Edited By Tanuja,Updated: 01 Nov, 2026 06:12 PM

बांग्लादेश में अक्टूबर में भीड़ की पिटाई से कम से कम 15 लोगों की मौत हुई। द डेली स्टार ने सरकार पर दोषियों को सजा दिलाने में नाकामी का आरोप लगाया। सरकारी और स्वतंत्र संगठनों के आंकड़ों में बड़ा अंतर है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने तत्काल जांच और...
Dhaka: बांग्लादेश में भीड़ द्वारा कानून अपने हाथ में लेने की घटनाएं गंभीर चिंता का विषय बन गई हैं। 'द डेली स्टार' की एक टिप्पणी के मुताबिक, अक्टूबर में ही भीड़ की पिटाई से कम से कम 15 लोगों की मौत हुई। अखबार ने कहा कि सरकार लगातार दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का भरोसा दे रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर हिंसा रोकने में ये आश्वासन बेअसर साबित हो रहे हैं। अखबार ने इसे कानून के शासन के प्रति खतरनाक लापरवाही बताते हुए कहा कि जब लोगों को शक के आधार पर भीड़ घेरकर मारने लगे, तो यह व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
अपराधी होने के शक में दो चालकों को मार डाला
टिप्पणी में राजधानी ढाका की दो हालिया घटनाओं का भी जिक्र किया गया। पिछले महीने के अंत में जत्राबाड़ी इलाके में जॉनी और मोहम्मद निशात नाम के दो पिकअप चालकों को कथित तौर पर लूटपाट में शामिल होने के संदेह में भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। एक अन्य घटना में आलम शेख नाम के व्यक्ति की शहीद सुहरावर्दी अस्पताल परिसर में पिटाई से मौत हो गई। बताया गया कि वह काम की तलाश में ढाका आया था और उसे मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानी भी थी। उसे बच्चा चोर होने के संदेह में निशाना बनाया गया।
सरकारी और स्वतंत्र आंकड़ों में बड़ा अंतर
बांग्लादेश के गृह मंत्रालय की 20 अक्टूबर को जारी रिपोर्ट के अनुसार, इस साल जनवरी से सितंबर के बीच भीड़ की पिटाई की 63 घटनाओं में 40 लोगों की मौत हुई। पिछले साल इसी अवधि में 107 घटनाएं दर्ज की गई थीं, जिनमें 63 लोगों की जान गई थी। हालांकि, स्वतंत्र मानवाधिकार संगठनों के आंकड़े सरकारी दावों से कहीं अधिक हैं। 'ऐन ओ सालिश केंद्र' (ASK) ने इस साल के पहले नौ महीनों में भीड़ की पिटाई से 171 मौतें दर्ज कीं। वहीं, मानवाधिकार सहायता सोसायटी (HRSS) के अनुसार, इस अवधि में 398 घटनाओं में 187 लोगों की मौत हुई और 401 लोग घायल हुए। अखबार ने सरकारी और स्वतंत्र आंकड़ों के बीच इस बड़े अंतर पर सवाल उठाते हुए कहा कि इससे हिंसा की वास्तविक स्थिति के आकलन पर संदेह पैदा होता है।
गृह मंत्री ने दिया था सख्त कार्रवाई का भरोसा
अखबार के मुताबिक, बांग्लादेश के गृह मंत्री सलाहुद्दीन अहमद ने 1 सितंबर को भीड़ हिंसा के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का भरोसा दिया था। उन्होंने कहा था कि ऐसे मामलों में शामिल लोगों पर मुकदमा चलाने के लिए मौजूदा कानूनी प्रावधान पर्याप्त हैं। लेकिन 'द डेली स्टार' का कहना है कि दोषियों को न्याय के दायरे में लाने में सरकार की नाकामी ऐसी घटनाओं को बढ़ावा दे रही है। जब हमलावरों को सजा से बच निकलने का भरोसा होता है, तो भीड़ हिंसा का सिलसिला और मजबूत होता जाता है।
ढाका विश्वविद्यालय में छात्र की हत्या का मामला भी अधूरा
अखबार ने सितंबर 2024 में ढाका विश्वविद्यालय के फजलुल हक मुस्लिम हॉल में तोफज्जल हुसैन की हत्या का भी उल्लेख किया। चोरी के शक में उसे पीट-पीटकर मार डाला गया था। इस मामले में 22 आरोपियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हुए, लेकिन अब तक केवल छह लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इसी तरह, सितंबर 2024 में जहांगीरनगर विश्वविद्यालय में छात्र लीग के पूर्व नेता शमीम अहमद उर्फ शमीम मोल्ला की हत्या का मामला भी जांच की धीमी रफ्तार का उदाहरण बताया गया है। इस मामले में अब तक जांच रिपोर्ट दाखिल नहीं की गई है।
मानवाधिकार संगठनों ने जताई चिंता
'द डेली स्टार' ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में देरी और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई न होने से लोगों का न्याय व्यवस्था पर भरोसा कमजोर हो रहा है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के मुताबिक, सामाजिक और राजनीतिक आधार पर हिंसा को सही ठहराने की प्रवृत्ति भी ऐसी घटनाओं को बढ़ावा दे रही है। अखबार ने सरकार से मांग की है कि भीड़ द्वारा हत्या के हर मामले की तुरंत जांच हो, सभी आरोपियों की पहचान की जाए और उनके खिलाफ प्रभावी कानूनी कार्रवाई की जाए। साथ ही सरकारी आंकड़ों का स्वतंत्र मानवाधिकार संगठनों के आंकड़ों से मिलान कर हिंसा की वास्तविक स्थिति सामने लाई जाए, ताकि इस समस्या से निपटने के लिए ठोस कदम उठाए जा सकें।