Edited By Sarita Thapa,Updated: 11 Oct, 2026 01:07 PM

देवी भागवत पुराण के अनुसार, यदि कोई मनुष्य संसार की माया, मोह और अज्ञान के बंधनों से मुक्त होना चाहता है, तो उसे जगदम्बा मां आदि शक्ति की आराधना करनी चाहिए। मां आदि शक्ति ही इस चराचर जगत की मूल प्रकृति और माया की स्वामिनी हैं।
Devi Bhagwati Mahima Shardiya Navratri : देवी भागवत पुराण के अनुसार, यदि कोई मनुष्य संसार की माया, मोह और अज्ञान के बंधनों से मुक्त होना चाहता है, तो उसे जगदम्बा मां आदि शक्ति की आराधना करनी चाहिए। मां आदि शक्ति ही इस चराचर जगत की मूल प्रकृति और माया की स्वामिनी हैं। जब वे प्रसन्न होती हैं, तो जीव को अपनी ‘योगमाया’ के प्रभाव से बाहर निकालकर मोक्ष और परम शांति का मार्ग दिखाती हैं। मां भगवती ही इस संपूर्ण ब्रह्मांड की चेतना हैं। जब तक जीव उनकी सांसारिक माया के वश में रहता है, तब तक वह जन्म-मरण और सुख-दुख के चक्र में उलझा रहता है लेकिन जैसे ही मां की असीम कृपा होती है, वही माया ‘योगमाया’ बनकर साधक के भीतर ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का संचार करती है, जिससे मोक्ष का मार्ग स्वत: ही प्रशस्त हो जाता है। यही महामाया भगवती देवी ज्ञानियों के चित्त को बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती है और उसी के द्वारा सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति होती है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में शारदीय नवरात्रि का आगमन होता है।
नवरात्रि के इस पर्व में मां भगवती जगतजननी आदि शक्ति मां जगदंबा की कृपा प्राप्त करने के लिए उनकी सेवा तथा आराधना की जाती है। पावन पर्व नवरात्र में देवी दुर्गा की कृपा, सृष्टि की सभी रचनाओं पर समान रूप से बरसती है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्रकाम्य, ईशित्व और वशित्व ये आठ सिद्धियां होती हैं। देवी पुराण के अनुसार भगवान शिव ने इन्हीं की कृपा से सिद्धियों को प्राप्त किया था। प्राचीन काल में देवताओं और असुरों में पूरे सौ वर्षों तक घोर युद्ध हुआ था। इस युद्ध में देवताओं की सेना परास्त हो गई थी और इस प्रकार सम्पूर्ण देवताओं को जीत महिषासुर इन्द्र बन बैठा था। देवताओं ने अपनी हार का सारा वृत्तान्त भगवान श्रीविष्णु और शंकरजी से कह सुनाया कि ‘हे प्रभु! किस प्रकार महिषासुर सूर्य, चन्द्रमा, इन्द्र, अग्नि, वायु, यम, वरुण तथा अन्य देवताओं के सब अधिकार छीनकर सबका अधिष्ठाता स्वयं बन बैठा है।’
यह सुनकर भगवान श्रीविष्णु और शंकरजी बड़े क्रोधित हुए। तभी भगवान विष्णु और शंकर जी तथा अन्य देवताओं के मुख से मां भगवती का तेजोमय रूप प्रकट हुआ। जिसे सभी ने अपने-अपने अस्त्र- शस्त्र, दिव्य वस्त्र, उज्ज्वल हार, दिव्य आभूषण भेंट किए और मां का सम्मान किया। भीषण युद्ध में देवी ने जब पराक्रमी दुरात्मा महिषासुर को मार गिराया और असुरों की सेना को मार दिया तब इन्द्रादि समस्त देवताओं ने सिर तथा शरीर को झुकाकर मां भगवती की स्तुति की। तब मां भगवती दुर्गा ने देवताओं को आशीर्वाद देते हुए कहा कि ‘हे देवताओं! तुमने जो मेरी स्तुति की है अथवा ब्रह्माजी ने जो मेरी स्तुति की है, वह मनुष्यों को कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करने वाली है।’
नवरात्र के दौरान मां भगवती को प्रसन्न करने के लिए साधक विभिन्न प्रकार के पूजन करते हैं। नवरात्र में दुर्गा सप्तशती का नियमित पाठ विधि-विधान से किया जाए तो माता बहुत प्रसन्न होती हैं। भगवान श्रीराम ने भी लंका पर चढ़ाई से पूर्व मां भगवती दुर्गा की आश्विन में आने वाले शारदीय नवरात्रि में आराधना कर विजय का वर प्राप्त किया। तभी से आश्विन मास के शुक्ल पक्ष के प्रथम 9 दिनों में मां भगवती जगदंबा की आराधना पर्व शारदीय नवरात्रि प्रारम्भ हुआ।
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