इमोशमल थ्रिलर है पुणे हाईवे, जो दोस्ती की असली परख दिखाती है

Updated: 11 May, 2025 04:10 PM

exclusive interview of pune highway with punjab kesari

फिल्म पुणे हाईवे के बारे में डायरेक्टर्स बग्स भार्गव कृष्णा, राहुल डाकुन्हा और स्टारकास्ट ने पंजाब केसरी, नवोदय टाइम्स, जगबाणी, और हिंद समाचार से खास बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश:

नई दिल्ली/ टीम डिजिटल। पुणे हाईवे एक आगामी थ्रिलर ड्रामा फिल्म है, जिसका निर्देशन बग्स भार्गव कृष्णा और राहुल डाकुन्हा ने किया है। इस फिल्म में अमित साध, जिम सर्भ,मंजरी फडनिस, केतकी नारायण और अनुवब पाल प्रमुख भूमिकाओं में नजर आएंगे। फिल्म की कहानी तीन बचपन के दोस्तों की है, जो मुंबई की एक ही इमारत में साथ बड़े हुए हैं। जब ये दोस्त पुणे से करीब 200 किलोमीटर दूर एक झील में मिले एक रहस्यमय शव की खबर से हिल जाते हैं, तो उनकी दोस्ती एक मुश्किल दौर से गुजरती है। इस फिल्म के बारे में डायरेक्टर्स बग्स भार्गव कृष्णा, राहुल डाकुन्हा और एक्टर्स अमित साध, जिम सर्भ, मंजरी फडनिस, केतकी नारायण ने पंजाब केसरी, नवोदय टाइम्स, जगबाणी, और हिंद समाचार से खास बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश:

राहुल डा कुन्हा 

सवाल- फिल्म का ट्रेलर काफी अच्छा है इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?

जवाब- धन्यवाद, हम बहुत खुश हैं कि आपको ट्रेलर पसंद आया। ट्रेलर एक ऐसा माध्यम है जो दर्शक को बस इतना ही दिखाए कि वो उत्सुक हो जाएं। ज़्यादातर ट्रेलर आजकल पूरी कहानी ही बयां कर देते हैं। हमने सोचा कि दर्शकों को सिर्फ इतना दिखाएं कि उन्हें फिल्म देखने की उत्सुकता हो। शानदार साउंडट्रैक, खूबसूरत विज़ुअल्स और बस एक झलक। पूरी कहानी नहीं, बस एक टीजर।

सवाल- क्या आपको लगता है कि ओटीटी और सिनेमाघर के लिए अलग-अलग ट्रेलर होने चाहिए?

जवाब: जी हां। सिनेमाघर में दर्शक अकेले होते हैं, भले ही वो परिवार के साथ आए हों। लेकिन जब आप फ़ोन पर देख रहे होते हैं, आप व्यस्त होते हैं, ध्यान बंटता है। सिनेमाघर में वो फोकस मिलता है, जो ओटीटी पर नहीं मिलता। ये फिल्म बड़े पर्दे पर देखनी चाहिए। इसमें विज़ुअल अपील है, सिनेमैटिक स्केल है। यह वो फिल्म है जिसे देखकर आप सोचते हैं – “वाह, ये फिल्म है।”

सवाल- ये फिल्म पुणे हाईवे दर्शकों को क्यों देखनी चाहिए?

जवाब: दर्शको को यह फिल्म पुणे हाईवे इसलिए देखनी चाहिए क्योंकि इसमें सब कुछ है – डार्कनेस, लाइटनेस, दोस्ती, मर्डर मिस्ट्री। यह एक “two-time watch” है। इसे देख कर आप डिनर पर चर्चा करेंगे। यह फिल्म आपको आखिर तक सस्पेंस में रखेगी और अपनी सीट से बांधे रहेगी। मैं चाहूंगा कि यंग ऑडियंस इसे आकर देखे और यह जरूरी भी है ताकि वह जाने कि हमारी सिनेमा में क्या चल रहा है। 

बग्स भार्गव कृष्णा

सवाल: फिल्म पुणे हाईवे का जॉनर थोड़ा डार्क है तो आपने इसे अपनी पहली फिल्म के लिए क्यों चुना?

जवाब- हम इंसान की डार्क साइड को एक्सप्लोर कर रहे हैं। हर किसी में अच्छाई और बुराई दोनों होती हैं। दोस्ती की कहानी है, लेकिन एक मर्डर मिस्ट्री के साथ। जब संकट आता है, तब असली रिश्ते सामने आते हैं। क्योंकि हम सबकी  जिंदगी कभी न कभी कुछ अचानक हो जाता है और तब पता है चलता है कि कौन आपका सच्चा दोस्त है। 

सवाल: कास्टिंग प्रोसेस कैसा था? क्या सारे एक्टर्स पहली पसंद थे?   

जवाब-  हर कोई हमारी पहली पसंद थी। मेरे ख्याल से अमित ने बग्स के साथ पहले काम किया था लेकिन मैं अमित को पहले से नहीं जानता था लेकिन मैं उसके फिल्म के किरदार को जानता था और मुझे यह एहसास हो चुका था कि वो अपने किरदार को अच्छे से निभा लेंगे। जिम तो जिम है क्योंकि उसके पास कोई ट्रेनर नहीं था। उसके किरदार विष्णू के बारे में मैंने सबसे पहले लिखा था। मैंने जब उनके आगे कहानी नरेट की तो दोनों तैयार हो गए। 

सवाल-  आप लोग हिंदी कंटेंट को कैसे देखते है जो आजकल आ रहा है?

जवाब- कुछ तो बहुत अच्छे होते हैं तो कुछ ऐसे होते हैं कि वह उसके साथ समझौता करते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि उस कलाकार की जो मंशा है वो किसी को नहीं जाननी चाहिए क्योंकि अगर आप जान जाओगे तो स्टोरी के बारे में पता ही लग जाएगा और लोग बीच में आकर आपको कहेंगे कि आप इस सीन में इसे मार दो या कुछ और तो आपके सीन में आपके अलावा और भी लोग इन्वॉल्व हो जाएंगे। हम दोनों प्ले की कहानी जानते थे लेकिन कभी इंटरफेयर नहीं किया क्योंकि हमें पता है कि अगर वो अपने मन से लिख रहे हैं तो अच्छा ही लिखेंगे।

जिम सर्भ

सवाल- ट्रेलर देखकर लगा कि फिल्म में दोस्ती, अतीत से जुड़ी समस्याएं और संघर्ष है। क्या यही फिल्म की कहानी है?

जवाब: फिल्म एक करीबी दोस्तों के ग्रुप पर है, जो एक ही बिल्डिंग में बड़े हुए हैं। जैसे पारसी बाग या कोई ऐसा मोहल्ला जहां लोग एक-दूसरे को रोज मिलते हैं। इन रिश्तों में एक अलग तरह की गहराई होती है। फिर इस ग्रुप में एक घटना होती है, जो उनके रिश्तों में दरार लाती है। यही फिल्म की मुख्य पृष्ठभूमि है—“संबंधों की परीक्षा”।

सवाल- फिल्म पुणे हाईवे से आपने क्या सीखा ?

जवाब: मैं आमतौर पर सीन में इमोशन्स को दबाने की कोशिश करता हूं, खासकर जहां रोना हो। लेकिन इस फिल्म में एक ऐसा सीन था जहां भावना फूट पड़ीं और मैंने उस पल को पूरी तरह जिया। ये मेरे लिए नया अनुभव था।

मंजरी फडनिस

सवाल: हर प्रोजेक्ट अभिनेता को कुछ सिखाता है। इस फिल्म ने क्या सिखाया?

जवाब: मैं असल ज़िंदगी में बहुत शांत स्वभाव की हूं, लेकिन फिल्म में एक सीन में मुझे गुस्सा दिखाना था। मैंने उस इमोशन को महसूस किया और ज़ोरदार सीन दिया। असल में मजा आया। 

सवाल- आपके हिसाब से कौन सा समय ज्यादा बेहतर है ? क्या आप उस समय को याद करते हो?

जवाब - मैं सच बताऊं तो मुझे आज का समय ज्यादा बेहतर लगता है क्योंकि उस समय के मुकाबले मेरे पास आज अच्छा और काफी काम है। उस समय मैं करियर की शुरुआत कर रही थी, और कुछ नहीं जानती थी—ना मेकअप, ना ड्रेसिंग। लेकिन अब मुझे अपनी पहचान मिल चुकी है और मैं ज़्यादा सहज महसूस करती हूं।

अमित साध

सवाल: शुरुआती 2000 के दौर और आज के इंडस्ट्री कल्चर में क्या बदलाव महसूस होते हैं?

जवाब: मैं बहुत लकी था कि मुझे टीवी पर रोल मिला जिसकी वजह से इतना सम्मान मिला। मैं इसलिए भी लकी हूं कि मुझे एक्टिंग का ए भी नहीं पता था लेकिन एक अहम रोल के  हिस्से से मुझे इज्जत मिल रही थी। उसके बाद मैंने फिल्मों में काम किया। मैंने जब पहली फिल्म की थी तो उस समय कोई वैनिटी नहीं थी, सब एक जैसे ट्रीट किए जाते थे। मैंने हमेशा यही कोशिश की कि चाहे कोई जूनियर हो या सीनियर, सबको इज्ज़त मिले, खाना मिले और सम्मान मिले।

सवाल-: फिल्म इंडस्ट्री में दोस्ती एक बड़ा मुद्दा है। क्या यहां की दोस्ती सच्ची होती है?

जवाब: दोस्ती तभी मायने रखती है जब उसमें सच्चाई और एक-दूसरे के लिए खड़े होने की हिम्मत हो। “भाई-बहन” कहना आसान है, निभाना मुश्किल। लेकिन इस फिल्म में माहौल बहुत अच्छा था। सबने एक-दूसरे की इज़्ज़त की, ओपन कम्युनिकेशन था, कोई बैकबाइटिंग नहीं। ये एक दुर्लभ अनुभव था।

केतकी नारायण

सवाल- साउथ की फिल्मों को लेकर तारीफें होती हैं, लेकिन वहां की क्या चुनौतियां  हैं?

जवाब: मैंने मलयालम फिल्मों में काम किया है। वहां महिलाएं बहुत मजबूत किरदार निभाती हैं। इंडस्ट्री में महिलाओं के लिए Internal Complaints Committee और Women in Cinema Collective जैसे समूह बने हैं। इससे महिलाएं सुरक्षित महसूस करती हैं और खुलकर बोल पा रही हैं। यह एक बहुत बड़ा बदलाव है जो मलयालम इंडस्ट्री में हुआ है।    यह बदलाव पूरे देश में फैलना चाहिए।

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