Edited By Sarita Thapa,Updated: 13 Jun, 2026 12:18 PM

किसी आश्रम में एक संत अपने शिष्यों के साथ रहते थे। एक दिन कुछ शिष्यों ने अपने संत से प्रश्न किया, “गुरु जी, धन, परिवार और धर्म में कौन सच्चा सहायक होता है?”
Motivational Story : किसी आश्रम में एक संत अपने शिष्यों के साथ रहते थे। एक दिन कुछ शिष्यों ने अपने संत से प्रश्न किया, “गुरु जी, धन, परिवार और धर्म में कौन सच्चा सहायक होता है?”
संत ने इसका उत्तर देने के लिए एक प्रसंग सुनाया। उन्होंने बात जारी रखते हुए कहा कि एक व्यक्ति के तीन मित्र थे। जिनमें से एक सबसे प्रिय था। उसके साथ वह अधिक समय बिताता था। कहीं भी जाना होता तो उसी के साथ जाता। दूसरे मित्र से उसकी कम घनिष्ठता थी और तीसरा मित्र बिल्कुल उपेक्षित था। वह उससे बहुत कम मिलता था।
एक बार वह व्यक्ति किसी मुसीबत में फंस गया जिसके कारण उसे राज दरबार में बुलाया गया। वह घबरा गया। उसे अकेले जाने में डर लगा, इसलिए उसने अपने किसी मित्र को साथ ले जाने की सोची। वह अपने सबसे प्रिय मित्र के पास गया, लेकिन उसने उसके साथ जाने से इन्कार कर दिया। फिर वह दूसरे के पास गया। उसने व्यस्तता के कारण जाने से मना कर दिया।

हां, यह जरूर कहा कि और कोई मदद हो तो कर दूंगा। वह व्यक्ति निराश हो गया। फिर वह तीसरे मित्र के पास पहुंचा। तीसरे ने उसकी पूरी बात सुनी और सहायता करने का वचन देकर उसके साथ राज दरबार गया। राज दरबार में उसने अपने मित्र का पक्ष रखा और उसे संंकट से बचाकर ले आया।
प्रसंग समाप्त होने पर संत ने अपने शिष्यों को तीनों के अर्थ बताते हुए कहा, “पहला मित्र धन है, जिसे परमप्रिय समझा जाता है, लेकिन वह मृत्यु के बाद घर के बाहर एक कदम नहीं निकालता। दूसरा मित्र परिवार है जो यशासंभव सहायता तो करता है, लेकिन उसका सहयोग शरीर रहने तक ही रहता है। धर्म वह मित्र है जो इस लोक और परलोक दोनों में साथ देता है।” यह सुनने के बाद शिष्यों में धर्म के प्रति आस्था और बढ़ गई।

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