Edited By Sarita Thapa,Updated: 04 Sep, 2026 11:48 AM

जन्माष्टमी श्री कृष्ण का जन्मोत्सव है, एक अवतार का अवतरण। अवतार परिवर्तन के उद्देश्य से जन्म लेते हैं- नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर परिवर्तन, क्योंकि सृष्टि की स्वाभाविक प्रकृति विनाश की ओर अधोगामी सर्पिल चक्र के समान अग्रसर होना है।
Janmashtami 2026 : जन्माष्टमी श्री कृष्ण का जन्मोत्सव है, एक अवतार का अवतरण। अवतार परिवर्तन के उद्देश्य से जन्म लेते हैं- नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर परिवर्तन, क्योंकि सृष्टि की स्वाभाविक प्रकृति विनाश की ओर अधोगामी सर्पिल चक्र के समान अग्रसर होना है। अवतार एक अवरोधक या गति-नियंत्रक के रूप में कार्य करता है। वराह अवतार ने हिरण्याक्ष का संहार किया, नृसिंह अवतार हिरण्यकश्यप के अंत हेतु प्रकट हुआ, वामन अवतार ने असुर बलि से सृष्टि की रक्षा की, परशुराम ने कार्तवीर्य अर्जुन से मानवता को बचाया, राम ने रावण का विनाश किया और कृष्ण ने धर्म के महायुद्ध- महाभारत का संचालन किया। कृष्ण अवतार द्वापर युग में हुआ था; वर्तमान में हम कलियुग में हैं, अतः इस युग में भी कृष्ण का पुनर्जन्म अनिवार्य है।
विनाश के लिए उत्तरदायी शक्तियों को परिदृश्य से हटाने के लिए ही अवतार अवतरित होता है, जिससे विनाश की प्रक्रिया को टाला जा सके। यद्यपि विनाश अवश्यंभावी है, किंतु अवतार इसमें विलंब ला देता है। ठीक उसी प्रकार, हम सभी के भीतर कृष्ण विद्यमान हैं। जब हम सृष्टि के संरक्षण हेतु ऐसे कर्म करते हैं जो एक अवतार करता है, तब हम स्वतः ही सृष्टि के सकारात्मक पक्ष में सम्मिलित हो जाते हैं। ये कर्म निर्बलों की रक्षा, पशुओं के जीवन की रक्षा, निर्धनों को भोजन कराना अथवा प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण हो सकते हैं। इस प्रकार हम एक लघु परिवर्तन का माध्यम बनते हैं; जबकि वृहद परिवर्तन लाने हेतु अवतार का जन्म होता है।
गीता में कृष्ण अर्जुन से कहते हैं:
यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत,
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।
(अर्थात्, जब-जब सकारात्मकता का ह्रास होता है और नकारात्मकता का उत्थान होता है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूंं।)
सृष्टि में कुछ भी स्थिर नहीं है; यह या तो उत्थान की ओर अग्रसर है या पतन की ओर। उत्थान सकारात्मकता की दिशा में परिवर्तन है, जबकि पतन सकारात्मकता से नकारात्मकता की ओर का प्रवाह है। जैसा कि वर्तमान समय में घटित हो रहा है। यदि आज हम अपने आस-पास देखें, तो मानव का नैतिक पतन स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। मानवीय चेतना में प्रदूषण (लोभ, क्रोध, ईर्ष्या आदि के रूप में) अपने चरम पर है और उसी का प्रतिबिंब हमारे पर्यावरण में भी दिखाई दे रहा है- नदियां सूख रही हैं, थल और वायु विषैले तत्वों से भर चुके हैं, और मानव तथा पशु दोनों ही अत्यंत कष्ट भोग रहे हैं। अब परिवर्तन का समय आ चुका है एक नए अवतार का अवतरण निश्चित है।
सूक्ष्म रूप में हम सभी अवतार ही हैं- वे सभी जो सृष्टि के सकारात्मक पक्ष में जीवन यापन कर रहे हैं और इसके संरक्षण का प्रयास कर रहे हैं, क्योंकि एक अवतार भी वृहद स्तर पर यही करता है। यदि हम इसके विपरीत मार्ग पर चलते हैं। सृष्टि के विनाश का मार्ग प्रशस्त करते हैं, पशुओं की हत्या और संसाधनों का अंधाधुंध दोहन कर असुरों की भाँति आचरण करते हैं, तो हमारे विनाश हेतु भी अवतार का आगमन अनिवार्य हो जाएगा। इस जन्माष्टमी पर मनुष्य के समक्ष यह चयन का विषय है कि वह एक अवतार के रूप में जन्म लेना चाहता है अथवा एक असुर के रूप में।
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