Edited By Tanuja,Updated: 28 Apr, 2026 06:19 PM

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के नए शांति प्रस्ताव को ठुकराने के संकेत दिए हैं। प्रस्ताव में होर्मुज खोलने की बात है, लेकिन परमाणु मुद्दा टाल दिया गया है। अमेरिका चाहता है कि कोई भी समझौता ईरान को परमाणु हथियार से पूरी तरह रोके।
International Desk: अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच शांति की कोशिशों को बड़ा झटका लगा है। डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के नए शांति प्रस्ताव पर असंतोष जताया है और संकेत दिए हैं कि अमेरिका इसे स्वीकार करने के मूड में नहीं है। यह प्रस्ताव हाल ही में अमेरिका को भेजा गया था, जिसमें ईरान ने Strait of Hormuz को दोबारा खोलने और अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी खत्म करने की बात कही थी। लेकिन इसके बदले ईरान चाहता है कि उसके परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत बाद में की जाए।
अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि यह प्रस्ताव अधूरा है, क्योंकि इसमें सबसे अहम मुद्दा ईरान का परमाणु कार्यक्रम फिलहाल टाल दिया गया है। मार्को रूबियो ने कहा कि प्रस्ताव पहले की तुलना में बेहतर जरूर है, लेकिन किसी भी समझौते का मुख्य उद्देश्य यही होना चाहिए कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार विकसित न कर सके। रिपोर्ट्स के मुताबिक, व्हाइट हाउस के अधिकारियों का मानना है कि अगर अमेरिका इस प्रस्ताव को स्वीकार करता है, तो यह ट्रम्प के लिए “राजनीतिक जीत” जैसा नहीं दिखेगा, क्योंकि वे लगातार कहते रहे हैं कि ईरान को परमाणु हथियार नहीं बनाने दिया जाएगा।
दूसरी तरफ, ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघचीने अमेरिका पर ही बातचीत में देरी का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि अमेरिका “अवास्तविक मांगें” रख रहा है, बार-बार अपना रुख बदल रहा है और धमकी की भाषा इस्तेमाल कर रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान अपने पिछले अनुभवों को ध्यान में रखते हुए ही आगे का फैसला करेगा, खासकर तब जब बातचीत के दौरान ही उस पर सैन्य हमले हुए और आर्थिक दबाव डाला गया। बता दें कि फरवरी में अमेरिका और इजराइल के संयुक्त हमलों के बाद यह संघर्ष शुरू हुआ था।
इसके जवाब में ईरान ने मिसाइल और ड्रोन हमले किए और होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण कड़ा कर दिया। हालांकि 8 अप्रैल को एक अस्थायी सीजफायर हुआ, लेकिन उसके बाद पाकिस्तान में हुई बातचीत भी किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी। अब अमेरिका की नाकेबंदी और ईरान की शर्तों के कारण स्थिति फिर से तनावपूर्ण बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक परमाणु मुद्दे पर साफ समझौता नहीं होता, तब तक शांति की राह मुश्किल बनी रहेगी। फिलहाल, दोनों देश अपनी-अपनी शर्तों पर अड़े हुए हैं, जिससे जंग खत्म होने की उम्मीद कमजोर नजर आ रही है।