Edited By Prachi Sharma,Updated: 01 Apr, 2026 10:25 AM
World Health Day 2026 : “मैं लगातार 24 घंटे पबजी खेलता रहता था। मैंने कॉलेज छोड़ दिया था और पांच मिनट भी शांत नहीं बैठ पाता था,” 25 वर्षीय चेन्ना रेड्डी बताते हैं, जो आज दिन में सौर ऊर्जा तकनीशियन के रूप में कार्य करते हुए योग भी सिखाते हैं। तो...
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World Health Day 2026 : “मैं लगातार 24 घंटे पबजी खेलता रहता था। मैंने कॉलेज छोड़ दिया था और पांच मिनट भी शांत नहीं बैठ पाता था,” 25 वर्षीय चेन्ना रेड्डी बताते हैं, जो आज दिन में सौर ऊर्जा तकनीशियन के रूप में कार्य करते हुए योग भी सिखाते हैं। तो आखिर क्या था जिसने रेड्डी के जीवन में यह परिवर्तन संभव किया ?
स्टैनफोर्ड लाइफस्टाइल मेडिसिन के शोध के अनुसार, प्रतिदिन दो घंटे से अधिक का मनोरंजनात्मक स्क्रीन समय 18 से 25 वर्ष के वयस्कों में मस्तिष्क की बाह्य परत (सेरेब्रल कॉर्टेक्स) के पतले होने का कारण बनता है। यही वह भाग है जो निर्णय-निर्माण, स्मृति और समस्या-समाधान के लिए उत्तरदायी है।
जो वयस्क प्रतिदिन पांच या उससे अधिक घंटे स्क्रीन के सामने बिताते हैं, उनमें डिमेंशिया, स्ट्रोक और पार्किंसन रोग का जोखिम कहीं अधिक बढ़ जाता है। स्मार्टफोन की लत मस्तिष्क के ग्रे मैटर की मात्रा को भी घटाती है। यह वही ऊतक है, जो हमारे शरीर की गतिविधियों से लेकर भावनाओं तक का संचालन करता है। इसके अतिरिक्त, स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी मेलाटोनिन के स्राव को दबा देती है, जिससे शरीर का प्राकृतिक निद्रा-चक्र भीतर से ही बाधित हो जाता है।
मानसिक स्वास्थ्य पर इसका प्रभाव भी उतना ही गंभीर है, जितना अधिक समय हम स्क्रीन से चिपके रहते हैं; चिंता, अवसाद और सामाजिक अलगाव धीरे-धीरे बढ़ने लगते हैं। डॉ. मणिकांतन के शब्दों में, “अब समय आ गया है कि हम एक कदम पीछे हटकर अपने स्क्रीन उपयोग का ईमानदारी से पुनर्मूल्यांकन करें।”
आयुर्वेदाचार्य के सुझाव: स्क्रीन की लत से मुक्ति का मार्ग
जो लोग अपने भीतर इस प्रकार की स्क्रीन-निर्भरता को पहचानते हैं, उनके लिए डॉ. मणिकांतन कुछ व्यावहारिक और संतुलित उपाय प्रस्तुत करती हैं
घर में स्क्रीन-मुक्त क्षेत्र निर्धारित करें।
भोजन-स्थल और शयनकक्ष को स्क्रीन-मुक्त क्षेत्र बनाएं। यह सीमाएं आपके तंत्रिका तंत्र को बिना उपकरण के वर्तमान में रहने का अभ्यास कराती हैं और धीरे-धीरे इस आदत को नियंत्रित करती हैं।
स्क्रीन उपयोग का समय पूर्व-नियोजित करें-
मोबाइल या लैपटॉप का उपयोग कब करना है, यह पहले से तय करें। इससे आप आदत के वशीभूत होने के बजाय स्वयं नियंत्रण में रहते हैं।उपयोग पर निगरानी रखने वाले ऐप का सहारा लें। आजकल अधिकांश स्मार्टफोनों में ऐसे फीचर होते हैं जो आपके स्क्रीन समय का सटीक विवरण देते हैं। इस सच का सामना करना ही परिवर्तन की दिशा में पहला कदम बन सकता है।
श्वास की शक्ति: उत्तेजना के स्थान पर जीवन-ऊर्जा का संचार
चेन्ना रेड्डी की कहानी उन युवाओं के लिए आशा की किरण है, जो स्क्रीन की लत के चक्र में फंसे हैं। 24 घंटे तक गेम खेलने, पढ़ाई छोड़ देने और छोटी-छोटी बातों पर क्रोध से भर जाने के बाद, जनवरी 2023 में उन्होंने आर्ट ऑफ लिविंग के यूथ लीडरशिप ट्रेनिंग प्रोग्राम में भाग लिया।
वहां उन्होंने एक विशेष श्वास तकनीक, सुदर्शन क्रिया (SKY)सीखी, जिसे वैश्विक आध्यात्मिक गुरु गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर ने प्रकट किया है। यह लयबद्ध श्वसन अभ्यास कोशिकीय स्तर पर तनाव को दूर करता है और मन में संचित गहरे संस्कारों को शुद्ध करता है।
कुछ ही दिनों में रेड्डी का क्रोध समाप्त हो गया, स्क्रीन की चाह स्वतः घटने लगी और उनके मन में एक गहरी स्थिरता का अनुभव हुआ। उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की, योग प्रशिक्षक बने और सौर ऊर्जा के क्षेत्र में व्यवसाय स्थापित किया।
अत्यधिक स्क्रीन उपयोग प्रायः तनाव और चिंता से बचने का एक माध्यम होता है। सुदर्शन क्रिया स्वायत्त तंत्रिका तंत्र को संतुलित कर मन को शांत आधार प्रदान करती है। यह डोपामिन-आधारित इच्छाओं को नियंत्रित करने में भी सहायक है। चूंकि स्क्रीन लत एक प्रकार की व्यवहारिक लत है, यह तकनीक समान तंत्रिका मार्गों पर कार्य करते हुए अन्य व्यसनों को भी कम करने में सहायक सिद्ध होती है।
आयुर्वेदिक उपाय
आयुर्वेद में नस्य की प्रक्रिया, अर्थात् नासिका में औषधीय तेल का प्रयो, मानसिक स्पष्टता बढ़ाने और अति-उत्तेजना को कम करने में सहायक मानी गई है। प्रातःकाल कुछ बूंद अनु तैल का प्रयोग मस्तिष्क को पोषण देता है और डिजिटल थकान को कम करता है।
मेध्य रसायन जैसे ब्राह्मी, अश्वगंधा और शंखपुष्पी, एकाग्रता बढ़ाने, तनाव कम करने और मानसिक चंचलता को शांत करने में सहायक होते हैं। इनका सेवन आयुर्वेदाचार्य के परामर्श से ही करना चाहिए।
आंतरिक संतुलन की ओर छोटे कदम
प्रतिदिन प्रातः केवल पंद्रह मिनट का ध्यान प्रारंभ करें। यह अल्प अभ्यास भी जागरूकता को विकसित करता है, जिससे फोन उठाने की प्रवृत्ति और उसके क्रियान्वयन के बीच एक विराम उत्पन्न होता है और यही विराम स्वतंत्रता का द्वार खोलता है।
स्क्रीन के स्थान पर सृजनात्मक गतिविधियों को अपनाएं, पठन, संगीत, चित्रकला, भ्रमण या सार्थक संवाद। ये गतिविधियां मस्तिष्क को वास्तविक संतोष प्रदान करती हैं और धीरे-धीरे कृत्रिम उत्तेजना की आवश्यकता को समाप्त करती हैं।
अंत में, डॉ. मणिकांतन का सरल संदेश—“छोटे कदमों से प्रारंभ करें और निरंतरता बनाए रखें।”
लेखिका एवं चिकित्सकीय समीक्षा: डॉ. निशा मणिकांतन, बी.ए.एम.एस, एम.डी (ए.एम)