Lala Jagat Narayan Story: इस तरह लाला जगत नारायण ने पत्रकारिता के क्षेत्र में रखा अपना पांव...

Edited By Updated: 14 Jun, 2024 10:48 AM

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1924 में जब युवक जगत नारायण प्रथम बार जेल से रिहा होकर आए तो उनकी भेंट एक अन्य महान व्यक्ति भाई परमानंद से हुई, जो उन दिनों एक शक्तिशाली लेखक व लोकप्रिय नेता के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके थे। जगत

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Lala Jagat Narayan: 1924 में जब युवक जगत नारायण प्रथम बार जेल से रिहा होकर आए तो उनकी भेंट एक अन्य महान व्यक्ति भाई परमानंद से हुई, जो उन दिनों एक शक्तिशाली लेखक व लोकप्रिय नेता के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके थे। जगत नारायण को जेल में भी एक-दो बार इनके निकट आने का अवसर मिला।
जब जगत नारायण जेल से रिहा होने वाले थे तो लाला लाजपत राय ने, जो अभी जेल में ही थे, उनको अपने पास बुलाया तथा उन्हें बाहर जाकर ‘तिलक स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स’ से जोड़ने का आग्रह किया। भाई परमानंद, लाला जी की अनुपस्थिति में इस संस्था के कार्यकारी प्रधान के रूप में कार्य कर रहे थे। सैंट्रल जेल, लाहौर से रिहा होने पर भाई परमानंद स्वयं जगत नारायण को लेने आए।

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पर जगत नारायण पहले एक बार अपने घर लायलपुर जाना चाहते थे ताकि अपने माता-पिता के दर्शन कर सकें। मिलने पर माता-पिता ने जगत नारायण से अपनी इच्छा व्यक्त की कि अब उन्हें अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए पुन: लॉ कालेज में प्रवेश लेना चाहिए परन्तु जगत नारायण को यह स्वीकार नहीं था क्योंकि उन्होंने पढ़ाई देश की स्वतंत्रता के आंदोलन में भाग लेने के लिए छोड़ी थी तथा देश अभी स्वतंत्र नहीं हुआ था। उन्होंने स्पष्ट रूप से अपने माता-पिता को बता दिया कि अब वे यह भूल जाएं कि उनका बेटा वकील बनेगा। अब तो उसके मन में आर्थिक  रूप से आत्मनिर्भर होने की इच्छा थी तथा इसके लिए वह कोई काम करना चाहता था।

माता-पिता को बड़ी निराशा हुई पर वे कुछ कर नहीं सकते थे क्योंकि उन्हें पता था कि जगत नारायण ने एक बार जो ठान ली तो बस फिर ठान ही ली।
पुन: जगत नारायण लाहौर आ गए तथा भाई परमानंद से मिले। भले ही लाला लाजपत राय ने उन्हें ‘तिलक स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स’ से जुड़ने के लिए कहा था परन्तु उन्होंने भाई परमानंद को स्पष्ट कह दिया कि वह स्वयं अपने प्रयासों से अपने लिए धन कमाना चाहते हैं और नेताओं द्वारा दान स्वरूप एकत्रित धन पर निर्भर होना नहीं चाहते। यह थी उनकी आत्मसम्मान व स्वाभिमान की भावना !

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‘राजनीतिक स्वतंत्रता’ उनके लिए साध्य बन चुकी थी परंतु साध्य तक पहुंचने के लिए साधन के रूप में आर्थिक स्वतंत्रता व आत्मनिर्भरता भी तो आवश्यक थी। भाई परमानंद को युवक की स्वाभिमान व आत्मसम्मान की बात बहुत अच्छी लगी। वह लाला लाजपत राय के अनुयायियों में से थे। उन्हें इस होनहार युवक में संभावनाओं का एक अपार क्षितिज दिखाई दे रहा था। वह इस युवक को और कहीं जाने नहीं देना चाहते थे। लाला लाजपत राय की इच्छा और आदेश भी यही था।

भाई परमानंद ने स्वाभिमानी जगत नारायण को एक सुझाव दिया। वह उस समय ‘विरजानंद प्रैस’ के स्वामी थे तथा ‘आकाशवाणी’ नामक हिंदी साप्ताहिक निकाल रहे थे। भाई परमानंद ने उन्हें प्रति माह एक सौ रुपए वेतन तथा प्रैस व साप्ताहिक से होने वाले लाभ की 20 प्रतिशित राशि देने का प्रस्ताव रखा।
जगत नारायण के लिए बहुत अच्छा अवसर था अपनी प्रतिभा दिखाने व अपने पैरों पर स्वयं खड़ा होने का। उन्होंने हां कर दी तथा प्रारंभ कर दिया ‘आकाशवाणी’ का सम्पादन तथा ‘विरजानंद प्रैस’ का प्रबंधन। इस प्रकार राजनीति के बाद पत्रकारिता के क्षेत्र में उनका प्रवेश हुआ।

भाई परमानंद के साथ रह कर कार्य करते हुए उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र की बारीकियों व विशिष्टताओं को जाना व समझा। यहां से उन्हें जो दृष्टि व प्रबंध कुशलता मिली, उसी ने हिंद समाचार पत्र समूह के पत्रों को राष्ट्रव्यापी बनाने में अहम भूमिका निभाई। ‘पत्रकारिता के सुदृढ़ स्तम्भ’ कहे जाने वाले पत्रकार जगत नारायण का प्रारंभ इस समय ही हुआ। जिन मूल्यों, विचारों व आदर्शों की नींव इस समय रखी गई, पत्रकार जगत नारायण ने जीवन भर उन मूल्यों, विचारों व आदर्शों की रक्षा की। वह कभी उनसे पीछे नहीं हटे।

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वह कुछ देर के लिए राजनीति के क्षेत्र में अधिक सक्रिय नहीं रहे। उन्होंने अधिक ध्यान तथा समय पत्र और प्रैस को दिया और दोनों को आर्थिक  दृष्टि से स्थिरता प्रदान की तथा स्वयं भी आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर हो गए। 
 

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