Edited By Sarita Thapa,Updated: 23 Jul, 2026 10:40 AM
एक दिन माता पार्वती ने देवाधिदेव महादेव से एक बड़ा ही सहज, लेकिन गूढ़ सवाल पूछा। उन्होंने कहा— "हे प्राणनाथ! आप तो अजर-अमर और अविनाशी हैं। आखिर आपके अमर होने का रहस्य क्या है? मुझे भी वो गुप्त ज्ञान दीजिए। पहले तो भगवान शिव ने इस बात को टालने की कोशिश...
Amarnath Cave Mystery : एक दिन माता पार्वती ने देवाधिदेव महादेव से एक बड़ा ही सहज, लेकिन गूढ़ सवाल पूछा। उन्होंने कहा— "हे प्राणनाथ! आप तो अजर-अमर और अविनाशी हैं। आखिर आपके अमर होने का रहस्य क्या है? मुझे भी वो गुप्त ज्ञान दीजिए। पहले तो भगवान शिव ने इस बात को टालने की कोशिश की क्योंकि वो जानते थे कि 'अमर कथा' का नियम बहुत कड़ा है। अगर कोई भी जीव इस कथा को सुन ले, तो वह सृष्टि के चक्र से मुक्त होकर हमेशा के लिए अमर हो जाता है।
लेकिन जब माता पार्वती की जिज्ञासा बहुत बढ़ गई तो महादेव कथा सुनाने के लिए तैयार हो गए। अब बारी थी एक ऐसी गुप्त और एकांत जगह ढूंढने की जहां हवा के झोंके के अलावा कोई तीसरा प्राणी मौजूद न हो। इसके लिए महादेव ने हिमालय की अमरनाथ की पावन गुफा को चुना। महादेव नहीं चाहते थे कि कोई भी अन्य जीव इस परम ज्ञान को सुने। इसलिए अमरनाथ गुफा की ओर बढ़ते हुए। उन्होंने रास्ते में अपने तमाम प्रिय साथियों, गणों और तत्वों का परित्याग कर दिया और यही वो रास्ता है। जिसे आज हम अमरनाथ यात्रा का 'पहलगाम मार्ग' कहते हैं।
यात्रा की शुरुआत में महादेव ने सबसे पहले अपने परम वाहन नंदी महाराज को यहीं छोड़ दिया था। नंदी के बिना शिव ने आगे की यात्रा की, इसीलिए इस जगह को आज 'पहलगाम' कहा जाता है। यहां से करीब 16 किलोमीटर आगे बढ़ने पर आता है चंदनबाड़ी। यहां महादेव ने अपनी जटाओं से मुस्कुराते हुए चंद्रमा को उतारा और उन्हें यहीं रुकने का आदेश दिया। इसके बाद रास्ता और कठिन हो जाता है। जब आप पिस्सू टॉप की ओर बढ़ेंगे, तो यह 11,500 फीट ऊंचा पहाड़ आता है। मान्यता है कि यहां देवताओं और असुरों के बीच भयंकर युद्ध हुआ था। देवताओं ने राक्षसों का संहार करके उनकी हड्डियों का जो ढेर लगाया।वही आज पिस्सू घाटी का पहाड़ है। यह स्थान आपके संकल्प की परीक्षा लेता है।
चंदनबाड़ी से 13 किलोमीटर दूर नीले, शांत और पारदर्शी पानी की एक अद्भुत झील आती है- शेषनाग झील। यहां भगवान शिव ने अपने गले में लिपटे परम सखा वासुकी नाग और अन्य सर्पों को विसर्जित कर दिया था। स्थानीय लोगों का मानना है कि आज भी 24 घंटे में एक बार शेषनाग इस झील के ऊपर आते हैं और भक्तों को उनकी परछाई दिखती है। भू वैज्ञानिकों के लिए यह झील एक शोध का विषय है क्योंकि इसका पानी इतना स्थिर और स्वच्छ है कि ऊपर से देखने पर यह किसी कांच के टुकड़े जैसा लगता है। सवाल यह है कि हिमालय के इस अस्थिर क्षेत्र में जहां अक्सर बर्फ खिसक जाती है। यह झील अपना यह स्वरूप कैसे बनाए हुए है? क्या इसके तल में कोई ऐसा मार्ग है जो सीधे धरती को आंतरिक परतों की ओर ले जाता है? शेषनाग झील के किनारे जब यात्री आराम करते हैं तो वह अक्सर एक गहरी शांति का अनुभव करते हैं।

शेषनाग से आगे आता है महागुणस पास और फिर पंचतरणी। इसी मार्ग पर महादेव ने अपने प्रिय पुत्र भगवान गणेश को रुकने को कहा, जिसे आज 'गणेश टॉप' कहते हैं। इसके बाद, 12,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित पंचतरणी में महादेव ने आकाश, पाताल, वायु, जल और पृथ्वी. यानी अपने पंच तत्वों का भी परित्याग कर दिया! यहां बहने वाली पांच जलधाराएं शिव की जटाओं और इन्हीं पांच तत्वों का प्रतीक हैं। विज्ञान की दृष्टि से इतनी ऊंचाई पर बर्फीले पानी में स्नान करने से शरीर को झटका लग सकता है। लेकिन हैरानी यह कि श्रद्धालु यहां के पानी में नहाने के बाद एक अकल्पनीय ऊर्जा महसूस करते हैं। ये भी कहा जाता है कि यहां की मिट्टी और पानी में कोई ऐसे खनिज मौजूद हैं जो थकान को सोख लेते हैं। यात्रियों ने बताया कि स्मारग पर उन्हें बिना किसी ठोस कारण के एक गहरी भावनात्मक शांति महसूस होती है। मनोवैज्ञानिक इसे ऊंचाई और शारीरिक थकान से उपजा भावनात्मक रेचन कह सकते हैं। लेकिन श्रद्धालुओं के लिए यह महादेव के करीब होने का उनका पहला अनुभव होता है।
अब महादेव पूरी तरह एकाकी हो चुके थे। केवल वे और माता पार्वती अमरनाथ की उस मुख्य गुफा के सामने खड़े थे। गुफा के भीतर प्रवेश करने से पहले भगवान शिव ने अपनी तीसरी आंख से गुफा के चारों तरफ अग्नि प्रज्वलित कर दी, ताकि कोई सूक्ष्म जीव भी भीतर न आ सके। महादेव ने माता पार्वती से कहा- "हे देवी! मैं कथा शुरू कर रहा हूं, लेकिन तुम बीच-बीच में 'हुंकार' भरती रहना, ताकि मुझे पता चले कि तुम सोई नहीं हो और ध्यान से सुन रही हो। कथा शुरू हुई। महादेव सृष्टि के परम सत्य और अमरत्व का ज्ञान देने लगे। माता पार्वती बीच-बीच में हुंकार भरती रहीं। लेकिन कथा इतनी लंबी और गंभीर थी कि कुछ समय बाद माता पार्वती को गहरी नींद आ गई। पर हैरानी की बात ये थी कि महादेव को तब भी 'हुंकार' की आवाज़ सुनाई दे रही थी! दरअसल, जब महादेव गुफा को अग्नि से सुरक्षित कर रहे थे, तब वहां एक तोते (शुक) के दो अंडे छिपे रह गए थे, जिन पर शिव की दृष्टि नहीं पड़ी। कथा की दिव्य ऊर्जा से उन अंडों से तुरंत दो चूजे बाहर आ गए।
जब माता पार्वती सो गईं, तो उन नन्हे जीवों ने निरंतर हुंकार भरना शुरू कर दिया। जब कथा समाप्त हुई, तो महादेव ने देखा कि पार्वती तो सो रही हैं। उन्होंने क्रोध में मुड़कर देखा, तो वहां दो कबूतर बैठे थे। महादेव ने जैसे ही उन्हें मारने के लिए त्रिशूल उठाया। वो पक्षी बोले— "हे प्रभु! हमने आपकी पूरी अमर कथा सुन ली है। अगर आप हमें मार देंगे, तो आपकी यह कथा झूठी हो जाएगी। भगवान शिव मुस्कुराए और उन्होंने उन दोनों कबूतरों को आशीर्वाद दिया कि तुम साक्षात शिव और शक्ति के प्रतीक बनकर हमेशा इस गुफा में निवास करोगे। वही अमर कबूतरों का जोड़ा आज भी इस गुफा में भक्तों को दर्शन देता है। जहां जीवन का कोई अंश नहीं है, वहां इनका होना ही साक्षात शिव का चमत्कार है!

अमरनाथ गुफा से जुड़े रहस्य
समुद्र तल से लगभग 13,600 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह पवित्र गुफा कोई साधारण जगह नहीं है। एक ऐसी रहस्यमयी गुफा, जो साल के 10 महीने पूरी तरह बर्फ से ढकी रहती है। जहां इंसानों का पहुंचना नामुमकिन होता है। लेकिन जैसे ही सावन का महीना आता है। यहां गुफा की छत से टपकने वाली पानी की बूंदों से अपने आप एक ठोस बर्फ का शिवलिंग आकार लेने लगता है। हैरान करने वाली बात ये है कि यह शिवलिंग किसी इंसान द्वारा नहीं बनाया जाता। बल्कि स्वयंभू होता है और ये ही नहीं ये स्वयंभू शिवलिंग श्रावण पूर्णिमा को अपने पूरे भव्य स्वरूप में आ जाता है। और जैसे ही अमावस्या आती है। यह शिवलिंग धीरे-धीरे अपने आप लुप्त होने लगता है। गुफा की बाकी बर्फ छूते ही पिघल जाती है, लेकिन यह शिवलिंग एकदम ठोस बर्फ का होता है। इतना ही नहीं। कंपा देने वाली ठंड में, जहां ऑक्सीजन न के बराबर है, जहां दूर दूर तक कोई परिंदा भी पर नहीं मारता। वहां आज भी सफेद कबूतरों का एक जोड़ा साक्षात दिखाई देता है। माना जाता है ये वही कबूतर हैं जिन्होंने अमर कथा सुनी थी जो आज तक इसी गुफा में मौजूद है। और इनके दर्शन जिन्हें भी होते हैं वो इंसान जन्म मरण के चक्र से छूट जाता है।

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