Edited By jyoti choudhary,Updated: 29 Apr, 2026 11:17 AM

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास की अस्थिरता के बीच यूनाइटेड अरब अमीरात (UAE) ने एक बड़ा रणनीतिक फैसला लेते हुए OPEC और OPEC+ गठबंधन से बाहर निकलने का फैसला किया है। 1967 से चला आ रहा यह संबंध अब खत्म होने जा रहा है। 1 मई...
बिजनेस डेस्कः मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास की अस्थिरता के बीच यूनाइटेड अरब अमीरात (UAE) ने एक बड़ा रणनीतिक फैसला लेते हुए OPEC और OPEC+ गठबंधन से बाहर निकलने का फैसला किया है। 1967 से चला आ रहा यह संबंध अब खत्म होने जा रहा है। 1 मई 2026 से लागू होने वाला यह निर्णय लगभग छह दशक पुराने संबंध के अंत का संकेत देता है और वैश्विक ऊर्जा राजनीति में एक अहम मोड़ माना जा रहा है।
UAE के ऊर्जा मंत्री सुहैल अल मजरूई ने इसे देश की दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति के अनुरूप “सॉवरेन निर्णय” बताया। उन्होंने कहा कि यह कदम किसी तात्कालिक बाजार उतार-चढ़ाव का परिणाम नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य को ध्यान में रखकर लिया गया है।
1967 में बना था सदस्य
UAE 1967 से OPEC का सदस्य रहा है और तेल बाजार को स्थिर बनाए रखने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हालांकि, हाल के वर्षों में ऊर्जा मांग के बदलते रुझान, नई तकनीकों का प्रभाव और क्षेत्रीय भू-राजनीतिक तनाव ने देश को अपनी नीति पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित किया।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस फैसले का मुख्य उद्देश्य अधिक लचीलापन हासिल करना है। OPEC+ के उत्पादन कोटा से बाहर आने के बाद UAE अब अपनी उत्पादन क्षमता को स्वतंत्र रूप से बढ़ा सकेगा। यह कदम खासतौर पर अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (ADNOC) की वैश्विक विस्तार योजनाओं के अनुरूप देखा जा रहा है।
ऊर्जा विश्लेषकों का मानना है कि यह निर्णय OPEC+ की एकजुटता पर सवाल खड़े कर सकता है और गठबंधन के भीतर मौजूद मतभेदों को उजागर करता है। इसके साथ ही, यह संकेत भी मिलता है कि बड़े तेल उत्पादक देश अब अधिक स्वतंत्र नीति अपनाने की दिशा में बढ़ रहे हैं।
तेल बाजार पर दिख सकता है असर
हालांकि UAE ने स्पष्ट किया है कि वह अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा सहयोग से पीछे नहीं हटेगा और वैश्विक बाजार की स्थिरता बनाए रखने में अपनी भूमिका निभाता रहेगा लेकिन इस फैसले का असर तेल बाजार पर दिख सकता है—आने वाले समय में कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ने की संभावना है, क्योंकि उत्पादन बढ़ने से सप्लाई पर दबाव पड़ेगा और OPEC+ की पकड़ कुछ कमजोर हो सकती है।