Budget 2026 Nirmala Sitharaman: बजट से पहले दही-चीनी का शगुन ! वित्त मंत्री ने क्यों दोहराई सदियों पुरानी परंपरा, जानें इसके पीछे का धार्मिक और वैज्ञानिक सच

Edited By Updated: 01 Feb, 2026 12:45 PM

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केंद्रीय बजट 2026 पेश करने से पहले वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की दही-चीनी खाकर निकलने की तस्वीरों ने एक बार फिर भारत की प्राचीन परंपराओं की ओर सबका ध्यान खींचा है।

Budget 2026 Nirmala Sitharaman : केंद्रीय बजट 2026 पेश करने से पहले वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की दही-चीनी खाकर निकलने की तस्वीरों ने एक बार फिर भारत की प्राचीन परंपराओं की ओर सबका ध्यान खींचा है। भारत में किसी भी शुभ कार्य, परीक्षा या महत्वपूर्ण यात्रा से पहले दही-चीनी खिलाना एक आम रिवाज है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इसके पीछे केवल अंधविश्वास है या कोई गहरा विज्ञान और धार्मिक तर्क छुपा है। तो आइए जानते हैं इस परंपरा के पीछे की खास वजह के बारे में-

धार्मिक और मांगलिक मान्यता
हिंदू धर्म में दही को 'पंचामृत' का एक मुख्य हिस्सा माना जाता है। सफेद रंग को शांति और सात्विकता का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक दृष्टि से दही का संबंध चंद्रमा से है, जो मन को शीतलता और स्थिरता प्रदान करता है। महत्वपूर्ण कार्यों के समय मन का शांत रहना बहुत जरूरी है। माना जाता है कि दही खाने से कार्य में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और नकारात्मकता समाप्त होती है। इसे 'शुभ शगुन' के रूप में देखा जाता है।

वैज्ञानिक और स्वास्थ्य संबंधी कारण
दही-चीनी खाने के पीछे केवल आस्था ही नहीं, बल्कि विज्ञान भी छिपा है। दही में गुड बैक्टीरिया और प्रोबायोटिक्स होते हैं, वहीं चीनी शरीर को तुरंत ऊर्जा प्रदान करती है। बजट जैसे तनावपूर्ण और लंबे दिन के लिए यह एक बेहतरीन एनर्जी बूस्टर है।महत्वपूर्ण कार्यों के दौरान घबराहट या तनाव से पेट में एसिडिटी हो सकती है। दही पेट को ठंडा रखता है और पाचन तंत्र को दुरुस्त रखता है।  चीनी के रूप में मिलने वाला ग्लूकोज दिमाग को सक्रिय रखता है, जिससे निर्णय लेने की क्षमता और एकाग्रता बढ़ती है।

आयुर्वेद का दृष्टिकोण
आयुर्वेद में भी दही को कफ नाशक और शरीर को पोषण देने वाला माना गया है। चीनी के साथ मिलकर यह शरीर में पित्त दोष को शांत करता है, जिससे व्यक्ति मानसिक रूप से अधिक स्थिर महसूस करता है।

वित्त मंत्री और परंपरा का तालमेल
निर्मला सीतारमण द्वारा इस परंपरा का पालन करना यह दर्शाता है कि आधुनिकता और देश की अर्थव्यवस्था के इतने बड़े कार्य के बीच भी भारतीय संस्कृति की जड़ें कितनी गहरी हैं। यह परंपरा हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखने का एक तरीका है।

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