Edited By Ramkesh,Updated: 22 Aug, 2026 03:53 PM

त्रिपुरा उच्च न्यायालय ने महिला सरकारी कर्मचारियों के लिए बाल्य देखभाल अवकाश (सीसीएल) पर एक अहम फैसले में कहा है कि अधिकारियों को ऐसी छुट्टी के लिए दी गयी अर्जियों में बताये गये वास्तविक ज़रूरतों का गंभीरता से मूल्यांकन करना चाहिए और यह भी ध्यान...
अगरतला: त्रिपुरा उच्च न्यायालय ने महिला सरकारी कर्मचारियों के लिए बाल्य देखभाल अवकाश (सीसीएल) पर एक अहम फैसले में कहा है कि अधिकारियों को ऐसी छुट्टी के लिए दी गयी अर्जियों में बताये गये वास्तविक ज़रूरतों का गंभीरता से मूल्यांकन करना चाहिए और यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यह कोई पक्का कानूनी अधिकार नहीं है। न्यायमूर्ति बिस्वजीत पालित ने राज्य सरकार को एक महिला स्रातकोत्तर शिक्षक को 365 दिन की सीसीएल देने का निर्देश दिया।
त्रिपुरा हाईकोर्ट बोलेा- 365 दिन की सीसीएल मंज़ूर करें
उन्होंने पाया कि शिक्षक की अर्जी पर न तो ठीक से विचार किया गया था और न ही उसे सही आधार पर खारिज किया गया था। न्यायालय ने स्कूल शिक्षा विभाग को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता तापसी रॉय को 365 दिन की सीसीएल मंज़ूर करें। तापसी रॉय एक अनुदानित संस्थान में गणित की स्रातकोत्तर शिक्षक हैं। यह छुट्टी त्रिपुरा राज्य सिविल सेवा (छुट्टी) नियम, 1986 के नियम 39(सी) के तहत 16 जनवरी, 2026 से 15 जनवरी, 2027 तक के लिए दी जानी है।
इकलौते बेटे के लिए महिला ने मांगी थी छुट्टी
याचिकाकर्ता के अनुसार उसका इकलौता बच्चा नयी दिल्ली के केंद्रीय विद्यालय, जेएनयू में पढ़ता था। वह अप्रैल 2026 में कक्षा नौ से कक्षा 10 में प्रवेश किया है और 2027 में उसे बोडर् परीक्षा देनी है। याचिकाकर्ता की कानूनी टीम ने तर्क दिया कि इस अहम समय में उनके बेटे को लगातार स्कूलिंग और ट्यूशन की ज़रूरत थी, साथ ही माता-पिता के भावनात्मक सहयोग की भी आवश्यकता थी। उनके पति गृह मंत्रालय में ऐसी नौकरी पर थे जिसमें उनका तबादला होता रहता था, इसलिए उनके लिए बेटे की देखभाल के लिए मौजूद रहना मुश्किल था।
स्कूल सचिव से अफसोस जताने के अलावा कोई ठोस जवाब नहीं दिया
याचिकाकर्ता ने कई बार प्राधानाचार्य को सीसीएल के लिए अर्जियां दीं, लेकिन स्कूल सचिव से अफसोस जताने के अलावा कोई ठोस जवाब नहीं मिला। आखिरकार उन्होंने दो सितंबर, 2025 को माध्यमिक शिक्षा निदेशक को सीसीएल और 16 जनवरी, 2026 से 15 जनवरी, 2027 तक स्टेशन छोड़ने की अनुमति के लिए एक विस्तृत अर्जी भेजी। इसमें उन्होंने अपने बेटे की पढ़ाई और भलाई से जुड़ी ज़रूरतों का हवाला दिया , हालांकि संबंधित अधिकारियों ने इन पर कोई कार्रवाई नहीं की। इसके बाद वह न्याय पाने के लिए उच्च न्यायालय गयी। न्यायालय ने कहा कि कार्यकारी निर्देश किसी कानूनी नियम के पूरक तो हो सकते हैं, लेकिन उसकी जगह नहीं ले सकते।