Tulsidas Jayanti: पत्नी की कटु बात ने तुलसीदास जी को बनाया रामायण का रचयिता

Edited By Niyati Bhandari,Updated: 04 Aug, 2022 07:24 AM

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गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म विक्रमी सम्वत् 1554 की श्रावण शुक्ल सप्तमी को बांदा जिले के राजापुर नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री आत्मा राम दुबे तथा माता का नाम हुलसी था। जन्म के समय ये

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Tulsidas Jayanti 2022: गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म विक्रमी सम्वत् 1554 की श्रावण शुक्ल सप्तमी को बांदा जिले के राजापुर नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री आत्मा राम दुबे तथा माता का नाम हुलसी था। जन्म के समय ये रोए नहीं थे और इनके मुख से राम-नाम का साफ उच्चारण हुआ था।

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इनका जन्म ‘अभुक्त मूल नक्षत्र’ में हुआ था और जन्म के समय इनका आकार-प्रकार पांच वर्ष के बालक जैसा था। ज्योतिषियों ने ‘अभुक्त मूल’ में जन्म लेने के कारण इन्हें माता-पिता के लिए अनिष्टप्रद बताया। बालक के अनिष्ट की आशंका से इनकी माता ने इन्हें अपनी दासी चुनियां के साथ उसके ससुराल भेज दिया और दूसरे ही दिन इस असार संसार से चल बसीं। चुनियां ने बड़े ही प्रेम से इनका लालन-पालन किया, किन्तु जब इनकी अवस्था साढ़े पांच वर्ष की थी, तब चुनियां भी भगवान को प्यारी हो गई और ये अनाथ होकर द्वार-द्वार भटकने लगे।

भगवान शंकर की प्रेरणा से स्वामी नरहर्यानंद जी इन्हें अयोध्या ले गए और यज्ञोपवीत-संस्कार करके इनका नाम ‘रामबोला’ रखा। इनकी बुद्धि अत्यंत प्रखर थी। ये अपने गुरु से जो भी सुनते तत्काल कंठस्थ कर लेते थे। अयोध्या से अपने गुरु श्री नर हरिदास जी के साथ ये सोरो आए, जहां गुरुमुख से इन्हें पवित्र रामकथा श्रवण करने का अवसर मिला। तदनंतर काशी जाकर इन्होंने श्री शेष सनातन जी से पंद्रह वर्षों तक वेद शास्त्रों का गंभीर अध्ययन किया।

गोस्वामी जी का विवाह भारद्वाज गोत्र की सुंदरी कन्या रत्नावली से हुआ था। एक दिन इनकी पत्नी अपने भाई के साथ अपने मायके चली गई। पत्नी में अत्यधिक आसक्ति के कारण ये भी उसके पीछे-पीछे ससुराल पहुंच गए। इस पर इनकी पत्नी ने इन्हें धिक्कारते हुए कहा कि, ‘‘जितना प्रेम तुम हाड़ मांस से बने मेरे शरीर से करते हो उसका आधा भी यदि भगवान से कर सको तो तुम्हारा कल्याण हो जाएगा।’’ 

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पत्नी की कटु किन्तु सत्य बात ने इन्हें वैराग्य का पथ दिखाया। वहां से ये सीधे प्रयाग आए और विरक्त हो गए।

गोस्वामी जी नित्यकर्म के लिए नित्य गंगा पार जाया करते थे और लौटते समय लोटे का बचा हुआ जल एक वृक्ष की जड़ में डाल दिया करते थे। उस पेड़ पर एक प्रेत रहता था। एक दिन उसने गोस्वामी जी से संतुष्ट होकर वर मांगने के लिए कहा। इन्होंने उससे भगवान श्री राम के दर्शन की लालसा प्रकट की। प्रेत ने इन्हें श्री हनुमान जी की कृपा का आश्रय लेने की सलाह दी। एक दिन एक सत्संग में इन्हें श्री हनुमान जी का साक्षात्कार हुआ। हनुमान जी ने चित्रकूट में भगवान का दर्शन कराने का इन्हें आश्वासन दिया। चित्रकूट के घाट पर बैठकर गोस्वामी जी चंदन घिस रहे थे।

इतने में भगवान सामने आ गए और इनसे चंदन मांगा। गोस्वामी जी की जन्म-जन्मांतर की इच्छा पूरी हो गई। इन्हें भगवान श्री राम के अनुपम रूप का साक्षात्कार हुआ। 

श्री हनुमान जी की आज्ञा से इन्होंने विक्रमी संवत् 1631 की चैत्र शुक्ल रामनवमी, मंगलवार को श्री रामचरित मानस का प्रणयन प्रारंभ किया। दो वर्ष सात माह छब्बीस दिन में यह ग्रंथ तैयार हुआ। इनके जीवन में भगवत्कृपा से अनेक चमत्कार हुए। आपने श्री रामचरित मानस के अतिरिक्त विनय पत्रिका, दोहावली, कवितावली, गीतावली आदि अनेक भक्ति परक ग्रंथों की रचना की और विक्रमी सम्वत् 1680 की श्रावण कृष्ण तृतीया, शनिवार को राम-राम कहते हुए अपनी नश्वर देह का त्याग किया। 

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