Edited By jyoti choudhary,Updated: 18 Apr, 2026 01:49 PM

मिडिल ईस्ट में लगभग 50 दिनों से तनाव देखने को मिला। इसका असर दुनियाभर के तेल और गैस सप्लाई पर भी पड़ा। करीब 50 अरब डॉलर (4.63 लाख करोड़ रुपए) का कच्चा तेल बाजार तक पहुंच ही नहीं पाया क्योंकि उसका प्रोडक्शन नहीं हो सका। एक्सपर्ट के अनुसार, इस संकट का...
बिजनेस डेस्कः मिडिल ईस्ट में लगभग 50 दिनों से तनाव देखने को मिला। इसका असर दुनियाभर के तेल और गैस सप्लाई पर भी पड़ा। करीब 50 अरब डॉलर (4.63 लाख करोड़ रुपए) का कच्चा तेल बाजार तक पहुंच ही नहीं पाया क्योंकि उसका प्रोडक्शन नहीं हो सका। एक्सपर्ट के अनुसार, इस संकट का असर सिर्फ अभी नहीं बल्कि आने वाले कई महीनों और सालों तक महसूस किया जाएगा, क्योंकि सप्लाई में आई यह कमी जल्दी पूरी होना मुश्किल है।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि लेबनान में हुए युद्धविराम समझौते के बाद होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) फिर से खोल दिया गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उम्मीद जताई है कि ईरान युद्ध को खत्म करने के लिए जल्द ही कोई समझौता हो सकता है। हालांकि इस डील के समय को लेकर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है।
तेल सप्लाई को बड़ा नुकसान
Kpler के आंकड़ों के अनुसार, फरवरी के अंत में शुरू हुए इस संकट के बाद से ग्लोबल मार्केट से 50 करोड़ (500 मिलियन) बैरल से ज्यादा कच्चा तेल और कंडेन्सेट बाहर हो चुका है। इसे आधुनिक इतिहास में एनर्जी सप्लाई में अब तक की सबसे बड़ी रुकावट माना जा रहा है।
यह नुकसान दुनिया भर में 10 हफ्तों के लिए एयर ट्रैवल की डिमांड में कटौती, दुनिया भर में 11 दिनों के लिए किसी भी वाहन से सड़क यात्रा पर रोक या ग्लोबल इकोनॉमी के लिए पांच दिनों तक तेल की सप्लाई न होना, के बराबर है।
प्रतिदिन कितना नुकसान
मार्च में खाड़ी के अरब देशों को कच्चे तेल के प्रोडक्शन में रोजाना करीब 80 लाख बैरल का नुकसान हुआ है। ये दुनिया की बड़ी तेल कंपनियों Exxon Mobil और Chevron के संयुक्त प्रोडक्शन के लगभग बराबर है। वहीं, सऊदी अरब, कतर, यूएई, कुवैत, बहरीन और ओमान से जेट फ्यूल का निर्यात फरवरी के 19.6 मिलियन बैरल से घटकर मार्च और अप्रैल में मिलाकर सिर्फ 4.1 मिलियन बैरल रह गया। यह गिरावट इतनी बड़ी है कि इससे न्यूयॉर्क के JFK एयरपोर्ट और लंदन हीथ्रो के बीच करीब 20,000 राउंड-ट्रिप उड़ानों के लिए जरूरी ईंधन मिल सकता था।
Kpler के सीनियर क्रूड एनालिस्ट जोहान्स रॉबॉल ने कहा कि जब से संघर्ष शुरू हुआ है, क्रूड की कीमतें औसतन 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रही हैं। ऐसे में जो वॉल्यूम नहीं मिल पाया है, उससे लगभग 50 बिलियन डॉलर के रेवेन्यू नुकसान हुआ है। यह जर्मनी के सालाना सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 1 फीसदी की कटौती के बराबर है या लगभग लातविया या एस्टोनिया जैसे छोटे देशों की पूरी GDP के बराबर है।