Edited By Anu Malhotra,Updated: 13 Jan, 2026 10:36 AM

राजस्थान में घर-घर सौर ऊर्जा के जरिए 150 यूनिट मुफ्त बिजली पहुंचाने का सपना अब एक नई चुनौती के दौर से गुजर रहा है। प्रदेश की बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम्स) ने इस योजना के व्यावहारिक पक्ष को लेकर चिंता जताई है। मामला सीधा सा है—अगर आसमान में बादल...
नेशनल डेस्क: राजस्थान में घर-घर सौर ऊर्जा के जरिए 150 यूनिट मुफ्त बिजली पहुंचाने का सपना अब एक नई चुनौती के दौर से गुजर रहा है। प्रदेश की बिजली वितरण कंपनियों (discoms) ने इस योजना के व्यावहारिक पक्ष को लेकर चिंता जताई है। मामला सीधा सा है—अगर आसमान में बादल रहे या धूप कम खिली, तो उपभोक्ताओं के घर मुफ्त बिजली का उजाला बरकरार रखने के लिए सरकारी खजाने पर भारी बोझ पड़ सकता है।
धूप की कमी और बिजली का 'महंगा' घाटा
प्रधानमंत्री सूर्य घर योजना के तहत राजस्थान सरकार उपभोक्ताओं के घरों की छतों पर 1.1 किलोवाट के सोलर पैनल लगवा रही है। अनुमान है कि इससे हर महीने लगभग 150 यूनिट बिजली पैदा होगी। लेकिन Discoms का डर यह है:
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मौसम की मार: मानसून और सर्दियों के दौरान जब धूप कम होती है, तब सोलर उत्पादन गिर जाएगा।
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महंगी भरपाई: यदि सोलर पैनल 150 यूनिट से कम बिजली बनाते हैं, तो बाकी की कमी पूरी करने के लिए डिस्कॉम्स को बाजार से बिजली खरीदनी होगी।
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कीमतों का अंतर: सौर ऊर्जा की लागत करीब $3.25$ रुपये प्रति यूनिट बैठती है, जबकि बाजार से यही बिजली $4.50$ रुपये या उससे अधिक में खरीदनी पड़ती है। डिस्कॉम्स का सवाल है कि इस अतिरिक्त घाटे की भरपाई कौन करेगा?
Discoms बनाम सरकार: खींचतान शुरू
बिजली कंपनियों ने साफ कर दिया है कि वे घाटे में रहकर इस योजना को नहीं खींच सकतीं। उनका कहना है कि सरकार को इस 'आर्थिक अंतर' के लिए पहले से बजट तय करना चाहिए। वहीं, सरकार का मानना है कि सौर उत्पादन में उतार-चढ़ाव एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। सरकार का तर्क है कि गर्मियों के महीनों में जब धूप तेज होगी, तब उत्पादन लक्ष्य से अधिक भी हो सकता है, जो सर्दियों की कमी को संतुलित कर देगा।
आम आदमी के लिए क्या हैं इसके मायने?
वर्तमान में राजस्थान के पात्र उपभोक्ताओं को 150 यूनिट बिजली मुफ्त मिल रही है। लेकिन इस विवाद का सीधा असर योजना की स्थिरता पर पड़ सकता है:
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नियमों में बदलाव: यदि घाटा बढ़ा, तो भविष्य में योजना के मानदंडों या Unit की सीमा में फेरबदल संभव है।
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क्षमता विस्तार: एक समाधान यह भी हो सकता है कि 1.1 किलोवाट के बजाय पैनल की क्षमता बढ़ाई जाए ताकि खराब मौसम में भी पर्याप्त बिजली बन सके।
किसे मिल रहा है लाभ?
यह नया मॉडल केवल उन घरेलू उपभोक्ताओं के लिए है जिनके पास अपनी छत उपलब्ध है। इसमें लगने वाले खर्च का एक बड़ा हिस्सा केंद्र और राज्य सरकार मिलकर उठा रहे हैं (जिसमें राज्य सरकार का हिस्सा ₹17,000 है)। हालांकि, बिना छत वाले किराएदार या छोटे मकान वाले लोग फिलहाल इस सोलर क्रांति से बाहर हैं।