दीदी का ‘खेला’ खत्म, बंगाल में भाजपा की जीत के राजनीतिक और सामाजिक मायने

Edited By Updated: 08 May, 2026 07:02 PM

dr suvrokamal dutta political and social implications of bjp victory in bengal

प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय रूढ़िवादी (कंजरवेटिव) राजनीतिक, आर्थिक और विदेश नीति विशेषज्ञ डॉ. सुव्रोकमल दत्ता के अनुसार पश्चिम बंगाल की राजनीति में वर्ष 2026 का विधानसभा चुनाव एक बड़े बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। पांच साल पहले 2021 के चुनाव...

नेशनल डेस्कः प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय रूढ़िवादी (कंजरवेटिव) राजनीतिक, आर्थिक और विदेश नीति विशेषज्ञ डॉ. सुव्रोकमल दत्ता के अनुसार पश्चिम बंगाल की राजनीति में वर्ष 2026 का विधानसभा चुनाव एक बड़े बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। पांच साल पहले 2021 के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने “खेला होबे” का नारा देकर भाजपा को चुनौती दी थी। भाजपा ने तब जवाब दिया था—“खेला अभी बाकी है।” अब 2026 के चुनाव परिणामों के बाद भाजपा इसे “खेला शेष” करार दे रही है।

राज्य में भाजपा की जीत को केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि राजनीतिक ध्रुवीकरण, राष्ट्रवाद और बदलाव की इच्छा के रूप में देखा जा रहा है। भाजपा ने “जय श्रीराम” और विकास के मुद्दों को केंद्र में रखकर चुनावी अभियान चलाया, जबकि तृणमूल कांग्रेस के पारंपरिक नारे “मां, माटी, मानुष”, “जय बांग्ला” और “अबार खेला होबे” इस बार मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर सके।

राष्ट्रवाद बनाम क्षेत्रीय अस्मिता
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल में इस बार चुनावी विमर्श क्षेत्रीय पहचान से हटकर राष्ट्रवाद और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर केंद्रित रहा। “जय बांग्ला” जैसे नारों का ऐतिहासिक महत्व बांग्लादेश मुक्ति संग्राम से जुड़ा रहा है, लेकिन भाजपा ने इसे बंगाली राष्ट्रवाद की राजनीति बताते हुए हिंदुत्व और राष्ट्रीय एकता के मुद्दों को अधिक प्रभावी ढंग से उठाया।
साथ ही, संदेशखाली हिंसा, आरजी कर मेडिकल कॉलेज कांड, राजनीतिक हिंसा और कथित घुसपैठ जैसे मुद्दों ने राज्य सरकार को घेरने का काम किया। भाजपा ने इन घटनाओं को महिला सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जोड़कर लगातार जनता के बीच उठाया।

बदलाव की उम्मीद और बेरोजगारी का मुद्दा
भाजपा ने चुनाव प्रचार के दौरान बंगाल में बेरोजगारी और पलायन को प्रमुख मुद्दा बनाया। पार्टी नेताओं ने दावा किया कि राज्य में उद्योगों का अभाव और निवेश की कमी के कारण युवाओं को रोजगार के लिए दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ रहा है। भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस पर आरोप लगाया कि वोट बैंक की राजनीति के कारण राज्य की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। पार्टी ने सीमा पार से घुसपैठ और रोहिंग्या शरणार्थियों के मुद्दे को भी चुनावी बहस का हिस्सा बनाया। भाजपा ने वादा किया कि सत्ता में आने पर स्थानीय युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता दी जाएगी।

संदेशखाली और आरजी कर कांड का असर
संदेशखाली हिंसा और आरजी कर मेडिकल कॉलेज की घटना ने चुनावी माहौल को गहराई से प्रभावित किया। भाजपा ने इन मामलों को महिला सुरक्षा और प्रशासनिक विफलता से जोड़कर जनता के बीच उठाया। आरजी कर मेडिकल कॉलेज मामले में पीड़िता की मां को भाजपा ने उम्मीदवार बनाया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने इस कदम के जरिए भावनात्मक जुड़ाव और महिला सुरक्षा के मुद्दे पर जनता का भरोसा जीतने की कोशिश की। वहीं, विपक्ष का आरोप रहा कि तृणमूल कांग्रेस इन मामलों में जनता का विश्वास बनाए रखने में असफल रही।

जमीनी स्तर पर भाजपा की रणनीति
2021 की हार के बाद भाजपा ने बंगाल में अपने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया। पार्टी नेतृत्व ने राज्य में राजनीतिक हिंसा, कार्यकर्ताओं की सुरक्षा और संगठनात्मक कमजोरी की समीक्षा की। सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और संगठन से जुड़े नेताओं ने लगातार बैठकों के जरिए नई रणनीति तैयार की। पंचायत चुनाव से लेकर लोकसभा और विधानसभा चुनाव तक भाजपा ने जमीनी स्तर पर कैडर मजबूत करने और मतदाताओं तक पहुंच बढ़ाने पर काम किया।

मोदी, शाह और योगी की आक्रामक चुनावी मुहिम
प्रधानमंत्री Narendra Modi ने पश्चिम बंगाल में कई चुनावी रैलियां और रोड शो किए। वहीं केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री Yogi Adityanath ने भी आक्रामक प्रचार अभियान चलाया। भाजपा ने अपने प्रचार में विकास मॉडल, महिला सुरक्षा, राष्ट्रवाद और रोजगार जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी। राजनीतिक जानकारों के अनुसार, भाजपा का यह अभियान शहरी और युवा मतदाताओं के बीच प्रभावी साबित हुआ।

बंगाल की राजनीति में नया अध्याय
विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव केवल सरकार बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि बंगाल की राजनीति में वैचारिक बदलाव का संकेत भी है। लंबे समय तक वामपंथ और क्षेत्रीय राजनीति के प्रभाव वाले राज्य में अब राष्ट्रीय राजनीति और हिंदुत्व की मजबूत उपस्थिति दिखाई दे रही है। हालांकि, राजनीतिक पर्यवेक्षक यह भी मानते हैं कि नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती रोजगार, उद्योग, महिला सुरक्षा और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने की होगी। जनता ने बदलाव के पक्ष में मतदान किया है, लेकिन इस विश्वास को कायम रखना अब नई सत्ता की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।


डॉ. सुव्रोकामल दत्ताः- प्रख्यात अंतरराष्ट्रीय रूढ़िवादी राजनीतिक, आर्थिक एवं विदेश नीति विशेषज्ञ
 

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