Edited By Niyati Bhandari,Updated: 09 Jun, 2026 01:52 PM

Veerabhadra katha: जानें शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव के रौद्र अवतार वीरभद्र की उत्पत्ति कैसे हुई। सती के आत्मदाह और दक्ष के यज्ञ विध्वंस की पूरी पौराणिक कथा।
Veerabhadra katha: हिंदू धर्म शास्त्रों और विशेषकर शिव पुराण में भगवान शिव के कई रूपों का वर्णन मिलता है, लेकिन उनका 'वीरभद्र' अवतार उनके सबसे भयंकर और शक्तिशाली रौद्र रूपों में से एक माना जाता है। यह अवतार न केवल महादेव के असीम क्रोध का प्रतीक है, बल्कि यह अन्याय और अहंकार के विनाश की एक जीवंत गाथा भी है।

शिव पुराण के मतानुसार ब्रह्मा के मानस पुत्र प्रजापति दक्ष कश्मीर घाटी के हिमालय क्षेत्र में रहते थे। उनकी पुत्री सती ने अपने पिता की इच्छा के विरूद्ध भगवान शंकर से विवाह किया था। माता सती और भगवान शंकर के विवाह उपरांत राजा दक्ष ने एक विराट यज्ञ का आयोजन किया लेकिन उन्होंने अपने दामाद और पुत्री को यज्ञ में निमंत्रण नहीं भेजा।
फिर भी सती अपने पिता के यज्ञ में पहुंच गई। लेकिन दक्ष ने पुत्री के आने पर उपेक्षा का भाव प्रकट किया और शिव के विषय में सती के सामने ही अपमानजनक बातें कही। सती के लिए अपने पति के विषय में अपमानजनक बातें सुनना हृदय विदारक और घोर अपमानजनक था। यह सब वह बर्दाश्त नहीं कर पाई और इस अपमान को सहन न कर पाई उन्होंने वहीं यज्ञ कुंड में कूद कर अपने प्राण त्याग दिए।
जब भगवान शिव को माता सती के प्राण त्यागने का ज्ञात हुआ तो उनका तीसरा नेत्र खुल गया और वे क्रोध से भर उठे। शिव ने अपनी एक बिजली जैसी चमकती जटा उखाड़कर बड़े वेग से पृथ्वी पर पटकी। उस जटा के टकराते ही वह दो भागों में विभाजित हो गई।

वीरभद्र: जटा के मुख्य भाग से एक अत्यंत विशाल और भयानक योद्धा प्रकट हुआ, जिसकी हजार भुजाएं थीं और जो साक्षात काल के समान प्रतीत हो रहा था। वह त्रिशूल और तलवार जैसे घातक शस्त्रों से सुसज्जित था।
भद्रकाली: जटा के दूसरे हिस्से से महाविनाश की देवी भद्रकाली का प्राकट्य हुआ।
भगवान शिव के आदेश पर वीरभद्र और भद्रकाली ने अपनी शिवगणों की सेना के साथ दक्ष के यज्ञ मंडप पर हमला कर दिया। वीरभद्र की शक्ति इतनी प्रचंड थी कि उन्होंने भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र के वेग को भी रोक दिया था। अंततः वीरभद्र ने प्रजापति दक्ष का सिर काटकर उसी यज्ञ कुंड की अग्नि में डाल दिया, जिसमें माता सती ने प्राण त्यागे थे।
जब ब्रह्मा जी ने भगवान शिव से प्रार्थना की तो दयालु शिव का क्रोध शांत हुआ। उन्होंने दक्ष को पुनर्जीवित किया लेकिन उनके धड़ पर बकरे का सिर लगाकर उन्हें जीवनदान दिया, जिससे उनका अहंकार सदा के लिए समाप्त हो गया।
भगवान शिव ने दुखी होकर सती के शरीर को अपने कंधों पर धारण कर तांडव नृत्य करने लगे। पृथ्वी समेत तीनों लोकों को व्याकुल देख कर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र द्वारा माता सती के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए।
देवी सती के शरीर के अंग और धारण किए हुए आभूषण जहां-जहां गिरे वहां-वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई। देवी भागवत में 108 शक्तिपीठों का वर्णन आता है, तो देवी गीता में 72 शक्तिपीठों का, देवी पुराण में 51 शक्तिपीठों की चर्चा की गई है। वर्तमान में भी 51 शक्तिपीठ ही पाए जाते हैं। कुछ शक्तिपीठ पाकिस्तान, बांगलादेश और श्रीलंका में भी स्थित हैं।
