सऊदी के लिए यमन में हूतियों से भिड़ेगा पाकिस्तान; ईरान को दी चेतावनी,‘मक्का पैक्ट’ के तहत हवाई हमले की तैयारी

Edited By Updated: 10 Sep, 2026 05:00 PM

pakistan considers hitting yemen s houthis under mecca pact upon saudi request

सऊदी अरब के अनुरोध पर पाकिस्तान द्वारा यमन में हूती ठिकानों पर हवाई हमले पर विचार किए जाने की रिपोर्ट सामने आई है। हालांकि पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल मक्का रक्षा समझौते के तहत कोई सैन्य कार्रवाई चर्चा में नहीं है। सऊदी...

Islamabad: सऊदी अरब और यमन के हूती विद्रोहियों के बीच बढ़ते संघर्ष ने पाकिस्तान को भी सीधे सैन्य मोर्चे पर खींचने की अटकलें तेज कर दी हैं। एक रिपोर्ट में पाकिस्तानी सूत्रों के हवाले से दावा किया गया कि सऊदी अरब के औपचारिक अनुरोध पर पाकिस्तान यमन में हूती ठिकानों के खिलाफ हवाई हमले पर विचार कर रहा है। सआदा समेत कुछ इलाकों को संभावित निशाने के तौर पर बताया गया है। हालांकि पाकिस्तान ने अभी ऐसा कोई फैसला नहीं लिया है।और अब सबसे अहम अपडेट यह है कि पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि मक्का रक्षा समझौते के तहत फिलहाल किसी सैन्य कार्रवाई पर चर्चा नहीं हुई है। पाकिस्तान ने कहा है कि वह समझौते के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन तत्काल सैन्य कदम की योजना नहीं है।

 

सऊदी पर हूतियों के ताबड़तोड़ हमले
यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के खिलाफ अपने हमले तेज कर दिए हैं। हालिया हमलों में सऊदी अरब के अब्हा, जिजान, नजरान और खमिस मुशैत इलाकों को निशाना बनाया गया। सऊदी अधिकारियों के अनुसार इन हमलों में 73 लोग घायल हुए और ऊर्जा प्रतिष्ठानों के संचालन पर भी असर पड़ा। हूतियों और सऊदी समर्थित यमनी बलों के बीच जमीन पर भी लड़ाई तेज हो गई है। इससे 2022 में कायम हुआ संघर्ष-विराम लगभग टूटने की स्थिति में पहुंच गया है।

 

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री का बयान
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा है कि अगर सऊदी अरब पर बिना उकसावे के हमला होता है या यमन का संघर्ष सऊदी क्षेत्र में फैलता है, तो मक्का संयुक्त रक्षा समझौता सक्रिय हो सकता है। इस समझौते के तहत तीनों देशों ने यह सिद्धांत स्वीकार किया है कि किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला सभी पर हमला माना जाएगा। यही बयान अब इस सवाल के केंद्र में है कि अगर हूती हमले सऊदी अरब पर जारी रहते हैं, तो क्या पाकिस्तान वास्तव में यमन में सैन्य कार्रवाई करेगा?

 
जहां कुछ रिपोर्टों में पाकिस्तानी सूत्रों के हवाले से यमन में हूती ठिकानों पर हवाई हमले की संभावना बताई गई, वहीं पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सज्जाद हैदर खान ने गुरुवार को कहा कि मक्का समझौते के तहत फिलहाल किसी सैन्य प्रतिक्रिया पर चर्चा नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान समझौते के प्रति प्रतिबद्ध है, लेकिन अभी तत्काल सैन्य कार्रवाई पर विचार नहीं किया जा रहा। इसलिए फिलहाल पाकिस्तान के यमन युद्ध में सीधे उतरने को संभावना और विचार के स्तर पर ही देखा जा रहा है।

 

पहली बार समझौते की असली परीक्षा
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने 7 अगस्त 2026 को मक्का में संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते का मूल सिद्धांत है कि तीनों में से किसी एक देश पर सशस्त्र हमला होने पर उसे तीनों के खिलाफ हमला माना जाएगा। इसका उद्देश्य सामूहिक सुरक्षा और रक्षा सहयोग को मजबूत करना है। हालांकि तुर्किये ने स्पष्ट किया था कि यह समझौता किसी देश को साझा दुश्मन घोषित नहीं करता और इसका स्वरूप रक्षात्मक है। मक्का समझौते पर हस्ताक्षर के समय सबसे बड़ा सवाल यही था कि क्या यह सिर्फ राजनीतिक और रक्षा सहयोग का समझौता रहेगा या किसी संकट की स्थिति में वास्तव में सैन्य गठबंधन की तरह काम करेगा?  हूतियों के लगातार सऊदी हमलों ने इस सवाल को पहली बार वास्तविक रूप दे दिया है। अगर पाकिस्तान सऊदी अरब के अनुरोध पर यमन में हवाई हमले करता है, तो यह मक्का समझौते के लागू होने का पहला बड़ा सैन्य उदाहरण बन सकता है। लेकिन अगर इस्लामाबाद सिर्फ सऊदी हवाई क्षेत्र की सुरक्षा, खुफिया जानकारी, निगरानी, मिसाइल रक्षा या अन्य तकनीकी सहायता तक सीमित रहता है, तो पाकिस्तान सीधे यमन युद्ध में उतरने से बच सकता है।

 

पाकिस्तान के लिए ईरान सबसे बड़ी चुनौती
यमन में हूतियों के खिलाफ सीधी सैन्य कार्रवाई पाकिस्तान के लिए आसान फैसला नहीं होगा।  हूती आंदोलन को ईरान का समर्थन प्राप्त है। दूसरी ओर पाकिस्तान के ईरान के साथ भौगोलिक और रणनीतिक संबंध हैं। ऐसे में यमन में हूतियों पर सीधे हमले से इस्लामाबाद-तेहरान संबंधों पर भी असर पड़ सकता है। पाकिस्तान पहले से ही अमेरिका-ईरान संघर्ष को लेकर मध्यस्थता और संदेश पहुंचाने की कोशिश करता रहा है। ऐसे में ईरान समर्थित संगठन पर हमला उसकी कूटनीतिक भूमिका को और जटिल बना सकता है।

 

यह पहली बार नहीं है जब सऊदी अरब और यमन युद्ध के बीच पाकिस्तान की सैन्य भूमिका का सवाल उठा है। 2015 में पाकिस्तान की संसद ने सऊदी नेतृत्व वाले यमन अभियान में पाकिस्तानी सैनिक भेजने के अनुरोध को प्रभावी रूप से अस्वीकार कर दिया था। हालांकि पाकिस्तान ने उस समय सऊदी अरब की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई थी। अब परिस्थितियां अलग हैं, क्योंकि पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच औपचारिक संयुक्त रक्षा समझौता मौजूद है। 

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