पटाखों के धमाकों में न खो जाए दिवाली की खुशियां,  जानें आतिशबाजी से सेहत और पर्यावरण को होने वाले नुकसान

Edited By Updated: 08 Nov, 2026 10:19 AM

eco friendly green diwali tips

दीपावली खुशियों, रोशनी, उमंग और आपसी भाईचारे का त्योहार है। इस पर्व पर घरों में दीप जलते हैं, मिठाइयां बांटी जाती हैं और परिवार एक साथ खुशियां मनाते हैं। लेकिन जब तक आतिशबाजी और पटाखों का जिक्र न हो, तब तक त्योहार की चर्चा कुछ अधूरी-सी लगती है।

नई दिल्ली (ज्ञानप्रकाश/ नवोदय टाइम्स): दीपावली खुशियों, रोशनी, उमंग और आपसी भाईचारे का त्योहार है। इस पर्व पर घरों में दीप जलते हैं, मिठाइयां बांटी जाती हैं और परिवार एक साथ खुशियां मनाते हैं। लेकिन जब तक आतिशबाजी और पटाखों का जिक्र न हो, तब तक त्योहार की चर्चा कुछ अधूरी-सी लगती है। हालांकि, बदलते पर्यावरण और बढ़ते प्रदूषण के दौर में अब यह सोचने का समय है कि क्या कुछ मिनटों की आतिशबाजी के लिए इंसानों की सेहत, पशु-पक्षियों का जीवन और पर्यावरण दांव पर लगाना उचित है। 

दिल्ली-एनसीआर जैसे प्रदूषण प्रभावित क्षेत्रों में यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। ग्रीन पटाखों को न्यायिक आदेशों के तहत निर्धारित शर्तों और सीमित समय के लिए अनुमति मिलने का अर्थ यह नहीं है कि आतिशबाजी पूरी तरह सुरक्षित हो गई है। ग्रीन पटाखे भी प्रदूषण से पूरी तरह मुक्त नहीं हैं। ऐसे में दीपावली पर पटाखे जलाने से परहेज करना ही पर्यावरण और समाज के प्रति हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी हो सकती है।

पटाखों की चमक के पीछे छिपा स्वास्थ्य का खतरा
इस बार दीपावली पर सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में प्रमाणित ग्रीन पटाखे जलाने की अनुमति केवल 7 और 8 नवम्बर के लिए दी है। इसके तहत सुबह 6 से 7 बजे और रात 8 से 10 बजे तक ही आतिशबाजी की जा सकती है। 9 नवम्बर से फिर पूर्ण प्रतिबंध लागू होगा। अस्पतालों, नर्सिंग होम, स्वास्थ्य केंद्रों, वृद्धाश्रमों, शिक्षण संस्थानों और अधिसूचित शांत क्षेत्रों के 300 मीटर के दायरे में पटाखे जलाने की अनुमति नहीं है। बेरियम वाले पटाखों और लड़ियों की बिक्री व इस्तेमाल पर भी रोक है।  

दीपावली का असली आनंद किसी तेज धमाके या आसमान में बिखरती आतिशबाजी में नहीं, बल्कि परिवार की मुस्कान, घर के दीपों और आस-पास के लोगों की खुशियों में है। हमें यह भी समझना होगा कि प्रदूषण किसी एक वर्ग या उम्र के लोगों को प्रभावित नहीं करता। इसका असर अमीर-गरीब, बच्चे-बुजुर्ग, स्वस्थ और बीमार सभी पर पड़ता है। पशु-पक्षियों की तकलीफ भी हमारी जिम्मेदारी का हिस्सा है। इसलिए इस दीपावली एक नई परंपरा शुरू करने की जरूरत है। घरों को मिट्टी के दीयों, रंगोली, फूलों और रोशनी से सजाएं। बच्चों को पटाखों के बजाय पर्यावरण संरक्षण का महत्व समझाएं। आखिर त्योहार मनाने का उद्देश्य खुशियां बांटना है, किसी के लिए सांस लेना मुश्किल करना नहीं। क्यों ना इस बार ऐसी दीपावली मनाएं, जिसकी रोशनी तो दूर तक जाए, लेकिन जिसका धुआं किसी की जिंदगी में परेशानी न बने।

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