Edited By jyoti choudhary,Updated: 29 Aug, 2026 05:12 PM
सिंगापुर में नौकरी के दौरान कमाए पैसों को विदेशी निवेश फंड में लगाने का मामला गुरुग्राम के एक करदाता के लिए बड़ी परेशानी बन गया था। आयकर विभाग ने विदेशी निवेश को अघोषित संपत्ति मानते हुए 'ब्लैक मनी एक्ट' के तहत कार्रवाई की और करीब ₹1.84
नई दिल्लीः सिंगापुर में नौकरी के दौरान कमाए पैसों को विदेशी निवेश फंड में लगाने का मामला गुरुग्राम के एक करदाता के लिए बड़ी परेशानी बन गया था। आयकर विभाग ने विदेशी निवेश को अघोषित संपत्ति मानते हुए 'ब्लैक मनी एक्ट' के तहत कार्रवाई की और करीब ₹1.84 करोड़ का जुर्माना लगाया। हालांकि, मामला आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT), दिल्ली पहुंचने के बाद करदाता को बड़ी राहत मिली।
ITAT ने माना कि संबंधित असेसमेंट ईयर के लिए वैध नोटिस जारी नहीं किया गया था। इसी आधार पर ट्रिब्यूनल ने विभाग की कार्रवाई, असेसमेंट ऑर्डर और जुर्माने के आदेश को रद्द कर दिया।
क्या है पूरा मामला?
मामले में गुरुग्राम के करदाता ने सिंगापुर में नौकरी के दौरान 19 मई 2015 को बरमूडा-केंद्रित एक ग्लोबल इन्वेस्टमेंट फंड में करीब 3 लाख अमेरिकी डॉलर का निवेश किया था। इसके करीब 10 महीने बाद, 16 मार्च 2016 को उन्होंने निवेश भुना लिया। इससे उन्हें लगभग 3.14 लाख डॉलर प्राप्त हुए, जिसकी भारतीय मुद्रा में कीमत उस समय करीब ₹3 करोड़ बताई गई।
करदाता का दावा था कि निवेश के लिए इस्तेमाल की गई पूरी रकम सिंगापुर में नौकरी से हुई कमाई से आई थी और इसमें भारत से भेजे गए किसी फंड का इस्तेमाल नहीं हुआ था।
IT विभाग ने क्यों लगाया ब्लैक मनी एक्ट?
भारत लौटने के बाद जब यह विदेशी निवेश आयकर विभाग की जांच के दायरे में आया, तो विभाग ने इसे अघोषित विदेशी संपत्ति मानते हुए ब्लैक मनी (Undisclosed Foreign Income and Assets) and Imposition of Tax Act के तहत कार्रवाई शुरू की।
करदाता ने विभाग के सामने दलील दी कि निवेश सिंगापुर में अर्जित वेतन से किया गया था। उन्होंने भारत और सिंगापुर के बीच संशोधित DTAA यानी Double Taxation Avoidance Agreement का भी हवाला दिया।
हालांकि, आकलन अधिकारी (AO) इन दलीलों से सहमत नहीं हुए। अधिकारी ने अन्य आधारों के साथ यह भी माना कि संबंधित फंड कंपनी भारत में पब्लिक लिमिटेड कंपनी के रूप में पंजीकृत थी और संबंधित वित्त वर्ष में करदाता को सिंगापुर का निवासी नहीं माना जा सकता।
इसके बाद विभाग ने ब्लैक मनी एक्ट की धारा 3(1) के तहत कार्रवाई करते हुए निवेश की फेयर मार्केट वैल्यू पर 30 प्रतिशत की दर से टैक्स लगाया और करीब ₹1.84 करोड़ का जुर्माना लगाया।
कमिश्नर (अपील) से भी नहीं मिली राहत
करदाता ने विभाग के आदेश के खिलाफ कमिश्नर (अपील) के समक्ष अपील की। हालांकि, वहां भी उन्हें राहत नहीं मिली और अपील खारिज कर दी गई। इसके बाद उन्होंने मामले को ITAT दिल्ली के सामने चुनौती दी।
ITAT में किस आधार पर पलटा पूरा मामला?
ITAT के सामने करदाता के वकीलों ने मुख्य रूप से नोटिस की वैधता का मुद्दा उठाया। दलील दी गई कि आयकर विभाग ने 1 नवंबर 2018 को ब्लैक मनी एक्ट की धारा 10(1) के तहत जो नोटिस जारी किया था, उसमें केवल Assessment Year (AY) 2016-17 और 2017-18 का उल्लेख था।
वकीलों के मुताबिक, नोटिस में AY 2019-20 का कोई उल्लेख नहीं था। इसलिए विभाग के पास उस असेसमेंट ईयर के लिए धारा 10(1) के तहत वैध नोटिस जारी किए बिना आकलन करने का अधिकार नहीं था।
ITAT ने करदाता को दी बड़ी राहत
मामले की सुनवाई के बाद ITAT ने करदाता की दलील को स्वीकार किया। ट्रिब्यूनल ने संबंधित कार्रवाई को कानूनी आधार पर टिकाऊ नहीं माना। ITAT ने धारा 10 के तहत शुरू की गई कार्यवाही, संबंधित असेसमेंट ऑर्डर और ₹1.84 करोड़ के जुर्माने के आदेश को रद्द कर दिया। इस फैसले से करदाता को बड़ी राहत मिली। हालांकि, मामले में राहत मुख्य रूप से वैध नोटिस और अधिकार क्षेत्र से जुड़े कानूनी आधार पर मिली है।