Edited By Pardeep,Updated: 25 Aug, 2026 05:50 AM

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने ईरान को वैश्विक स्तर पर पूरी तरह अलग-थलग करने के लिए अपने महत्वाकांक्षी अभियान 'इकोनॉमिक D-डे' (Economic D-Day) का बिगुल फूंक दिया है। लगभग छह महीने से जारी इस संघर्ष के बीच, अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी...
वाशिंगटन/तेहरान: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने ईरान को वैश्विक स्तर पर पूरी तरह अलग-थलग करने के लिए अपने महत्वाकांक्षी अभियान 'इकोनॉमिक D-डे' (Economic D-Day) का बिगुल फूंक दिया है। लगभग छह महीने से जारी इस संघर्ष के बीच, अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने उन देशों और संस्थाओं के खिलाफ सेकेंडरी प्रतिबंधों को और बढ़ाने का ऐलान किया है जो तेहरान के साथ व्यापार जारी रखे हुए हैं। अमेरिकी प्रशासन ने दुनिया भर के नेताओं को कड़े शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा है कि उनके पास ईरान से जुड़ी गतिविधियों को रोकने के लिए एक बेहद 'तय समय-सीमा' है।
ईरान की वित्तीय लाइफलाइन काटने की तैयारी
अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट किया कि इस 'आर्थिक हमले' का मुख्य मकसद उन सभी आर्थिक रास्तों को रोकना है, जिनका इस्तेमाल ईरान रेवेन्यू कमाने और अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने के लिए करता है। अमेरिका का इरादा तेहरान को सहारा देने वाली हर वित्तीय लाइफलाइन को काटना है ताकि वह पूरी तरह अकेला पड़ जाए। इसी के तहत अमेरिकी ट्रेजरी ने ईरान के परमाणु, मिसाइल, साइबर और तेल नेटवर्क से जुड़े लगभग 60 संस्थाओं, व्यक्तियों और जहाजों के खिलाफ प्रतिबंधों के एक नए दौर की घोषणा की है।
'शैडो-फ्लीट' और मददगारों पर कसा शिकंजा
अमेरिका के 'ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट' प्लान के तहत, खुफिया एजेंसियों ने उन सभी नेटवर्कों और मददगारों की पहचान कर ली है जिनका इस्तेमाल ईरान तेल की तस्करी और प्रतिबंधों से बचने के लिए करता रहा है। इन प्रतिबंधों के निशाने पर संयुक्त अरब अमीरात (UAE), हांगकांग, चीन, सिंगापुर, स्विट्जरलैंड और यूरोप की वे ब्रोकर कंपनियां भी आ गई हैं, जो गुप्त रूप से चलने वाले जहाजों के बेड़े यानी 'शैडो-फ्लीट' को वित्तीय व तकनीकी मदद दे रही थीं। नए प्रतिबंधों के दायरे में डिजिटल एसेट्स, टेक्नोलॉजी, सोना, एविएशन और शिपिंग से जुड़ी गतिविधियों को भी शामिल किया गया है। साथ ही, विदेशों से ईरान को भेजी जाने वाली रकम (रेमिटेंस) के कुछ सामान्य लाइसेंस भी रद्द कर दिए गए हैं।
डोनाल्ड ट्रंप खुद कर रहे हैं विदेशी नेताओं से संपर्क
इस आर्थिक नाकेबंदी को अमलीजामा पहनाने के लिए अमेरिकी ट्रेजरी, स्टेट डिपार्टमेंट और सेना की टीमें दुनिया भर में अपने समकक्षों से मुलाकात कर रही हैं ताकि उन्हें अमेरिकी कार्रवाई की गंभीरता से अवगत कराया जा सके। ट्रेजरी सेक्रेटरी बेसेंट ने बताया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद भी विभिन्न देशों के नेताओं को फोन करके ईरान के साथ संबंध खत्म करने की खास अपील कर रहे हैं और वीकेंड से ही इस कोशिश के सकारात्मक नतीजे दिखने लगे हैं। बेसेंट ने दोटूक कहा कि जो देश अमेरिका के साथ खड़े होंगे, उन्हें साझेदारी का फायदा मिलेगा और जो तेहरान के साथ खड़े रहेंगे, उन्हें कमजोर होती ईरानी सरकार के अलग-थलग पड़ने का खामियाजा भुगतना पड़ेगा। इस हफ्ते के अंत तक एक और बड़ी वित्तीय संस्था पर प्रतिबंध लगने की उम्मीद है।
ईरान का पलटवार: अमेरिकी धमकियां खोखली
दूसरी तरफ, ईरान के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बाघेरी गालिबाफ ने वाशिंगटन के इस बढ़ते आर्थिक दबाव का कड़ा विरोध किया है। गालिबाफ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर एक पोस्ट में लिखा कि अमेरिका खुद ऐसी आर्थिक स्थिति में नहीं है कि वह दूसरे देशों के ईरान के साथ संबंधों पर रोक लगा सके। उन्होंने अमेरिकी चेतावनियों को 'डींगें' करार देते हुए दावा किया कि ईरान के व्यापारिक साझेदार वाशिंगटन की इन धमकियों को बिल्कुल भी गंभीरता से नहीं ले रहे हैं और वे इन बयानों को कोई महत्व नहीं देते।
दुनिया भर में बढ़ा ऊर्जा संकट
गौरतलब है कि चीन सालों से ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार रहा है, जिसके कारण वाशिंगटन ने चीनी खरीद को रोकने के प्रयास तेज कर दिए हैं। हालांकि, अमेरिका ने अभी तक उन बड़े चीनी बैंकों पर प्रतिबंध नहीं लगाया है जो इस व्यापार में मदद कर रहे हैं। छह महीने से जारी इस संघर्ष और होर्मुज स्ट्रेट से तेल की ढुलाई बाधित होने के कारण दुनिया भर में कच्चे तेल और ऊर्जा की कीमतें ऊंची बनी हुई हैं। वहीं, अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद ईरान भी लगातार नई फ्रंट कंपनियां बनाकर और नए नामों से जहाजों का पंजीकरण कराकर इन प्रतिबंधों से बचने के रास्ते निकाल रहा है।