Edited By Niyati Bhandari,Updated: 22 Aug, 2026 07:48 AM

Onam 2026 Thiruvonam Date and Story: केरल का प्रसिद्ध त्योहार ओणम इस साल 16 अगस्त से शुरू हो चुका है। जानें थिरुवोनम की सही तारीख, असुर राजा महाबली की अमर कथा और भगवान विष्णु के वामन अवतार का रहस्य।
Onam 2026 Special: हिंदू शास्त्रों के प्राचीन ग्रंथों में देवी-देवताओं की बहुत सारी कथाएं वर्णित हैं। इसके अतिरिक्त देव और असुरों में वैर भाव भी सदियों से चला आ रहा है। जिसकी गाथाएं भी सनातन पुराणों में मिलती हैं। क्या आप जानते हैं, कुछ ऐसे असुर भी हुए हैं, जो भगवान विष्णु के बहुत प्रिय रहे हैं। भारत के दक्षिण राज्य केरल में पारंपरिक और प्रसिद्ध पर्व ओणम असुर राजा के स्वागत में मनाया जाता है। जो एक नहीं बल्कि पूरे 10 दिन तक मनाया जाता है। 16 अगस्त 2026 से 10 दिनों तक चलने वाले इस पारंपरिक महापर्व का आरंभ हो चुका है। इस उत्सव का अंतिम दिन बहुत ही खास होता है, जिसे थिरुवोनम (Thiruvonam) कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के आधार पर यह कहा जाता है की थिरुवोनम के दिन राजा महाबली अपनी प्रजा से मिलने हेतु केरल की धरती पर आते हैं।

ओणम 2026: कब है सबसे खास दिन 'थिरुवोनम'?
केरल में मनाया जाने वाला ये लोकप्रिय पर्व फसल काटने की खुशी, समृद्धि, खुशहाली और नए आरंभ का प्रतीक है। साल 2026 में ओणम का ये सबसे महत्वपूर्ण दिन थिरुवोनम 26 अगस्त, 2026 बुधवार को मनाया जाएगा।

वामन अवतार की कथा
वामन अवतार की कथानुसार देव और दैत्यों के युद्ध में दैत्य पराजित होने लगे थे। पराजित दैत्य मृत एवं आहतों को लेकर अस्ताचल चले जाते हैं और दूसरी ओर दैत्यराज बलि इंद्र के वज्र से मृत हो जाते हैं। तब दैत्य गुरु शुक्राचार्य अपनी मृत संजीवनी विद्या से बलि और दूसरे दैत्यों को भी जीवित एवं स्वस्थ कर देते हैं। राजा बलि के लिए शुक्राचार्य एक यज्ञ का आयोजन करते हैं तथा अग्नि से दिव्य रथ, बाण, अभेद्य कवच पाते हैं। इससे असुरों की शक्ति में वृद्धि हो जाती है और असुर सेना अमरावती पर आक्रमण कर देती है।
देवताओं के राजा इंद्र को दैत्य राज बलि की इच्छा का ज्ञान होता है कि बलि सौ यज्ञ पूरे करने के बाद स्वर्ग को प्राप्त करने में सक्षम हो जाएगा। इंद्र भगवान तब विष्णु की शरण में जाते हैं। भगवान विष्णु उनकी सहायता करने का आश्वासन देते हैं और वामन रूप में माता अदिति के गर्भ से उत्पन्न होने का वचन देते हैं। दैत्यराज बलि द्वारा देवों के पराभव के बाद ऋषि कश्यप के कहने से माता अदिति पयोव्रत का अनुष्ठान करती हैं, जो पुत्र प्राप्ति के लिए किया जाता है। तब भगवान विष्णु भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी के दिन माता अदिति के गर्भ से प्रकट हो अवतार लेते हैं तथा ब्रह्मचारी ब्राह्मण का रूप धारण करते हैं।
महर्षि कश्यप ऋषियों के साथ उनका उपनयन संस्कार करते हैं। वामन बटुक को महर्षि पुलह ने यज्ञोपवीत, अगस्त्य ने मृगचर्म, मरीचि ने पलाश का दंड, आंगिरस ने वस्त्र, सूर्य ने छत्र, भृगु ने खड़ाऊं, गुरु देव ने जनेऊ तथा कमंडल, माता अदिति ने कोपीन, सरस्वती ने रुद्राक्ष की माला तथा कुबेर ने भिक्षा पात्र प्रदान किए। तत्पश्चात भगवान वामन पिता से आज्ञा लेकर बलि के पास जाते हैं। उस समय राजा बलि नर्मदा के उत्तर-तट पर अंतिम यज्ञ कर रहे होते हैं। वामन अवतारी श्री हरि राजा बलि के यहां भिक्षा मांगने पहुंच जाते हैं। ब्राह्मण बने भगवान विष्णु भिक्षा में तीन पग भूमि मांगते हैं। राजा बलि दैत्यगुरु शुक्राचार्य के मना करने पर भी अपने वचन पर अडिग रहते हुए विष्णु को तीन पग भूमि दान में देने का वचन कर देते हैं।
वामन रूप में भगवान विष्णु एक पग में स्वर्गादि उर्ध्व लोकों को और दूसरे पग में पृथ्वी को नाप लेते हैं। अब तीसरा पग रखने को कोई स्थान नहीं रह जाता। बलि के सामने संकट उत्पन्न हो जाता है कि वामन के तीसरा पग रखने के लिए स्थान कहां से लाए। ऐसे में राजा बलि यदि अपना वचन नहीं निभाए तो अधर्म होगा।
आखिरकार बलि अपना सिर भगवान के आगे कर देते हैं और कहते हैं तीसरा पग आप मेरे सिर पर रख दीजिए। वामन भगवान ठीक वैसा ही करते हैं और बलि को पाताल लोक में रहने का आदेश देते हैं। बलि सहर्ष भवदाज्ञा को शिरोधार्य करता है। बलि के द्वारा वचन पालन करने पर भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न होते हैं और दैत्यराज बलि को वर मांगने को कहते हैं। इसके बदले में बलि रात-दिन भगवान को अपने सामने रहने का वचन मांग लेते हैं, श्री विष्णु अपने वचन का पालन करते हुए पाताल लोक में राजा बलि का द्वारपाल बनना स्वीकार करते हैं।
महाबली की अनन्य भक्ति और अपनी प्रजा के प्रति अटूट प्रेम को देखते हुए भगवान विष्णु ने उन्हें एक विशेष वरदान दिया था। जिसके अनुसार असुरराज महाबली साल में एक बार अपनी प्रजा से मिलने धरती पर आते हैं। ओणम के दौरान केरल की प्रजा अपने प्रिय राजा के स्वागत की तैयारियां जोर-शोर से करते हैं। इसी मान्यता के चलते ओणम में महाबली का स्वागत किसी क्रूर असुर की तरह नहीं, बल्कि अपने ही परिवार के किसी सम्मानित और प्रिय सदस्य की तरह किया जाता है।

थिरुवोनम पर कैसे होता है राजा महाबली का स्वागत?
ओणम के दौरान थिरुवोनम के दिन का विशेष और धार्मिक महत्व है क्योंकि इसी दिन राजा महाबली अपनी प्रजा से मिलने आते हैं। इस पावन अवसर पर केरलवासी अपने घरों में विशेष पूजा का आयोजन करते हैं। राजा के स्वागत के लिए घरों को रंग-बिरंगे फूलों की सुंदर रंगोलियों से सजाया जाता है, जिसे पुक्कलम (Pookkalam) कहा जाता है। इस दिन घरों में 26 से अधिक पकवानों वाला विशेष पारंपरिक भोज तैयार किया जाता है, जिसे ओणम साध्या (Onam Sadya) कहते हैं। लोग नए वस्त्र पहनते हैं और पूरे परिवार के साथ मिलकर हर्षोल्लास से इस पर्व को मनाते हैं।
