ताज महल से जुड़ा कानूनी विवाद क्या है?

Edited By Updated: 26 Jul, 2026 05:26 AM

what is the legal dispute related to the taj mahal

17वीं शताब्दी का मकबरा, ताज महल एक बार फिर सुर्खियों में है। इस महीने की शुरुआत में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने केंद्र और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ए.एस.आई.) को नोटिस जारी कर आगरा की एक निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर उनका जवाब...

अब तक की कहानी : 17वीं शताब्दी का मकबरा, ताज महल एक बार फिर सुर्खियों में है। इस महीने की शुरुआत में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने केंद्र और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ए.एस.आई.) को नोटिस जारी कर आगरा की एक निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर उनका जवाब मांगा था, जिसमें ताज महल के सर्वेक्षण से इंकार कर दिया गया था। न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल की पीठ ने अधिवक्ता हरिशंकर जैन द्वारा दायर एक याचिका पर यह आदेश पारित किया, जिसमें तर्क दिया गया था कि ताज, जो एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्मारक है, वास्तव में ‘तेजो महालय’ है।

जैन ने यह घोषणा करने की मांग की कि ताज महल एक हिंदू मंदिर है और हिंदुओं के लिए वहां पूजा-अर्चना करने की अनुमति मांगी। याचिकाकत्र्ताओं ने स्मारक का निरीक्षण करने के लिए एक एडवोकेट कमिश्नर की नियुक्ति की भी मांग की। मुगल सम्राट शाहजहां द्वारा अपनी पसंदीदा पत्नी अर्जुमंद बानो के मकबरे के रूप में निर्मित, ताज महल को पूरा होने में 22 साल लगे। मुख्य वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी की देखरेख में निर्मित, पहली बार इसे विवाद का सामना तब करना पड़ा, जब पश्चिम में कई लोगों द्वारा यह दावा किया गया कि ताज के वास्तुकार वेनेशियन गेरोनिमो वेरोनियो थे, जो पेशे से एक जौहरी थे। वह 17वीं शताब्दी की बात थी। फिर तारीख-ए-ताज महल में मुगल बेग का दावा आया कि ताज को तुर्की के सुल्तान द्वारा कथित रूप से भेजे गए एक वास्तुकार मुहम्मद एफेंडी ने डिजाइन किया था। हालांकि, एफेंडी वास्तुकार नहीं थे, जैसा कि बाद के खुलासों से साबित हुआ।

पी.एन. ओक का दावा क्या था : फिर 19वीं शताब्दी के मध्य में, यह दावा किया गया कि यह स्मारक फ्रांसीसी ऑस्टिन डी बोर्डो की प्रतिभा का परिणाम था, जो पेशे से एक जौहरी थे। हालांकि, ऑस्टिन की मृत्यु 1632 में हो गई, जिस वर्ष ताज पर काम शुरू हुआ था।मध्यकालीन भारत के किसी भी इतिहासकार ने ताज के मुगल सम्राट शाहजहां की पत्नी का मकबरा होने के तथ्य का खंडन नहीं किया है। इसमें इरफान हबीब और अतहर अली जैसे प्रख्यात इतिहासकारों के अलावा सतीश चोपड़ा और सैयद अली नदीम रजावी जैसे उल्लेखनीय नाम शामिल हैं। मकबरे की प्रामाणिकता पर आक्षेप लगाने वाले पहले व्यक्ति एक गैर-इतिहासकार, पी.एन. ओक थे, जो एक शिक्षक से वकील और फिर पत्रकार बने थे, जिन्होंने 1965 में अपनी पुस्तक ‘ताज महल इज ए टैम्पल पैलेस’ के माध्यम से दावा किया था कि ताज मूल रूप से 4वीं शताब्दी में निर्मित एक राजपूत महल था। 

1989 में, ओक ने अपनी राय को संशोधित किया और दावा किया कि यह मूल रूप से 12वीं शताब्दी की शुरुआत में बनाया गया एक ङ्क्षहदू मंदिर था। फिर से, उन्होंने अपने तर्क को पुख्ता करने के लिए एक पुस्तक, ‘ताज महल : द ट्रू स्टोरी’ लिखी। यह पहली बार था, जब किसी ने इस स्मारक को किसी हिंदू देवता से जोड़ा था। साक्ष्यों के अभाव में इतिहासकारों ने उनके दावों को साख के लायक न मानते हुए खारिज कर दिया। ओक का दावा, हालांकि, उच्चतम न्यायालय में सुना गया था, जिसने इसे 2000 में सिरे से खारिज कर दिया था।

फिर कौन सी कानूनी चुनौतियां आईं : 2005 में, अयोध्या सद्भावना समिति के सदस्य अमरनाथ मिश्रा इलाहाबाद उच्च न्यायालय गए और दावा किया कि ताज 1189 में चंदेल शासकों द्वारा बनाया गया एक मंदिर था। अदालत ने उनके तर्क को भी खारिज कर दिया। विरोधियों ने हार नहीं मानी। 2015 में, आगरा की एक निचली अदालत में दायर एक सिविल मुकद्दमे में ताज महल को हिंदू मंदिर घोषित करने की मांग की गई। अदालत हालांकि इस दावे से सहमत नहीं हुई। ताज परिसर के सर्वेक्षण का आदेश देने से इंकार करने के बाद, जैसा कि ज्ञानवापी और भोजशाला में आदेश दिया गया था, याचिकाकत्र्ता इलाहाबाद उच्च न्यायालय पहुंचे। इसके बाद अदालत ने केंद्र सरकार और ए.एस.आई. से जवाब मांगा।

ए.एस.आई. का क्या रुख था : 2017 में, ए.एस.आई. ने स्पष्ट रूप से कहा था कि ताज 17वीं शताब्दी का मकबरा था। इसके निर्माण और डिजाइन में इस्तेमाल की गई तकनीक, जिसमें ‘पिएत्रा दुरा’ शामिल है, पूर्व-मध्यकालीन दिनों में मौजूद नहीं थी। इसे विवाद के किसी भी अवशेष को समाप्त कर देना चाहिए था। हालांकि, 2022 में उच्चतम न्यायालय में एक भाजपा नेता द्वारा एक जनहित याचिका (पी.आई.एल.) दायर की गई थी। इसे भी खारिज कर दिया गया। 2 साल बाद, कुछ कार्यकत्र्ताओं ने ताज में गंगाजल चढ़ाने की कोशिश की। वह प्रयास भी नाकाम कर दिया गया। अब, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के बाद, गेंद एक बार फिर ए.एस.आई. के साथ-साथ केंद्र के पाले में है।-जिया उस सलाम

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