Aakhri Sawal Review: विचारधारा और संवाद पर बनी एक साहसिक और सोचने पर मजबूर करने वाली फिल्म

Edited By Updated: 15 May, 2026 02:53 PM

aakhri sawal review in hindi

यहां पढ़ें कैसी है फिल्म आखिरी सवाल...

फिल्म - आखिरी सवाल (Aakhri Sawal)
स्टारकास्ट- संजय दत्त (Sanjay Dutt) , नमाशी चक्रवर्ती (Namashi Chakraborty) , अमित साध (Amit Sadh) , समीरा रेड्डी(Sameera Reddy) , नीतू चंद्रा (Neetu Chandra) , त्रिधा चौधरी(Tridha Choudhary) और मृणाल कुलकर्णी (Mrinal Kulkarni)
डायरेक्टर- अभिजीत मोहन वारंग (Abhijeet Mohan Warang)
रेटिंग - 3*

Aakhri Sawal: संजय दत्त स्टारर फिल्म आखिरी सवाल 15 मई को सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। फिल्म में आपको राजनीतिक गलियारों से लेकर यूनिवर्सिटी कैंपस तक के मुद्दों पर बहस होती दिखेगी। यह फिल्म ‘आखिरी सवाल’  उन्हीं विचारों और विवादों को केंद्र में रखकर एक साहसिक कहानी पेश करने की कोशिश करती है। यह फिल्म भारतीय समाज में विचारधारा, इतिहास और संस्थाओं को लेकर चल रही बहसों को एक ड्रामेटिक रूप में दिखाती है। फिल्म का फोकस इस बात पर है कि क्या समाज में “संवाद”  ज्यादा जरूरी है या “विवाद”  और इसी विचार के इर्द-गिर्द पूरी कहानी बुनी गई है।

कहानी
फिल्म की शुरुआत प्रोफेसर गोपाल नाडकर्णी (संजय दत्त) और उनके छात्र विक्की हेगड़े (नमाशी चक्रवर्ती) के बीच तीखे टकराव से होती है। विक्की अपने शोध में एक संस्था (संघ) को लेकर गंभीर आरोप लगाता है जिसे प्रोफेसर खारिज कर देते हैं। इसी बात पर दोनों के बीच तनाव बढ़ता है और कैंपस में विरोध शुरू हो जाता है। कहानी तब मोड़ लेती है जब विक्की प्रोफेसर से पांच बड़े सवाल पूछने की चुनौती देता है। ये सवाल महात्मा गांधी की हत्या, बाबरी विध्वंस और संगठन से जुड़े ऐतिहासिक मुद्दों तक जाते हैं। शुरुआती सवाल कॉलेज कैंपस में और बाकी सवाल एक टीवी डिबेट में पूछे जाते हैं। इन जवाबों के जरिए कहानी इतिहास के कई संवेदनशील पहलुओं को छूती है और दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है। हालांकि कई जगह कहानी डॉक्यूमेंट्री जैसी लगने लगती है और गहराई की कमी महसूस होती है।

एक्टिंग
अभिनय की बात करें तो संजय दत्त प्रोफेसर गोपाल नाडकर्णी के किरदार में प्रभावशाली शुरुआत करते हैं और एक बार फिर प्रूफ करते हैं कि वह एक मंझे हुए कलाकार हैं। दूसरी तरफ नमाशी चक्रवर्ती अपने छात्र विक्की के किरदार में संतुलित और प्रभावी नजर आते हैं। अमित साध और नीतू चंद्रा अपने छोटे लेकिन अहम किरदारों में ठीक-ठाक प्रभाव छोड़ते हैं। वहीं समीरा रेड्डी अपने नेगेटिव शेड वाले किरदार को मजबूती से निभाती हैं और स्क्रीन पर अलग छाप छोड़ती हैं।

डायरेक्शन
निर्देशक अभिजीत मोहन वारंग ने फिल्म में राजनीतिक और वैचारिक टकराव को केंद्र में रखने की कोशिश की है। फिल्म का उद्देश्य समाज में विचारों की टकराहट और संवाद की अहमियत को दिखाना है। लेकिन कई जगह कहानी जरूरत से ज्यादा नाटकीय हो जाती है और संतुलन खो देती है। फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसके उठाए गए सवाल हैं, जो दर्शकों को सोचने पर मजबूर करते हैं, लेकिन कमजोर लेखन और सतही प्रस्तुति इसकी गहराई को कम कर देती है। कुल मिलाकर, यह फिल्म एक साहसिक प्रयास जरूर है, लेकिन पूरी तरह प्रभावशाली अनुभव नहीं बन पाती।

 

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