अमेरिका-ब्रिटेन में पढ़ा रहे पाकिस्तानी शिक्षाविदों ने उठाई आवाज,  इमान मजारी और उनके पति को रिहा करे पाकिस्तान

Edited By Updated: 11 Oct, 2026 03:06 PM

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पाकिस्तानी मूल के शिक्षाविदों ने वकील इमान मजारी और हादी चट्ठा की तत्काल रिहाई तथा उनके खिलाफ आरोप वापस लेने की मांग की है। दोनों को सोशल मीडिया पोस्ट के मामले में 17 साल की सजा सुनाई गई थी। सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने के बाद उन्हें दूसरे मामले में...

London: पाकिस्तान में वकील इमान ज़ैनब मजारी-हाज़िर और हादी अली चट्ठा की हिरासत को लेकर अमेरिका और ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों में कार्यरत पाकिस्तानी मूल के शिक्षाविदों ने आवाज उठाई है। उन्होंने दोनों वकीलों के खिलाफ आरोप वापस लेने और उन्हें तत्काल रिहा करने की मांग की है। शिक्षाविदों ने इसे अभिव्यक्ति की आजादी और कानून के शासन से जुड़ा गंभीर मामला बताया है।  लाहौर में जारी संयुक्त बयान में शिक्षाविदों ने पाकिस्तान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के शासन की स्थिति पर चिंता जताई। यह बयान जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय के आकिल शाह की पहल पर जारी किया गया। बयान के मुताबिक, जनवरी 2026 में इमान मजारी और हादी चट्ठा को सोशल मीडिया पोस्ट के मामले में इलेक्ट्रॉनिक अपराध रोकथाम कानून (पीईसीए) के तहत 17 साल जेल की सजा सुनाई गई थी। इन पोस्ट में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों की आलोचना की गई थी।

 

शिक्षाविदों के अनुसार, पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने 17 सितंबर 2026 को दोनों की सजा पर रोक लगाते हुए उन्हें जमानत दे दी थी। हालांकि, कुछ ही घंटों के भीतर पुलिस ने एक अन्य मामले में उन्हें हिरासत में ले लिया। संयुक्त बयान के अनुसार, दोनों अब भी हिरासत में हैं। हस्ताक्षरकर्ताओं ने कहा कि इमान मजारी जबरन गुमशुदगी के मामलों पर आवाज उठाती रही हैं और पीड़ितों तथा उनके परिवारों का प्रतिनिधित्व करती रही हैं। उन्होंने पाकिस्तान के ताकतवर संस्थानों की सार्वजनिक रूप से आलोचना भी की है।  वहीं, हादी चट्ठा ने ईशनिंदा के आरोपों का सामना कर रहे लोगों और मृत्युदंड पाए कैदियों का बचाव किया है। बयान में कहा गया कि आपराधिक कानून का इस्तेमाल असहमति की आवाज दबाने या वकीलों को उनकी पैरवी के कारण डराने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।


शिक्षाविदों ने कहा कि नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय समझौते का सदस्य होने के नाते पाकिस्तान की जिम्मेदारी है कि वह सरकारी संस्थानों की आलोचना करने के अधिकार की रक्षा करे। उनके अनुसार, सोशल मीडिया पर टिप्पणी के लिए 17 साल की सजा इस दायित्व के अनुरूप नहीं है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय विधि आयोग सहित कानूनी संगठनों के रुख का भी हवाला दिया। उन्होंने पाकिस्तान की संघीय सरकार, न्यायपालिका और अन्य संस्थानों से संवैधानिक तथा अंतरराष्ट्रीय कानूनी दायित्वों का पालन करने और दोनों वकीलों को मनमाने ढंग से दोबारा हिरासत में लेने से रोकने की अपील की। संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर करने वालों में टफ्ट्स विश्वविद्यालय की आयशा जलाल और फहद हमायूं, स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज की आयशा सिद्दीका, पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के हाशिम बिन राशिद, यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की रीम खुर्शीद और यूनिवर्सिटी ऑफ वारविक की ज़ोहा वसीम सहित कई शिक्षाविद शामिल हैं। 

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