ओंकारेश्वर में मोरारी बापू ने खोला स्वस्तिक और ॐ का रहस्य, नर्मदा तट पर दिया कल्याण का संदेश

Edited By Updated: 15 Oct, 2026 05:50 PM

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भारत स्वस्तिक यात्रा आज सनावद पहुंची। यहां ओंकारेश्वर महादेव मंदिर के पास मां नर्मदा के तट पर भक्तों को श्रीराम कथा का श्रवण कराया गया। मंगलाचरण और हनुमान चालीसा के पाठ के बाद परमात्मा की असीम कृपा से मानस स्वस्तिक यात्रा का यह पड़ाव शुरू हुआ।

भारत स्वस्तिक यात्रा आज सनावद पहुंची। यहां ओंकारेश्वर महादेव मंदिर के पास मां नर्मदा के तट पर भक्तों को श्रीराम कथा का श्रवण कराया गया। मंगलाचरण और हनुमान चालीसा के पाठ के बाद परमात्मा की असीम कृपा से मानस स्वस्तिक यात्रा का यह पड़ाव शुरू हुआ। कथा के दौरान पूज्य मोरारी बापू ने ओंकारेश्वर, नर्मदा जी, मठ, पीठ, पुजारी गण, भक्तों और सेवादारों को प्रणाम किया। कथा के दौरान बापू ने जगद्गुरु शंकराचार्य जी से जुड़ा एक प्रसंग सुनाया।  उन्होंने बताया कि एक बार शंकराचार्य जी ने एक वृद्ध ब्राह्मण को व्याकरण रटते हुए देखा। तब उन्होंने पूछा कि कब तक इसे रटते रहोगे? इसके बाद शंकराचार्य जी ने उसे ‘भज गोविंदम’ का संदेश दिया। आज कथा शुरू होने में देरी हुई तो बापू ने इसे भी भगवान की लीला बताया। उन्होंने कहा कि किसी ने उनसे कहा था कि जब आप व्यास पीठ पर बैठते हैं तो स्टेट बैंक लगते हैं, लेकिन व्यास पीठ से उतरने के बाद रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया लगते हैं।

ॐ और स्वस्तिक का क्या है महत्व?
पूज्य मोरारी बापू ने कहा कि आज हम ओंकारेश्वर में हैं। ॐ स्वस्तिक का मूल है। एक शब्दकोश के अनुसार स्वस्तिक का अर्थ मीठा खाने वाला पदार्थ भी बताया गया है। आज स्कंदमाता का दिन भी है। उन्होंने कहा कि सभी मंत्रों की शुरुआत ॐ से होती है। ऋषि-मुनियों ने विश्व के कल्याण की भावना से इसका निर्माण किया। बापू ने भारत की परंपराओं में नौ अंक के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि भारत में अनेक ऐसी चीजें देखने को मिलती हैं, जिनका संबंध नौ से है। नौवीं तिथि, नवरंग, नवग्रह, नौ तिथियां, नवरात्रि और नौ खंड जैसी मान्यताएं इसका उदाहरण हैं। कहीं भक्ति के नौ प्रकार बताए गए हैं तो कहीं नौ निधियों का उल्लेख मिलता है। इसी तरह नौ नाथों की परंपरा भी प्रचलित है।

ओंकारेश्वर और विभिन्न प्रकार के नाद
कथा में बापू ने नाद के अलग-अलग रूपों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ओंकारेश्वर नाद का प्रतीक है। शंख नाद, वेणु नाद, सिंह नाद, मेघनाद, डमरू नाद, समीर नाद, वरुण नाद, गुरु द्वारा शिष्य के कान में दिया जाने वाला वनुष नाद और वंश नाद जैसे विभिन्न नादों का उल्लेख मिलता है।

अभिमान के प्रकार और विनम्रता का संदेश
मोरारी बापू ने लोगों में पाए जाने वाले अभिमान के विभिन्न रूपों पर भी बात की। उन्होंने कहा कि अभिमान कई प्रकार का होता है, जिनमें अच्छा अभिमान, मिथ्या अभिमान, स्वाभिमान और निराभिमान जैसे भाव शामिल हैं। उन्होंने महाप्रभु जी के विचार का उल्लेख करते हुए कहा कि व्यक्ति को इतना झुक जाना चाहिए कि हवा चलने पर जिस तरह पत्ता डोलने लगता है, उसी तरह मनुष्य को भी विनम्र होना चाहिए। बापू ने एक सेठ और भिखारी का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि एक बार एक सेठ ने रास्ते में एक भिखारी को पैसे देने शुरू किए। इसी दौरान किसी ने भिखारी से कहा कि तुम अच्छे घर के लगते हो, भिखारी नहीं लगते। इस पर उसने जवाब दिया कि वह भिखारी ही था, लेकिन जब लोग सेठ जैसे व्यक्तियों की तरह सौ-सौ रुपये देने लगे तो उसकी स्थिति बदल गई। इस प्रसंग के माध्यम से बापू ने समझाया कि लोगों में अलग-अलग तरह की खुमारी होती है। किसी को पैसे की खुमारी होती है तो किसी को अपने रोग या दूसरी चीजों की। लेकिन पंजाब जाकर यदि श्री गुरु नानक देव जी से पूछा जाए तो बाबा जी का संदेश होगा, ‘नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात।’ इसका भाव है कि हरि के नाम का स्मरण दिन-रात करते रहना चाहिए और उसी की खुमारी मन में बनी रहनी चाहिए।

साधु बनने से ज्यादा जरूरी है साधु का हो जाना
बापू ने कहा कि हर व्यक्ति को अपने इष्ट और अपने आचार्य के प्रति प्रेम और श्रद्धा की खुमारी होनी चाहिए। लोग उनसे कहते हैं कि वे साधु नहीं बन सकते। इस पर बापू कहते हैं कि साधु मत बनो, साधु के हो जाओ। उन्होंने श्री गुरु नानक देव जी के ‘एक ओंकार’ के संदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि ओंकार कल्याण करने वाला है। उन्होंने गुजराती में गाए जाने वाले भजन ‘ॐ मंगलम, ओंकार मंगलम, गुरु मंगलम, गुरुद्वार मंगलम’ का भी जिक्र किया। बापू ने स्वस्तिक के बारे में बताते हुए कहा कि उन्होंने यह भी पढ़ा है कि जहां चार रास्ते निकलकर बीच के एक बिंदु पर मिलते हैं, वहां स्वस्तिक का स्वरूप बनता है।

नवरात्रि में बलि प्रथा पर बापू ने जताई पीड़ा
नवरात्रि के दौरान आज भी कई जगहों पर बलि दी जाती है। इस विषय पर बापू ने व्यास पीठ से संदेश देते हुए कहा कि ऐसा नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब उन्हें इस तरह की प्रथाओं के बारे में पता चलता है तो उन्हें बहुत पीड़ा होती है। उन्होंने कहा कि साधु किसी जाति का नाम नहीं, बल्कि एक स्वभाव का नाम है। मनुष्य के भीतर विनम्रता, प्रेम और अच्छे गुण होने चाहिए।

सुपुत्र और उपासना का महत्व
कथा के दौरान बापू ने कहा कि सुपुत्र से पितृलोक धन्य होता है और उपासना से देवलोक धन्य होता है। उन्होंने राम के महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि राम वह हैं, जिनकी यात्रा पैरों से शुरू नहीं होती।  बापू ने भारत स्वस्तिक यात्रा के भाव को समझाते हुए कहा कि हम जो यात्रा कर रहे हैं, वह केवल गाड़ी से नहीं, बल्कि नाम रूपी प्रसाद के माध्यम से हो रही है। इस यात्रा का आधार भगवान का नाम और उनकी कृपा है।

सनातन धर्म और आचार्यों की भूमिका
पूज्य मोरारी बापू ने कहा कि सनातन धर्म का कोई नाश नहीं कर सकता, हालांकि उसे नुकसान जरूर पहुंचाया जा सकता है। जब-जब नुकसान होता है, तब भगवान आते हैं और यदि भगवान नहीं आते तो आचार्य आते हैं। इस संदेश के माध्यम से बापू ने सनातन धर्म की निरंतरता, आचार्यों के मार्गदर्शन और भगवान के नाम की महिमा को समझाया। ओंकारेश्वर में मां नर्मदा के तट पर आयोजित श्रीराम कथा में श्रद्धा, भक्ति, विनम्रता और विश्व कल्याण का संदेश प्रमुख रूप से सामने आया।

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