Edited By Manisha,Updated: 02 Jan, 2026 01:48 PM
‘आज़ाद भारत’ के बारे में प्रोड्यूसर, डायरेक्टर, राइटर, एक्ट्रेस रूपा अय्यर और एक्ट्रेस इंदिरा तिवारी ने पंजाब केसरी, नवोदय टाइम्स, जगबाणी और हिंद समाचार से खास बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश...
नई दिल्ली/टीम डिजिटल। बॉलीवुड अभिनेता श्रेयस तलपड़े स्टारर फिल्म ‘आज़ाद भारत’ सिनेमाघरों में रिलीज़ हो चुकी है। इस फिल्म को रूपा अय्यर ने प्रोड्यूस, डायरेक्ट और राइट करने के साथ-साथ इसमें अहम भूमिका भी निभाई है। फिल्म आज़ाद हिंद फ़ौज की जांबाज़ महिला योद्धा नीरा आर्य के जीवन और शौर्य पर आधारित है जो रानी झांसी रेजिमेंट की सिपाही थीं और अपनी बहादुरी, समझदारी व निडरता के चलते देश की पहली महिला जासूस के रूप में जानी जाती हैं। श्रेयस तलपड़े फिल्म में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की भूमिका निभाते नजर आएंगे, वहीं सुरेश ओबेरॉय क्रांतिकारी छाजू रामजी के किरदार में दिखाई देंगे। खास बात यह है कि रूपा अय्यर खुद नीरा आर्य की भूमिका निभा रही हैं। फिल्म ‘आज़ाद भारत’ 2 जनवरी 2026 को विश्वभर के सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई। इस फिल्म के बारे में प्रोड्यूसर, डायरेक्टर, राइटर, एक्ट्रेस रूपा अय्यर और एक्ट्रेस इंदिरा तिवारी ने पंजाब केसरी, नवोदय टाइम्स, जगबाणी और हिंद समाचार से खास बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश...
रूपा अय्यर
सवाल: नीरा आर्य जैसी महिला योद्धा की कहानी को फिल्म में लाने का विचार कहां से आया?
जवाब : इस कहानी की शुरुआत कोविड के समय हुई। लॉकडाउन के दौरान ऑनलाइन रिसर्च करते हुए मुझे नीरा आर्य के बारे में जानकारी मिली। धीरे-धीरे मैंने आज़ाद हिंद फ़ौज, रानी झांसी रेजिमेंट और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की महिलाओं के प्रति सोच पर गहराई से पढ़ना शुरू किया। मैं दिल्ली जाकर INA वेटरन्स से मिली, अंडमान-निकोबार की सेल्युलर जेल से जुड़ी जानकारी जुटाई और नेताजी की परपोती राजश्री चौधरी जी से भी मुलाकात की। जैसे-जैसे रिसर्च बढ़ती गई, मुझे लगा कि यह कहानी सिर्फ इतिहास नहीं बल्कि हमारी जिम्मेदारी है इसे सामने लाना।
सवाल: नेताजी द्वारा महिलाओं को ‘रानी’ कहकर संबोधित करना आपको क्यों खास लगा?
जवाब : नेताजी महिलाओं को ‘रानी’ कहकर पुकारते थे। शायद हम में से कई को अपने घर में भी इस तरह नहीं बुलाया गया होगा। उन्होंने रानी झांसी रेजिमेंट बनाकर महिलाओं को यह एहसास दिलाया कि वे किसी से कम नहीं हैं। यही सोच मुझे बहुत गहराई से छू गई और यहीं से यह फिल्म मेरे लिए एक मिशन बन गई।
सवाल: आपने इस फिल्म में प्रोड्यूसर, डायरेक्टर, राइटर और एक्टर चारों जिम्मेदारियां निभाईं। यह कितना मुश्किल था?
जवाब: यह बिल्कुल आसान नहीं था। लेकिन मुझे लगा कि अगर मैं खुद पूरी जिम्मेदारी नहीं लूंगी, तो यह फिल्म वैसी नहीं बन पाएगी जैसी बननी चाहिए। लेखन से लेकर डायरेक्शन तक, हर डायलॉग, हर सीन मैंने रिसर्च के आधार पर गढ़ा। यह केक-वॉक नहीं था, लेकिन यह ज़रूरी था।
सवाल: नेताजी सुभाष चंद्र बोस के किरदार के लिए श्रेयस तलपड़े को कास्ट करने का विचार कैसे आया?
जवाब: यह किसी चमत्कार से कम नहीं था। जब मैंने उनका लुक टेस्ट देखा बॉडी लैंग्वेज, आंखों की आग, संवाद अदायगी सब कुछ बिल्कुल नेताजी जैसा लगा। शूटिंग के दौरान NCC कैडेट्स हर डायलॉग पर तालियां बजाते थे। आज भी मैं उन्हें ‘मेरे नेताजी’ कहकर बुलाती हूं।
सवाल: नीरा आर्य के जीवन से आपको सबसे बड़ी सीख क्या मिली?
जवाब : नीरा आर्य से सिर्फ मुझे ही नहीं आने वाली जेनरेशन को भी सीखन को मिला। नीरा आर्य को जेल में डाला गया, यातनाएं दी गईं, लेकिन उन्होंने आत्मसमर्पण नहीं किया। फूल बेचकर सादगी से जीवन जिया लेकिन आत्मसम्मान कभी नहीं छोड़ा। उनके अंदर सेल्फ रिस्पेक्ट और देशभक्ति थी अगर ये दोनों हों तो इंसान कभी नहीं टूटता।
सवाल: ऑडियंस के लिए आपका मैसेज?
जवाब: जनवरी नेताजी की जयंती का महीना है। यह सही समय है उन्हें, INA को और नीरा आर्य को श्रद्धांजलि देने का।
मैं सभी से विनम्र निवेदन करती हूं कि परिवार के साथ थिएटर में जाकर ‘आज़ाद भारत’ देखें। यह फिल्म OTT से ज्यादा बड़े पर्दे पर देखने योग्य है क्योंकि नेताजी हमेशा लार्जर दैन लाइफ थे।
इंदिरा तिवारी
सवाल: आप एनएसडी गई उसके बाद आपने इंडस्ट्री में कदम रखा तो क्या अब आपको लगता है कि बिना एनएसडी के भी आप आ सकती थी?
जवाब: मैंने थिएटर 2001 से शुरू किया था और एनएसडी मैंने सिर्फ 3 साल किया। 2001 से 2025 आ गया तो मैं आज भी कई रोल्स करती हूं। एनएसडी में जाने से पहले मैं सिखती थी और जब से एनएसडी में सिलेक्शन हुआ तो ऐसा लगा कि जैसे इंडियन क्रिकेट टीम में सिलेक्शन हो गया हो। जिसके बाद आपको भागना नहीं पड़ता और वो जद्दोजेहद कम हो गई है। मैंने सोचा नहीं था कि मैं एक्टर बनूंगी पर मेरी टिचर्स ने बताया कि आप करो और आप अच्छा कर सकती हो।
सवाल: जब आपको नीरा आर्य और सरस्वती राजमणि की कहानी बताई गई, तो आपका पहला रिएक्शन क्या था?
जवाब : ईमानदारी से कहूं तो मुझे बहुत कम जानकारी थी। स्कूल-कॉलेज में हमें गांधी जी, नेहरू जी या रानी लक्ष्मीबाई के बारे में पढ़ाया गया लेकिन ऐसी कई महिलाएं थीं जिनका ज़िक्र ही नहीं हुआ। जब मैंने नीरा आर्य और सरस्वती राजमणि के बारे में पढ़ा तो अंदर से हिल गई। यह सिर्फ बायोपिक नहीं लगी, बल्कि देश के लिए एक योगदान जैसा महसूस हुआ। इसलिए मैं इस फिल्म के लिए मना ही नहीं कर पाई क्योंकि यह सिर्फ एक फिल्म नहीं बल्कि एक इमोशन है।
सवाल: सरस्वती राजमणि के किरदार ने आपको भावनात्मक रूप से कैसे प्रभावित किया?
जवाब: यह किरदार बेहद गहरा है। यह सिर्फ एक भूमिका नहीं थी, बल्कि एक आत्मिक यात्रा थी। शूटिंग के दौरान कई बार मैं रो पड़ी। मिट्टी, पसीना, दर्द सब कुछ असली था। यह समझ आ गया कि यह फिल्म सिर्फ परफॉर्मेंस नहीं, बल्कि बलिदान की भावना को जीना है।