Edited By ,Updated: 08 Jan, 2026 06:58 AM

तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के निर्माण का विरोध करते हुए 17 से अधिक पत्र लिखे थे। राष्ट्रपति तथा कैबिनेट मंत्रियों को लिखे पत्रों में उन्होंने सोमनाथ मंदिर के पुनॢनर्माण की जरूरत पर प्रश्र उठाया था और उन्हें इसके...
तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के निर्माण का विरोध करते हुए 17 से अधिक पत्र लिखे थे। राष्ट्रपति तथा कैबिनेट मंत्रियों को लिखे पत्रों में उन्होंने सोमनाथ मंदिर के पुनॢनर्माण की जरूरत पर प्रश्र उठाया था और उन्हें इसके उद्घाटन समारोह में शामिल होने से बहुत हतोत्साहित किया था। उन्होंने सरकारी संचार माध्यमों को निर्देश दिया कि समारोह की कवरेज कम से कम की जाए।
उन्होंने भारतीय दूतावासों को भी निर्देश दिए कि वह सोमनाथ ट्रस्ट को सहायता प्रदान न करें। कुल मिलाकर इन पत्रों ने पंडित जवाहर लाल नेहरू के सोमनाथ मंदिर के पुनॢनर्माण के विरोध तथा सहजता को प्रदर्शित किया। 21 अप्रैल 1951 को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को लिखे पत्र में जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें आश्वस्त किया कि सोमनाथ के द्वारों को लेकर गढ़े जा रहे अख्यान ‘पूरी तरह से गलत’ हैं और इस बात पर जोर दिया कि ऐसा कुछ नहीं हो रहा। 28 अप्रैल 1951 को भारत के तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री आर.आर. दिवाकर को लिखे पत्र में जवाहर लाल नेहरू ने सूचना व प्रसारण मंत्रालय को सोमनाथ मंदिर के निर्माण संबंधी कवरेज बारे प्रचार को निम्रतम करने को कहा और कहा कि यह समारोह विश्व में भारत की छवि को क्षति पहुंचा रहा है। उन्होंने 2 मई 1951 को राज्यों के मुख्यमंत्रियों को 2 पत्र लिखे जिनमें उन्होंने अथाह जन समर्थन तथा अपने खुद के सहयोगियों की शमूलियत का सम्मान न करते हुए उनसे कहा कि भारत सरकार सोमनाथ मंदिर से संबंधित समारोहों से खुद को दूर रख रही है।
1 अगस्त 1951 को मुख्यमंत्रियों को लिखे अपने पत्र में जवाहर लाल नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह को लेकर किए जा रहे जोरदार प्रचार को भारत की धर्मनिरपेक्ष की छवि को कमजोर करने वाला बताया और कहा कि इससे विदेशों में बहुत बुरा प्रभाव जा रहा है। पाकिस्तान के विद्वेषपूर्ण प्रोपेगंडा पर प्रश्र उठाने की बजाय उन्होंने तर्क दिया कि सोमनाथ का पुनॢनर्माण भारत की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा रहा है। उन्होंने 20 जुलाई 1950 को तत्कालीन केंद्रीय खाद्य एवं कृषि मंत्री के.एम. मुंशी को लिखे पत्र में प्रश्र उठाया कि सोमनाथ मंदिर का निर्माण क्यों किया जाना चाहिए, जबकि देश में आवासों की कमी है तथा आॢथक स्थिति खराब है। 13 जून 1951 को उप-राष्ट्रपति ड़ा. एस. राधाकृष्णन को लिखे अपने पत्र में उन्होंने सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह को एक अनावश्यक ‘कोलाहल’ बताया और स्वीकार किया कि उन्होंने कैबिनेट मंत्रियों को इसमें शामिल होने से रोकने का प्रयास किया था। 17 अप्रैल 1951 को चीन में भारत के राजदूत के.एम. पाणिक्कर को लिखे अपने पत्र में नेहरू ने खुले तौर पर स्वीकार किया कि उन्होंने सोमनाथ मंदिर में राष्ट्रपति के दौरे के प्रभावों को कम करने का प्रयास किया था। तत्कालीन सौराष्ट्र के मुख्यमंत्री यू.एन. धेबार को 21 अप्रैल 1951 को लिखे पत्र में जवाहर लाल नेहरू ने सोमनाथ मंदिर समारोह के लिए इस्तेमाल किए जा रहे सरकारी फंड पर आपत्ति जताई तथा तर्क दिया कि मंदिर एक सरकारी मामला नहीं है।
22 अप्रैल 1951 को नवानगर के जाम साहिब दिग्विजय सिंह जी को लिखे पत्र में जवाहर लाल नेहरू ने सोमनाथ ट्रस्टियों के पवित्र नदियों के जल तथा मिट्टी के लिए विदेशी मिशनों तक पहुंचने पर चिंता व्यक्त करते हुए तर्क दिया कि इससे एक गलत सरकारी धारणा बनती है। उन्होंने इसे एक निजी मामला बताते हुए भारत सरकार को इससे दूर रखा। यहां तक कि सौराष्ट्र सरकार की भी इससे जुडऩे और सरकारी फंडों को खर्च करने को लेकर आलोचना की। दो दिन बाद ही जाम साहिब को ही 24 अप्रैल 1951 को लिखे पत्र में उन्होंने खुले तौर पर सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह को ‘नव जागरणवाद’ बताते हुए इसकी खुल कर आलोचना की और चेतावनी दी कि राष्ट्रपति तथा मंत्रियों का इसमें शामिल होना राष्ट्र तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बुरे प्रभाव डालेगा।
17 अप्रैल 1951 को विदेशी मामलों के मंत्रालय में महासचिव तथा विदेश सचिव को लिखे पत्र में जवाहर लाल नेहरू ने निर्देश दिया कि दूतावासों को सोमनाथ ट्रस्ट की ओर से पवित्र नदियों के पानी को लेकर किए गए आवेदन पर जरा भी ध्यान न दिया जाए, जो स्पष्ट दर्शाता है कि हिंदू धार्मिक गतिविधियों से वह कितने असहज थे। 9 मई 1951 को विदेश मंत्रालय के सचिव एस. दत्त को लिखे पत्र में जवाहर लाल नेहरू ने इस समारोह के साथ भारत सरकार की किसी भी तरह की संबंधता को लेकर अपनी नाखुशी जाहिर की। पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त खूब चंद को 19 मार्च 1951 को लिखे अपने पत्र में पं. नेहरू ने सोमनाथ के अभिषेक के लिए सिंधु नदी के जल के इस्तेमाल को औपचारिक रूप से अस्वीकार कर दिया और विदेश सचिव के माध्यम से यह संदेश भिजवाया कि इस याचना को उनकी स्वीकृति नहीं है।
2 मार्च 1951 को राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को लिखे पत्र में जवाहर लाल नेहरू ने पूर्ण खुले तौर पर स्वीकार किया कि उन्हें सोमनाथ के उद्घाटन समारोह में राष्ट्रपति का शामिल होना बिल्कुल पसंद नहीं। केंद्रीय गृहमंत्री सी. राजगोपालाचारी को 11 मार्च 1951 को लिखे पत्र में पं. नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह में राष्ट्रपति के शामिल होने का खुलकर विरोध किया। राजगोपालाचारी को ही 17 अप्रैल 1951 को लिखे पत्र में उन्होंने स्वीकार किया कि वह सोमनाथ मंदिर को लेकर ‘बहुत अधिक परेशान हैं’। और 24 अप्रैल 1951 को कांग्रेस नेता मृदुला साराभाई को लिखे अपने पत्र में उन्होंने कहा कि सोमनाथ मंदिर का मामला उन्हें बहुत अधिक परेशान कर रहा है और खुलकर स्वीकार किया कि वह ङ्क्षहदू सभ्यता के पुनरुद्धार को लेकर बहुत असहज महसूस करते हैं। (‘बी.एस.’ से साभार)