Edited By Parveen Kumar,Updated: 04 Mar, 2026 04:58 PM

डायबिटीज को अब तक ऐसी बीमारी माना जाता रहा है जिसे पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता, केवल नियंत्रित किया जा सकता है। दुनियाभर में करोड़ों मरीज रोज दवाइयों और इंसुलिन पर निर्भर हैं। इसी बीच चीन से आई एक रिसर्च ने चिकित्सा जगत में हलचल पैदा कर दी है।
नेशनल डेस्क : डायबिटीज को अब तक ऐसी बीमारी माना जाता रहा है जिसे पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता, केवल नियंत्रित किया जा सकता है। दुनियाभर में करोड़ों मरीज रोज दवाइयों और इंसुलिन पर निर्भर हैं। इसी बीच चीन से आई एक रिसर्च ने चिकित्सा जगत में हलचल पैदा कर दी है। वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्नत स्टेम-सेल तकनीक की मदद से टाइप-2 डायबिटीज के एक मरीज में इंसुलिन पर निर्भरता समाप्त करने में सफलता मिली है। हालांकि विशेषज्ञ इसे “पूर्ण इलाज” कहने से पहले और व्यापक परीक्षणों की जरूरत बता रहे हैं, लेकिन शुरुआती नतीजों को बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
क्या है यह नई तकनीक?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, शोधकर्ताओं ने मरीज के शरीर में ऐसी कोशिकाएं प्रत्यारोपित (ट्रांसप्लांट) कीं जो इंसुलिन बनाने में सक्षम हैं। सामान्य तौर पर टाइप-2 डायबिटीज में शरीर इंसुलिन का सही उपयोग नहीं कर पाता, जिससे ब्लड शुगर का स्तर बढ़ जाता है। समय के साथ कई मरीजों को बाहरी इंसुलिन लेना पड़ता है।
इस प्रयोग में वैज्ञानिकों ने स्टेम सेल्स को प्रयोगशाला में विशेष प्रक्रिया से गुजारकर उन्हें पैंक्रियाज की बीटा कोशिकाओं जैसा विकसित किया। यही बीटा कोशिकाएं शरीर में इंसुलिन बनाती हैं। बाद में इन विकसित कोशिकाओं को मरीज के शरीर में प्रत्यारोपित किया गया।
प्रक्रिया के मुख्य चरण
इस उपचार को कई जटिल चरणों में पूरा किया गया:
- स्टेम सेल का संग्रह : मरीज या दाता से विशेष प्रकार की कोशिकाएं ली गईं, जिनमें अलग-अलग प्रकार की कोशिकाओं में बदलने की क्षमता होती है।
- लैब में रूपांतरण : वैज्ञानिकों ने इन कोशिकाओं को रासायनिक और जैविक संकेतों के जरिए इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाओं में बदला।
- ऊतक निर्माण : विकसित कोशिकाओं को समूह में तैयार किया गया ताकि वे शरीर में प्राकृतिक रूप से काम कर सकें।
- प्रत्यारोपण : इन कोशिकाओं को शरीर में स्थापित किया गया, जहां वे रक्त प्रवाह से जुड़कर ब्लड शुगर के अनुसार इंसुलिन रिलीज कर सकें।
प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, उपचार के बाद संबंधित मरीज को बाहरी इंसुलिन की आवश्यकता में उल्लेखनीय कमी आई है।
सबसे बड़ी चुनौती: शरीर की प्रतिक्रिया
ऐसे किसी भी प्रत्यारोपण में सबसे अहम सवाल होता है- क्या शरीर नई कोशिकाओं को स्वीकार करेगा? कई बार इम्यून सिस्टम बाहरी कोशिकाओं को अस्वीकार कर देता है, जिससे जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। इसी वजह से मरीजों की सर्जरी के बाद लगातार निगरानी की जाती है ताकि किसी तरह की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया (इम्यून रिएक्शन) या अन्य दुष्प्रभाव सामने न आएं।
‘रीजेनरेटिव मेडिसिन’ की दिशा में बड़ा कदम
यह तकनीक पुनर्योजी चिकित्सा (Regenerative Medicine) के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण प्रगति मानी जा रही है। अगर आने वाले समय में बड़े पैमाने पर क्लीनिकल ट्रायल्स में भी इसी तरह के सकारात्मक परिणाम मिलते हैं, तो यह उपचार डायबिटीज प्रबंधन की दिशा बदल सकता है।
हालांकि फिलहाल इसे शुरुआती सफलता के तौर पर देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि व्यापक अध्ययन, लंबी अवधि की निगरानी और अंतरराष्ट्रीय मानकों पर परीक्षण के बाद ही इसे आम मरीजों के लिए सुरक्षित और प्रभावी उपचार माना जा सकेगा।