Edited By Prachi Sharma,Updated: 28 Mar, 2026 12:06 PM

Hanuman Jayanti Vrat Katha : हनुमान जयंती का पर्व न केवल एक तिथि है, बल्कि यह साहस, भक्ति और अटूट विश्वास का उत्सव है। चैत्र मास की पूर्णिमा को जब चंद्रमा अपनी पूरी आभा में होता है, तब केसरी नंदन और माता अंजनी के घर बजरंगबली का अवतार हुआ था। इस दिन...
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Hanuman Jayanti Vrat Katha : हनुमान जयंती का पर्व न केवल एक तिथि है, बल्कि यह साहस, भक्ति और अटूट विश्वास का उत्सव है। चैत्र मास की पूर्णिमा को जब चंद्रमा अपनी पूरी आभा में होता है, तब केसरी नंदन और माता अंजनी के घर बजरंगबली का अवतार हुआ था। इस दिन बूंदी का भोग लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि न केवल स्वयं भोग लगाना, बल्कि निर्धन और जरूरतमंद लोगों में प्रसाद बांटने से हनुमान जी की असीम कृपा प्राप्त होती है और जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। भक्त इस दिन व्रत रखकर अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं। विधि-विधान से की गई पूजा और 'हनुमान चालीसा' या 'सुंदरकांड' का पाठ मन को शांति और शक्ति प्रदान करता है। व्रत रखने वाले जातकों के लिए हनुमान जी के जन्म की कथा सुनना अनिवार्य माना गया है। कहा जाता है कि इस कथा के बिना व्रत का फल पूर्ण नहीं होता।
हनुमान जयंती व्रत कथा (प्रथम कथा)
एक पौराणिक कथा के अनुसार, राजा दशरथ को अग्निदेव से खीर प्राप्त हुई थी, जिसे उन्होंने अपनी तीनों रानियों में बांट दिया। जब रानी कैकेयी खीर खा रही थीं, तभी एक चील खीर को झपट्टा मारकर उड़ गई। उड़ते समय वह चील माता अंजना के आश्रम के ऊपर से गुजरी। उसी समय माता अंजना ऊपर की ओर देख रही थीं और संयोगवश वह खीर उनके मुंह में गिर गई। माता अंजना ने उसे ग्रहण कर लिया, जिसके प्रभाव से उनके गर्भ से हनुमानजी का जन्म हुआ, जिन्हें भगवान शिव का अवतार माना जाता है।
हनुमान जयंती व्रत कथा (द्वितीय कथा)
हनुमानजी के जन्म से जुड़ी एक अन्य कथा समुद्र मंथन से संबंधित है। समुद्र मंथन के बाद भगवान शिव ने भगवान विष्णु का मोहिनी रूप देखने की इच्छा जताई। भगवान विष्णु ने उनकी इच्छा पूरी करते हुए मोहिनी रूप धारण किया। उस रूप को देखकर भगवान शिव मोहित हो गए और उनका वीर्य पृथ्वी पर गिर गया। पवनदेव ने उस तेज को उठाकर वानरराज केसरी की पत्नी माता अंजना के गर्भ में स्थापित कर दिया। इसी दिव्य तेज से हनुमानजी का जन्म हुआ। इसलिए उन्हें भगवान शिव का ग्यारहवां रुद्र अवतार भी कहा जाता है।