Edited By Ramkesh,Updated: 09 May, 2026 02:07 PM

किसानों के हित के लिए सरकार बड़े- बड़े दावे करती हैं, चाहे उनकी आर्थिक स्थिति को लेकर हो या फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की बात हो लेकिन धरातल पर उनकी स्थिति चिंताजनक है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट ने देश के कृषि संकट की...
नेशनल डेस्क: किसानों के हित के लिए सरकार बड़े- बड़े दावे करती हैं, चाहे उनकी आर्थिक स्थिति को लेकर हो या फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की बात हो लेकिन धरातल पर उनकी स्थिति चिंताजनक है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट ने देश के कृषि संकट की एक बार फिर भयावह तस्वीर सामने रख दी है। आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2024 में देशभर में 10,546 किसानों और खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की। यानी औसतन हर दिन 28 और लगभग हर घंटे एक किसान या मजदूर अपनी जिंदगी खत्म कर रहा है। हालांकि 2023 के मुकाबले मामलों में मामूली गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन हालात अब भी बेहद चिंताजनक बने हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि खेती से घटती आमदनी, बढ़ता कर्ज और आर्थिक असुरक्षा ग्रामीण भारत को लगातार तोड़ रही है।
खेतिहर मजदूरों पर सबसे ज्यादा मार
रिपोर्ट के मुताबिक आत्महत्या करने वालों में खेतिहर मजदूरों की संख्या सबसे ज्यादा रही। कुल 10,546 मामलों में 5,913 कृषि मजदूर थे, यानी 56 प्रतिशत से अधिक। यह आंकड़ा इस बात का संकेत है कि गांवों में खेती से ज्यादा लोग मजदूरी पर निर्भर होते जा रहे हैं, लेकिन वहां भी स्थिर आय और सुरक्षा नहीं मिल पा रही।
महाराष्ट्र बना सबसे बड़ा हॉटस्पॉट
महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 3,824 किसानों और मजदूरों ने आत्महत्या की, जो पूरे देश के कुल मामलों का 36 प्रतिशत से ज्यादा है। एक रिपोर्ट के आधार पर जो आंकड़े सामने आए हैं उसने सभी को चौंका दिया है।
रिपोर्ट इस प्रकार है:-
कर्नाटक – 2,971 मामले
मध्य प्रदेश – 835 मामले
आंध्र प्रदेश – 780 मामले
तमिलनाडु – 503 मामले
छत्तीसगढ़ – 486 मामले
कर्नाटक में सबसे तेज बढ़ोतरी
रिपोर्ट के अनुसार 2024 में सबसे ज्यादा उछाल कर्नाटक में दर्ज किया गया, जहां आत्महत्याओं में 22.61 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। वहीं राजस्थान और मध्य प्रदेश में भी मामलों में वृद्धि देखी गई। दूसरी ओर आंध्र प्रदेश में आत्महत्या के मामलों में कमी दर्ज की गई, जिसे राहत भरा संकेत माना जा रहा है।
बढ़ती चिंता, गहरे सवाल
रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि खेती का संकट सिर्फ फसलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लाखों परिवारों के अस्तित्व से जुड़ा मुद्दा बन चुका है। आर्थिक दबाव, मौसम की मार और बढ़ती लागत ने किसानों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ राहत पैकेज नहीं, बल्कि खेती को टिकाऊ और लाभकारी बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाने की जरूरत है, वरना यह संकट और गहराता जाएगा।