Edited By Sarita Thapa,Updated: 10 May, 2026 11:45 AM

उन दिनों डॉ. राजेंद्र प्रसाद पटना हाईकोर्ट में वकालत करते थे। वह हमेशा कमजोर लोगों व पीड़ितों के पक्ष में खड़े होते थे और उन्हें न्याय दिलाने का भरपूर प्रयास करते थे। अपने इस सिद्धांत के चलते वह लाखों रुपए फीस के प्रस्ताव भी आसानी से ठुकरा देते थे।
Dr. Rajendra Prasad Story : उन दिनों डॉ. राजेंद्र प्रसाद पटना हाईकोर्ट में वकालत करते थे। वह हमेशा कमजोर लोगों व पीड़ितों के पक्ष में खड़े होते थे और उन्हें न्याय दिलाने का भरपूर प्रयास करते थे। अपने इस सिद्धांत के चलते वह लाखों रुपए फीस के प्रस्ताव भी आसानी से ठुकरा देते थे। एक बार एक समाज सुधारक का सिफारिशी पत्र लेकर एक व्यक्ति उनके पास आया।
उसका अपनी किसी निकट संबंधी विधवा महिला से संपत्ति को लेकर विवाद चल रहा था, जोकि असहाय थी। वह राजेंद्र बाबू को अपना वकील बनाना चाहता था। राजेंद्र बाबू ने उसके कागजात देखे तथा गंभीर होकर बोले, “कागज देखकर मैं समझ गया हूं कि इस संपत्ति के असली मालिक तुम नहीं, वह विधवा महिला है। तुमने इतनी चालाकी से कागज तैयार किए हैं कि कानूनी दृष्टि से तुम हकदार बन सकते हो। मैं किसी का हक छीनने में तुम्हारी मदद बिल्कुल नहीं कर सकता। यह मेरे सिद्धांत के खिलाफ बात होगी। इसीलिए मेरा सुझाव यह है कि तुम उस बेचारी की संपत्ति हजम करने से बचो।”

राजेंद्र बाबू की बात सुनकर उसका हृदय बदल गया और उसने उनके सामने ही वे कागज फाड़कर फैंक दिए। इस तरह से राजेंद्र बाबू लोगों का विचार बदल देते थे और कई बार मामला न्यायिक प्रक्रिया में जाने से पहले ही सुलझ जाता था। उनसे प्रभावित होकर कई लोग देश सेवा के रास्ते पर चले आए थे।
