी.पी.सी. और पंजाब सरकार को राजनीति से ऊपर उठकर इस मुद्दे को सुलझाने के लिए कार्रवाई करने की जरूरत है। नहीं तो, भविष्य में इसके नतीजे एस.जी.पी.सी., पंथक संगठनों और मान सरकार पर दूरगामी असर डालेंगे, जो किसी के भी हित में नहीं होगा।-इकबाल सिंह चन्नी
 

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