लुप्त हो रही पुरातन अनाज भंडारण व्यवस्था

Edited By Updated: 25 Mar, 2023 05:43 AM

vanishing ancient grain storage

भारत एक कृषि प्रधान और अनाज के मामले में आत्मनिर्भर देश है। अनाज भंडारण आज भी हमारे देश में एक विकट समस्या ही है और भंडारण की समुचित व्यवस्था न होने के कारण बहुत-सा अनाज खराब हो जाता है। अन्न को वैसे भी भारतीय संस्कृति में ब्रह्म का दर्जा दिया गया...

भारत एक कृषि प्रधान और अनाज के मामले में आत्मनिर्भर देश है। अनाज भंडारण आज भी हमारे देश में एक विकट समस्या ही है और भंडारण की समुचित व्यवस्था न होने के कारण बहुत-सा अनाज खराब हो जाता है। अन्न को वैसे भी भारतीय संस्कृति में ब्रह्म का दर्जा दिया गया है। 

मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई से पता चला कि साढ़े चार हजार साल पहले सिंधु घाटी की सभ्यता में गेहूं की खेती हो रही थी और उस समय तक गेहूं के भंडारण की भी क्षमता प्राप्त कर ली गई थी। जानकारी मिलती है कि 2600 ईसा पूर्व आते आते नगरों की शुरूआत हो गई थी और इसी काल में लोगों ने बड़ी-बड़ी दीवारें और चारदीवारी बनाकर अनाज के भंडारण की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। अनाज भंडारण के लिए प्राचीन समय में टोकरियों, बोरियों और जार, मृदभांड आदि का उपयोग किया जाता था। कुछ समुदायों के पास एक अलग गोदाम(मिट्टी, गोबर, चिकनी मिट्टी के लेप से बना) होता था जहां वे एक बड़े ढेर में अनाज रखते थे। 

प्राचीन काल में और आज भी बहुत से गांवों में बाजरा, गेहूं, मोठ, मूंग व अन्य अनाजों को गोबर, चिकनी मिट्टी व लकडिय़ों, घास-फूस से बनी कोठियों जिन्हें राजस्थान के ग्रामीण इलाकों विशेषकर चूरू, झुंझुनूं, सीकर (शेखावाटी) में ‘कोठी’ या ‘कुठला’ के नाम से जाना जाता है, में वर्षों तक सुरक्षित भंडारण किया जाता था। राजस्थान के गांवों में आज भी अनेक स्थानों पर इन मिट्टी, गोबर, चिकनी मिट्टी के लेप से बनी कोठियों तीज- त्यौहारों व विभिन्न अवसरों पर इन पर मांडने(पशु-पक्षी,फूल-पत्तियां, बेल, मोर,रंगोली, हाथी अल्पना) बनाए जाते हैं। 

वैसे प्राचीन समय में ‘ओबरी’ या ‘ओबरों’ में भी अनाज रखा जाता था लेकिन ओबरी में चार या पांच पाये होते हैं और ये पाये अंदर से थोथे (यानी कि खाली) रखे जाते थे और इनमें अनाज भर दिया जाता था। स्थानीय भाषा में इन्हें ‘कोठ्यार’ (अनाज भंडारण गृह) कहा जाता है।  वैसे आज भी गांव-घरों में शादी-ब्याह में मिठाई रखे जाने वाले कमरों, स्थान को भी कोठ्यार कहा जाता है। राजस्थान ही नहीं पहाड़ी क्षेत्रों में भी इनमें (कुठलों, कोठ्यारों, ओबरों) धान, गेंहू, कोदू, झंगोरा, चौलाई या दालें सुरक्षित रखी जाती हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में  इन्हें (कोठ्यार) ‘कोल्ड स्टोर’ भी कहा जाता है। 

पहाड़ी क्षेत्रों व राजस्थानी क्षेत्र के कोठ्यार में फर्क सिर्फ इतना होता है कि राजस्थान में ये मुल्तानी मिट्टी, गोबर, घास फूस,हल्की लकड़ी के बने होते हैं जबकि पहाड़ी क्षेत्रों में ये कोठार देवदार की लकड़ी से बनाए जाते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में भी इन पर शानदार नक्काशी की जाती है। इन कोठ्यार की भंडारण क्षमता भी अद्भुत होती है, क्योंकि बहुत छोटे दिखने के बावजूद इनमें काफी मात्रा में अनाज का भंडारण किया जा सकता है। 

कोठ्यार या कोठार अथवा कुठार की सबसे खास बात यह होती है कि इसके दरवाजे से मुख्य घर से एक सांकल/चेन बंधी रहती है और उसमें बीच-बीच में घंटियां भी बंधी रहती हैं ताकि यदि कोई चोर चोरी करने के इरादे से कुठार में घुसने की कोशिश भी करेगा तो घर के लोगों को पता चल जाता है कि चोरी होने वाली है। इस प्रकार से सुरक्षा की यह अनोखी तरकीब होती थी लेकिन आज कुठार बहुत कम देखने को मिलते हैं। 

वास्तव में इन भंडार गृहों में कुठार हमारी लोक संस्कृति की  झलक देखने को मिलती थी लेकिन आज गांव घरों में ये नहीं बचे हैं। आज इनके स्थान पर लोहे की टंकियां, कंकरीट के बने गोदाम आ गए हैं। 1770 में पड़े भयंकर सूखे के दौरान लगभग एक करोड़ लोग भुखमरी के शिकार हुए थे। तब के गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने गोलघर के निर्माण की योजना बनाई थी, ब्रिटिश इंजीनियर कप्तान जॉन गाॢस्टन ने अनाज के (ब्रिटिश फौज के लिए) भंडारण के लिए इस गोल ढांचे का निर्माण 20 जनवरी 1784 को शुरू करवाया था। 

इसका निर्माण कार्य ब्रिटिश राज में 20 जुलाई 1786 को संपन्न हुआ था। इसमें एक साथ 140000 टन अनाज रखा जा सकता है।  अंत में, यही कहूंगा कि आज हमारी सनातन संस्कृति-सभ्यता में निहित हमारी परंपराओं, विभिन्न व्यवस्थाओं, पुरातन तकनीकों जिसमें अनाज भंडारण तकनीक/व्यवस्था भी शामिल है, को सहेज कर रखने की जरूरत है, क्योंकि ये धीरे धीरे विलुप्ति/समाप्ति की कगार पर पहुंच गई हैं।-सुनील कुमार महला    

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