Edited By Rohini Oberoi,Updated: 18 Jul, 2026 01:50 PM

पाकिस्तान के करीब 80 साल के इतिहास में एक कड़वा सच हमेशा कायम रहा है—सरकारें आती-जाती रहती हैं लेकिन सत्ता की असली चाबी हमेशा वहां की सेना (एस्टेब्लिशमेंट) के पास ही रहती है। देश में प्रधानमंत्री चुने गए, हटाए गए, जेल भेजे गए और मुल्क से बाहर तक...
इंटरनेशनल डेस्क। पाकिस्तान के करीब 80 साल के इतिहास में एक कड़वा सच हमेशा कायम रहा है—सरकारें आती-जाती रहती हैं लेकिन सत्ता की असली चाबी हमेशा वहां की सेना (एस्टेब्लिशमेंट) के पास ही रहती है। देश में प्रधानमंत्री चुने गए, हटाए गए, जेल भेजे गए और मुल्क से बाहर तक निकाले गए लेकिन सेना का दबदबा कभी कम नहीं हुआ।
राजनीतिक पार्टियां बनीं और खत्म हुईं। फिर भी इन सबके बीच सेना ही सत्ता की असली निर्णायक बनी रही चाहे तख्तापलट के ज़रिए सीधे शासन किया हो या पर्दे के पीछे से भारी असर डाला हो। यही वजह है कि मौलाना फ़ज़लुर रहमान की पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व के साथ हालिया टक्कर आम विपक्षी राजनीति से कहीं ज़्यादा अहम मानी जा रही है।
रहमान कोई उग्र बाहरी व्यक्ति नहीं हैं। 69 वर्षीय मौलवी 'जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फ़ज़ल' (JUI-F) के प्रमुख हैं जो पाकिस्तान की सबसे बड़ी धार्मिक-राजनीतिक पार्टियों में से एक है। उन्होंने देश के जटिल नागरिक-सैन्य संबंधों के बीच तीन दशकों से ज़्यादा का समय बिताया है।
उन्होंने संसद में काम किया है गठबंधन सरकारें बनाने में मदद की है और सेना प्रमुखों के साथ अच्छे कामकाजी संबंध बनाए रखे हैं। अक्सर पाकिस्तान के 'माहिर राजनीतिक खिलाड़ी' (पॉलिटिकल सर्वाइवर) के तौर पर पहचाने जाने वाले रहमान ने आमतौर पर टकराव के बजाय बातचीत को प्राथमिकता दी है।
इसलिए फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को खुलकर चुनौती देने का उनका फैसला एक बड़ा बदलाव है। जब कोई अनुभवी अंदरूनी व्यक्ति सेना के राजनीतिक अधिकार पर सवाल उठाता है तो पाकिस्तान के सत्ता-तंत्र (एस्टेब्लिशमेंट) को उस पर ध्यान देना ही पड़ता है।
आज मुनीर के पास शायद जनरल परवेज़ मुशर्रफ के बाद से किसी भी पाकिस्तानी सैन्य नेता की तुलना में ज़्यादा अधिकार हैं। सेना प्रमुख के तौर पर उनका कार्यकाल 5 साल के लिए बढ़ा दिया गया है, वे पाकिस्तान के इतिहास में फील्ड मार्शल के फाइव-स्टार रैंक तक पदोन्नत होने वाले केवल दूसरे अधिकारी बने हैं और साथ ही वे पाकिस्तान के पहले 'चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज़' के तौर पर भी काम कर रहे हैं।
इन भूमिकाओं ने मिलकर पाकिस्तान के सुरक्षा तंत्र में उनकी स्थिति को सबसे ऊंचे पायदान पर पहुंचा दिया है वही तंत्र जो असल में देश पर शासन करता है। मुनीर उस सोच का चेहरा भी बन गए हैं जिसे कई लोग पाकिस्तान फर्स्ट (पाकिस्तान सबसे पहले) सिद्धांत कहते हैं—यह सुरक्षा को प्राथमिकता देने वाला नज़रिया है जो आतंकवाद के खिलाफ सख्त रूख अपनाने, विदेशों में सैन्य ताकत दिखाने और सशस्त्र बलों को पाकिस्तान की राष्ट्रीय पहचान के केंद्र में रखने की वकालत करता है। रहमान इसी नैरेटिव (सोच) को चुनौती दे रहे हैं।
इसकी तत्काल वजह मुनीर की वह अपील थी जिसमें उन्होंने खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में बढ़ती उग्रवादी हिंसा से निपटने में मदद के लिए नागरिकों से सशस्त्र मिलिशिया या 'लश्कर' बनाने को कहा था। पाकिस्तान ने पहले भी ऐसे मिलिशिया (हथियारबंद समूहों) के साथ प्रयोग किए हैं जिनके नतीजे अक्सर मिले-जुले और कभी-कभी दुखद रहे हैं। सरकार का साथ देने वाले कबीलाई नेता उग्रवादी समूहों के निशाने पर आ गए, जबकि स्थानीय समुदाय विद्रोहियों और सुरक्षा बलों के बीच फंस गए।
रहमान का तर्क था कि इस प्रयोग को दोहराने से पाकिस्तान के अंदरूनी झगड़े और बढ़ेंगे।उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा सरकार की ज़िम्मेदारी है आम नागरिकों की नहीं। नागरिकों से हथियार उठाने के लिए कहने से पीढ़ियों तक चलने वाली खून-खराबे की दुश्मनी और अराजकता पैदा होगी, साथ ही यह संकेत भी जाएगा कि सरकार अपना सबसे बुनियादी कर्तव्य निभाने में भी नाकाम रही है।