Edited By Parveen Kumar,Updated: 08 Jan, 2026 08:08 PM

अगर आपको लगता है कि एमआरआई मशीन का इस्तेमाल सिर्फ हड्डियों और बीमारियों की जांच तक सीमित है, तो यह कहानी आपकी सोच बदल सकती है। यह कोई फिल्मी सीन या कल्पना नहीं, बल्कि एक ऐसा वास्तविक प्रयोग है, जिसने मेडिकल दुनिया में हलचल मचा दी थी। विज्ञान के नाम...
नेशनल डेस्क: अगर आपको लगता है कि एमआरआई मशीन का इस्तेमाल सिर्फ हड्डियों और बीमारियों की जांच तक सीमित है, तो यह कहानी आपकी सोच बदल सकती है। यह कोई फिल्मी सीन या कल्पना नहीं, बल्कि एक ऐसा वास्तविक प्रयोग है, जिसने मेडिकल दुनिया में हलचल मचा दी थी। विज्ञान के नाम पर की गई इस अनोखी रिसर्च ने यह साबित कर दिया कि शोध के लिए कभी-कभी बेहद असामान्य रास्ते भी अपनाए जाते हैं।
यह मामला साल 1991 का है, जब नीदरलैंड के वैज्ञानिक मेनको विक्टर ‘पेक’ वैन एंडेल मानव शरीर में होने वाले बदलावों को और गहराई से समझना चाहते थे। इस रिसर्च में उनकी दोस्त आइडा साबेलिस और उनके साथी जु्प ने सहयोग किया। उद्देश्य था यह जानना कि करीबी पलों के दौरान शरीर के भीतर किस तरह के शारीरिक परिवर्तन होते हैं और उन्हें एमआरआई तकनीक से कैसे देखा जा सकता है।
रिसर्च के तहत तय किया गया कि एमआरआई मशीन के अंदर कपल रहेगा और उसी दौरान शरीर के अंदर होने वाले बदलावों को रिकॉर्ड किया जाएगा। पूरा प्रयोग वैज्ञानिक निगरानी में और शोध के उद्देश्य से किया गया। हालांकि, इस प्रयोग में सबसे बड़ी चुनौती एमआरआई मशीन की सीमित जगह थी।
उस समय की एमआरआई मशीनें आज की तरह आधुनिक और आरामदेह नहीं थीं। अंदर की जगह बेहद संकरी थी, जिससे सामान्य स्थिति में रह पाना संभव नहीं था। ऐसे में दोनों ने एक ऐसी मुद्रा चुनी, जिसमें वे मशीन के भीतर फिट हो सकें। पूरी प्रक्रिया के दौरान कंट्रोल रूम से लगातार निर्देश दिए जाते रहे, ताकि तस्वीरें साफ और उपयोगी मिल सकें।
इस अनोखे प्रयोग के नतीजे साल 1999 में ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित किए गए। तस्वीरों और निष्कर्षों ने मेडिकल साइंस में खासा ध्यान खींचा और खासतौर पर महिलाओं के शरीर को बेहतर तरीके से समझने में मदद की।
कई साल बाद आइडा साबेलिस ने एक पॉडकास्ट में इस अनुभव को याद करते हुए इसे “अजीब लेकिन यादगार” बताया। उन्होंने हंसते हुए कहा कि शुरुआत में सब कुछ योजना के मुताबिक नहीं चला। मशीन के भीतर फिट होना ही सबसे बड़ी परेशानी थी। जब यह समझ आया कि तय तरीका काम नहीं करेगा, तो तुरंत स्थिति बदलनी पड़ी। उनके मुताबिक, यह अनुभव भले ही थोड़ा हास्यास्पद था, लेकिन विज्ञान के लिए बेहद अहम साबित हुआ।