Edited By Tanuja,Updated: 31 Aug, 2026 01:18 PM

बांग्लादेश ने सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के मक्का संयुक्त रक्षा समझौते में शामिल होने की इच्छा जताई है। ढाका को इसमें कोई जोखिम नहीं दिखता। विशेषज्ञ इसे उसकी गुटनिरपेक्ष नीति में बदलाव मान रहे हैं। बांग्लादेश के शामिल होने से भारत के साथ उसके...
Dhaka: बांग्लादेश अब सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते में शामिल होने की दिशा में कदम बढ़ाता दिखाई दे रहा है। ढाका ने साफ कहा है कि उसे इस समझौते का हिस्सा बनने में कोई जोखिम नजर नहीं आता और इससे उसके दूसरे साझेदार देशों के साथ रिश्ते प्रभावित नहीं होंगे। हालांकि, विशेषज्ञ इसे बांग्लादेश की लंबे समय से चली आ रही गुटनिरपेक्ष विदेश नीति में महत्वपूर्ण बदलाव के संकेत के तौर पर देख रहे हैं। बांग्लादेश के विदेश राज्य मंत्री हुमायूं कबीर ने रविवार को कहा कि ढाका इस मुद्दे पर चर्चा कर रहा है और उसके सभी द्विपक्षीय साझेदारों के साथ बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है। सऊदी अरब के राजदूत से मुलाकात के बाद उन्होंने कहा कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए बांग्लादेश को अपनी विदेश नीति और सुरक्षा सहयोग को लचीले और एकीकृत तरीके से आगे बढ़ाना चाहिए।
कबीर के मुताबिक, बांग्लादेश अपने अंतरराष्ट्रीय संबंधों में संतुलन बनाए रखेगा। इससे कुछ दिन पहले बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने संसद में कहा था कि अगर ढाका को मक्का रक्षा समझौते में शामिल होने का निमंत्रण मिलता है तो बांग्लादेश उस पर सकारात्मक रूप से विचार करेगा। उन्होंने समझौते को “हमारे मुस्लिम परिवार का आंतरिक मामला” बताया था और कहा था कि दूसरे देशों के लिए इस पर चिंता करने की कोई गुंजाइश नहीं है। यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल रक्षा सहयोग नहीं, बल्कि बांग्लादेश की विदेश नीति की दिशा में संभावित बदलाव का संकेत देता है।
क्या है मक्का समझौता ?
7 अगस्त को पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने मक्का में संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि तीनों में से किसी एक देश पर सशस्त्र हमला बाकी सभी देशों पर हमला माना जाएगा। यानी यह सामान्य रक्षा सहयोग से आगे बढ़कर एक प्रकार की सामूहिक प्रतिरोध व्यवस्था तैयार करता है। इस समझौते का उद्देश्य किसी भी आक्रामक कार्रवाई के खिलाफ तीनों देशों की सामूहिक सैन्य क्षमता और प्रतिरोध को मजबूत करना बताया गया है। विदेश नीति विशेषज्ञों और पूर्व राजनयिकों के अनुसार, मक्का रक्षा समझौते में शामिल होने की इच्छा बांग्लादेश की लंबे समय से चली आ रही गुटनिरपेक्षता की नीति से विचलन हो सकती है। बांग्लादेश अब तक विभिन्न शक्तियों के बीच संतुलन साधने की कोशिश करता रहा है।
सऊदी अरब की अहम भूमिका
इस पूरे समीकरण में सऊदी अरब की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच लंबे समय से रक्षा संबंध हैं, जबकि तुर्किये के साथ भी रणनीतिक सहयोग बढ़ रहा है। बांग्लादेश की सऊदी अरब के साथ अपनी अलग आर्थिक और कूटनीतिक साझेदारी है। ऐसे में ढाका के लिए इस समझौते में शामिल होना केवल सैन्य फैसला नहीं बल्कि मध्य-पूर्व और दक्षिण एशिया के बीच अपने रणनीतिक रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित करने का प्रयास भी हो सकता है।
भारत पर क्या पड़ेगा असर?
बांग्लादेश के इस संभावित कदम का भारत पर सीधा असर पड़ सकता है। पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के साथ एक औपचारिक सामूहिक रक्षा व्यवस्था में प्रवेश करने से उसकी विदेश नीति पर नए सवाल उठ सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सबसे संवेदनशील पहलू भारत-बांग्लादेश संबंध हो सकता है। मक्का समझौते में पहले से पाकिस्तान और तुर्किये शामिल हैं। दोनों देशों के बीच सैन्य और रणनीतिक सहयोग भी लगातार बढ़ा है। ऐसे में बांग्लादेश का इस ढांचे में प्रवेश दक्षिण एशिया और मुस्लिम दुनिया के बीच एक नया रणनीतिक समीकरण तैयार कर सकता है।
ढाका हालांकि लगातार यह दावा कर रहा है कि उसका उद्देश्य किसी देश के खिलाफ खड़ा होना नहीं है और वह अपने सभी अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ संतुलन बनाए रखेगा।पाकिस्तान पहले से ही भारत का प्रमुख रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी है। ऐसे में अगर बांग्लादेश भी पाकिस्तान के साथ किसी सामूहिक रक्षा ढांचे में शामिल होता है, तो दक्षिण एशिया की सुरक्षा गणित अधिक जटिल हो सकती है। भारत ने फिलहाल इस समझौते पर सीधे कोई आपत्ति नहीं जताई है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत अपनी सुरक्षा को प्रभावित करने वाले सभी घटनाक्रमों पर करीबी नजर रखता है और राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाता है।