Udham Singh Death Anniversary: आजादी के महायज्ञ में आहुति देने वाले शहीद ऊधम सिंह को नमन

Edited By Niyati Bhandari,Updated: 31 Jul, 2022 09:06 AM

udham singh death anniversary

महान शहीद ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसम्बर, 1899 को पंजाब के सुनाम कस्बे में माता नारायण देवी और पिता टहल सिंह के यहां हुआ।

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Freedom Fighter Udham Singh Death Anniversary: महान शहीद ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसम्बर, 1899 को पंजाब के सुनाम कस्बे में माता नारायण देवी और पिता टहल सिंह के यहां हुआ। 7 वर्ष की आयु में मां-बाप का साया सिर से उठने के बाद जवानी तक का सफर अमृतसर के यतीमखाने में बीता। यहीं शिक्षा के साथ-साथ मैकेनिक का काम सीखा। 

उन दिनों देश में जारी स्वतंत्रता आंदोलन को दबाने के लिए अंग्रेज जम कर अत्याचार कर रहे थे। क्रांतिकारी नेताओं डा. सत्यपाल मलिक और डा. सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी के विरोध में 13 अप्रैल, 1919 को बैसाखी वाले दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक जनसभा बुलाई गई थी। पंजाब के लैफ्टिनैंट गवर्नर माईकल उडवायर ने किसी भी विरोध को बुरी तरह कुचलने के आदेश दिए थे। जलियांवाला बाग में हथियारबंद सिपाहियों के साथ पहुंचे ब्रिगेडियर जनरल आर.ई.एच. डायर ने निहत्थे भारतीयों को चारों ओर से घेर कर गोलियों की बौछार करने का हुक्म दे दिया। वहां शहीद हुए हजारों भारतीयों के खून से जलियांवाला बाग की धरती लाल हो गई। 

यतीमखाने में रह रहे 19 वर्षीय ऊधम सिंह घायलों की मदद के लिए जलियांवाला बाग पहुंचे तो वह दृश्य देखकर उन्होंने शपथ ली कि इसके लिए जिम्मेदार डायर और माईकल उडवायर को मौत की सजा देने तक चैन से नहीं बैठेगा।

शपथ पूरी करने के लिए उन्होंने यतीमखाना छोड़ कर डा. किचलू को अपनी इच्छा से अवगत करवाया। क्रांतिकारियों के सहयोग से 1921 में वह नैरोबी चले गए और वहां से रूस पहुंच गए। रूस से भारत लौट कर क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेना शुरू कर दिया। इसी दौरान इंकलाबी पार्टी द्वारा अंग्रेज पुलिस इंस्पैक्टर सांडर्स की हत्या के बाद हुई धरपकड़ में इन्हें 4 रिवाल्वरों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया और 4 साल की सजा हुई।

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1931 में रिहाई के बाद सुनाम चले गए और 3 वर्ष वहां रहने के बाद अमृतसर आकर राम मोहम्मद सिंह आजाद के नाम से पेंटर की दुकान खोल ली। फिर काम छोड़ कर प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए लंदन जाकर प्रयास शुरू कर दिए।

12 मार्च, 1940 को इन्हें समाचारपत्रों से पता चला कि अगले दिन यानी 13 मार्च को रॉयल एशियन सोसाइटी के सहयोग से कैकस्टन हाल में अफगानिस्तान पर चर्चा के लिए होने वाली जनसभा में माईकल उडवायर भाग लेने वाला है। 

अगली सुबह वह अपने रिवाल्वर के साथ पूरी तैयारी से कैकस्टन हाल पहुंच गए। माईकल उडवायर द्वारा अपने कार्यकाल में भारतीयों पर किए अत्याचारों की तकरीर समाप्त होते ही पंजाब के इस शेर के सब्र का पैमाना भर गया और बदले की आग में जल रहे ऊधम सिंह ने अपनी रिवाल्वर की गोलियों की बौछार से जालिम उडवायर को वहीं ढेर कर जलियांवाला बाग के नरसंहार का बदला ले लिया।

पकड़े जाने के बाद 4 जून को अदालत में भारत के इस शेर ने ब्यान दिया कि माईकल उडवायर को मार कर उसे कोई अफसोस नहीं है बल्कि उसकी प्रतिज्ञा पूरी हुई और एक अत्याचारी का अंत हुआ। बौखला कर उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई और 31 जुलाई, 1940 को पैंटन विले जेल में इस शेर ने आजादी के लिए शुरू हुए महायज्ञ में अपने प्राणों की सर्वोच्च आहुति डाल दी। 

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