खेल-खेल में बचपन की यादें हुईं ताजा, बचपन की डांट भी आई याद

Edited By Updated: 18 Jun, 2016 09:56 AM

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बचपन एक ऐसा बीता हुआ समय है जो हर किसी को याद आता है। जब हम अपने बचपन को याद करते हैं तो कुछ ऐसे लोग याद आते हैं जो हमसे जुड़े तो होते हैं लेकिन साथ नहीं होते और जब हम उनसे मिलते हैं तो बचपन की बातों का ढेर हमारे सामने उभर कर आता है।

 चंडीगढ़ (लल्लन): बचपन एक ऐसा बीता हुआ समय है जो हर किसी को याद आता है। जब हम अपने बचपन को याद करते हैं तो कुछ ऐसे लोग याद आते हैं जो हमसे जुड़े तो होते हैं लेकिन साथ नहीं होते और जब हम उनसे मिलते हैं तो बचपन की बातों का ढेर हमारे सामने उभर कर आता है। दुनिया का हर कोई इंसान किसी न किसी बहाने अपने बचपन की यादों से जुड़ा रहता है। कुछ ऐसे खेल जो हम बचपन में खेला करते थे और इस बदलते दौर के साथ खेल भी बदल जाते हैं। गुम हो चुका बचपन एक बार फिर से लौट आया है। सैक्टर-20 के ग्राऊंड में यू.टी. के सरकारी टीचर्स व अन्य लोगों ने गुल्ली-डंडा, पिट्ठू व अन्य पुराने खेलों को खेल खूब आनंद उठाया। इस दौरान 700 के करीब लोगों ने फार्म भरा। टीचर्स व स्थानीय लोगों ने गुल्ली-डंडा खेला। इससे सभी लोगों ने अपने बचपन की यादें ताजा की। 

उल्लेखनीय है कि इस खेल प्रतियोगिता में 25 वर्ष से ऊपर की आयु के लोगों द्वारा ही हिस्सा लिया गया था। इसके साथ ही पिट्ठू, स्टापू जैसे खेलों की 

 

भी रिहर्सल की जाएगी। साथ ही लोगो का कहना हैं कि इस खेल से जहां बचपन की यादें ताजा हुईं साथ ही बचपन में पड़ी माता-पिता की डांट की याद भी आ गई। उन्होंने कहा कि ऐसे खेलों को खेलने के बाद बच्चों को जिम व योगा करने की जरूरत नहीं। कुछ अध्यापको ने कहा की पहले ना तो जिम होता था न ही योग के बारे में अधिक जानकारी किसी को होती थी। 

क्या कहते हैं अध्यापक

बचपन में खेले गए खेलो को आज 25 साल बाद खेलने पर बहुत अच्छा लगा। खेलते समय ऐसा लगा कि फिर बचपन में आ गए हैं। यह कहना जी.एम.एस.एस.एस.-46 स्कूल के लैक्चरर सोहन लाल का। उन्होंने बताया कि सैक्टर-20 के ग्राऊंड में इन खेलों को खेल काफी अच्छा महसूस हुआ। उन्होनें ने कहा कि आजकल की पीढ़ी तो व्हाट्सएप व कंप्यूटर में ही बिजी है। इनकी बदौलत बच्चे इन खेलों से काफी दूर हैं। 

जी.एम.एस.एस.एस.-37 के स्पैशल बच्चों के कोच प्रदीप डोगरा ने भी आज गुल्ली डंडा, पिट्ठू खेल खेला। उन्होने बताया कि यह खेल शरीर के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने कहा कि 20 साल बाद फिर गुल्ली-डंडा पकड़ा है। उन्होंने कहा कि इस समय के बच्चे इन खेलों से दूर हैं व इस कारण उन्हें मोटापा घेर रहा है। 

फिटनैस के साथ यह खेल काफी एन्जवायमैंट से भरे हैं। यह कहना है फिजिकल एजुकेशन के रिटायर्ड हो चुके अध्यापक गुरमेल सिंह का। उन्होंने कहा कि 10वीं से पहले गुल्ली डंडा व पिट्ठू ग्राम काफी खेलते थे। कई बार तो इन खेलों के पीछे घर वालों से डांट भी खानी पड़ी। जब छोटे होते थे तो सभी गली के बच्चे इकट्ठा होकर टायर रेस लगाते थे।

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