Edited By Sarita Thapa,Updated: 18 Sep, 2026 07:00 AM

हिंदू परंपरा में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि का विशेष महत्व है। इस पावन तिथि को संतान सप्तमी या मुक्ताभरण सप्तमी के रूप में मनाया जाता है।
Santan Saptami 2026 Mistakes : हिंदू परंपरा में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि का विशेष महत्व है। इस पावन तिथि को संतान सप्तमी या मुक्ताभरण सप्तमी के रूप में मनाया जाता है। यह व्रत और पूजन मुख्य रूप से माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छी सेहत, सुरक्षा और उनके उज्जवल भविष्य की कामना के लिए रखती है। मानताओं के अनुसार, इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की सच्चे मन और पूरे विधि-विधान के साथ पूजा की जाती है। लेकिन जाने-अनजाने में की गई कुछ छोटी-छोटी गलतियां आपके इस कठिन व्रत और पूजा के फल को कम या निष्फल कर सकती है। तो आइए जानते हैं कि इस दिन कौन सी 5 गलतियां नहीं करनी चाहिए।
संतान सप्तमी के धागे का अनादर करना
संतान सप्तमी की पूजा में सूती या रेशमी धागा सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है, जिसमें 7 गांठें लगाई जाती हैं। कई लोग पूजा के बाद इस पवित्र डोरे को कहीं भी रख देते हैं या उसे गंदे हाथों से छू लेते हैं। पूजा के दौरान इस डोरे को भगवान शिव-पार्वती के सामने रखकर अभिमंत्रित करें। पूजा समाप्त होने के बाद पुरुषों को इसे अपने दाएं हाथ में और महिलाओं को बाएं हाथ में बांधना चाहिए। इसे पूरे साल संभालकर रखना चाहिए, इसे फेंकना या खोना बेहद अशुभ माना जाता है।
भोग और खीर के नियमों की अनदेखी
संतान सप्तमी के पूजन में भोग का विशेष विधान है। इस दिन मुख्य रूप से गुड़ और आटे की पूड़ियां और खीर का प्रसाद बनाया जाता है। प्रसाद बनाते समय उसे बिना पूजा किए चखना या उसमें नमक का प्रयोग नहीं करना चाहिए। भोग पूरी तरह से सात्विक होना चाहिए। प्रसाद में 7 की संख्या का विशेष ध्यान रखा जाता है। पूजा के बाद सबसे पहले अपनी संतान को यह प्रसाद खिलाएं, उसके बाद ही स्वयं व्रत खोलें।
सूर्यास्त से पहले या गलत समय पर व्रत खोलना
संतान सप्तमी का व्रत काफी नियम और निष्ठा के साथ रखा जाता है। दोपहर की पूजा के तुरंत बाद या बिना कथा सुने अन्न-जल ग्रहण कर लेना। जब तक संतान सप्तमी की कथा पूर्ण न हो जाए और आरती न कर ली जाए, तब तक जल भी ग्रहण नहीं करना चाहिए। संध्या काल में भगवान शिव-पार्वती की आरती करने के बाद ही सात्विक प्रसाद से अपना व्रत खोलें।
पूजा के दौरान काले या गहरे रंगों के वस्त्र पहनना
सनातन धर्म में किसी भी शुभ या मांगलिक पूजा-अनुष्ठान में रंगों का विशेष ध्यान रखा जाता है। पूजा के समय काले, गहरे नीले या स्लेटी रंग के कपड़े पहनना अशुभ माना जाता है। संतान सप्तमी के पावन अवसर पर माताओं को लाल, पीले, नारंगी या हरे रंग के साफ-सुथरे वस्त्र ही धारण करने चाहिए। लाल और पीला रंग शुभता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।
मन में नकारात्मक विचार लाना या संतान पर क्रोध करना
व्रत केवल भूखे रहने का नाम नहीं है, बल्कि यह मन और विचारों की शुद्धि का भी पर्व है। जिस संतान के लिए आप व्रत रख रही हैं, उसी पर पूजा के दिन गुस्सा करना, उसे डांटना या मन में किसी के प्रति ईर्ष्या और कटुता लाना व्रत के फल को कम कर देता है। इस दिन अपने मन को शांत रखें। बच्चों को प्यार और आशीर्वाद दें। घर के माहौल को खुशनुमा बनाए रखें, क्योंकि घर में अशांति होने से पूजा का पुण्य प्राप्त नहीं होता।
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