Edited By Niyati Bhandari,Updated: 31 Mar, 2026 11:13 AM

Mahavir Jayanti Special: महावीर जयंती का पर्व जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी के जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज से 599 ईसा पूर्व चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को क्षत्रिय कुल में भगवान महावीर का जन्म हुआ था। राजसी क्षत्रिय कुल में पिता...
Mahavir Jayanti Special: महावीर जयंती का पर्व जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी के जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज से 599 ईसा पूर्व चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को क्षत्रिय कुल में भगवान महावीर का जन्म हुआ था। राजसी क्षत्रिय कुल में पिता सिद्धार्थ और माता त्रिशला के घर तीसरी संतान के रूप में वर्धमान ने जन्म लिया था। घर में समस्त भौतिक सुख-सुविधाओं का भंडार होने के बावजूद वर्धमान भगवान महावीर वैराग्य, तपस्या के मार्ग के पथिक बने। वैराग्य और साधना के प्रबल संस्कारों ने भगवान महावीर को आध्यात्मिक साधना के मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्रदान की। युवावस्था में ही वर्धमान ने आध्यात्मिक आनंद की प्राप्ति हेतु समस्त भौतिक संसाधनों को त्याग दिया था।
30 वर्ष की आयु में महावीर ने श्रामणी दीक्षा ली। अपरिग्रह तथा अहिंसा की साधना का कठोरता से पालन किया। अपने शरीर के निर्वाह के लिए भी महावीर ने किंचित मात्र भी वस्त्रों का संग्रह नहीं किया। भोजन भी वर्धमान स्वयं अपने हाथों पर ही कर लिया करते थे।
महावीर ने 12 साल तक मौन तपस्या की। 42 वर्ष की आयु में इन्हें कैवल्य (सर्वोच्च ज्ञान) प्राप्त हुआ। उन्होंने अपने उपदेश अर्धमागधी भाषा में दिए ताकि जन सामान्य भी उनके भाव को समझ सके तथा समस्त प्राणियों की आध्यात्मिक मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया। जैन धर्म में तीर्थंकर शब्द का अर्थ है वे आत्माएं जो मानवीय पीड़ा और हिंसा से भरे इस सांसारिक जीवन को पार कर आध्यात्मिक मुक्ति के क्षेत्र में पहुंच गई हैं। महावीर जी ने इसी आध्यात्मिक मुक्ति के आनंद को साधना से अनुभूत किया था।

इन्होंने अपने संपूर्ण जीवन में लोगों को अहिंसा, सत्य, अचोर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह जैसे सिद्धांतों पर चलने के लिए प्रेरित किया। जैन धर्म में इन पांच सिद्धांतों को ‘पंच महाव्रत’ कहा जाता है।
‘मनसा वाचा कर्मणा’ जीवन में अहिंसा का पूर्ण रूप से पालन करना, सदैव सत्याचरण करना, चोरी न करना, इंद्रिय संयम का पालन करते हुए ब्रह्मचर्य के पथ पर चलना, भौतिक पदार्थ का अत्यधिक संग्रह न करना। इन सभी जीवन उपयोगी उपदेशों को महावीर जी ने जन सामान्य तक पहुंचाया। महावीर स्वामी अहिंसा के मूर्तिमान प्रतीक थे।
उन्हें वीर, अतिवीर, सन्मति के नामों से भी पुकारा जाता है। महावीर जी ने श्रमण-श्रामणी, श्रावक -श्राविका सबको लेकर चतुर्विध संघ की स्थापना की।
महावीर ने किसी के अस्तित्व को मिटाने की अपेक्षा उसे शांति से जीने दो तथा स्वयं भी शांति से जीवन व्यतीत करने का स्वर्णिम सूत्र दिया।
‘अहिंसा परमो धर्म:’ इनका आदर्श वाक्य था। स्वामी जी के उपदेश समस्त समाज के लिए कल्याणकारी हैं। उन्होंने नैतिकता, करुणा, सत्य, अहिंसा के मार्ग पर चलने का दिव्य संदेश प्रदान किया।
